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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इराक को अमेरिकी चंगुल से पूरी तरह आजाद करने का ऐलान कर दिया है. यह फैसला ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व लॉन्च होने के बाद 23 साल बाद हुआ, जिसे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के आदेश पर शुरू किया गया था. फैसले की जानकारी देते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों की आखिरी यूनिट इराक से निकल रही है, ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व को आधिकारिक रूप से खत्म किया जाता है. ट्रंप ने इसे आतंकी संगठन 'ISIS पर अमेरिका की निर्णायक जीत भी बताया.
ट्रंप ने यह भी कहा, 'मुझे खुशी है अमेरिका ने ISIS को पूरी तरह खत्म कर दिया है. यह इराक की भी जीत है. इसके साथ ही अमेरिका दशकों पहले लिए गए एक गलत फैसले की वजह से अमेरिका जिस दलदल में फंसा था, उससे निकल गया है.
हम एक खिलाफत से लड़ने आए थे. अब कोई खिलाफत नहीं है. हम घर जा रहे हैं.' वहीं ट्रंप ने इसी दौरान यह भी कहा, 'होर्मुज जलडमरूमध्य पर हमारा लगभग पूरा नियंत्रण है. आप बहुत जल्द कुछ होते हुए देखेंगे.'
इस दौरान ट्रंप ने इराक के नए प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की भी तारीफ करते हुए कहा, 'हम इराक को एक शानदार नए प्रधानमंत्री, अली अल-जैदी के साथ छोड़ रहे हैं. उम्मीद है कि वह सभी चीजों को अच्छे से संभाल पाएंगे.
2003 में लॉन्च हुए अभियान के तहत इराक से अमेरिकी सैनिकों ने पहली घर वापसी 2011 में यानी आठ साल बाद हुई थी. हालांकि 2014 में नए राष्ट्रपति ने एक बार फिर फौज भेजी, जब ISIS ने इराक और सीरिया के बड़े हिस्सों पर कब्जा करके बगदाद के उन रास्तों को खतरे में डाल दिया, जहां अमेरिकी सैन्य बेस थे. वैसे तो अमेरिकी फौज ने 2019 में ही ISIS का मिलिट्री तौर पर खात्मा कर दिया था, ISIS दोबारा न उभर सके, इसलिए अमेरिकी फौज इराक में बनी रही.
ABC न्यूज़ ने ये भी बताया कि अमेरिका का इराक से 'फाइनल गुड बाय', ईरान के साथ अमेरिका के युद्ध के बाद बदले हुए रीजनल सिक्योरिटी माहौल के बीच हुआ है. इराक और ईरान दोनों शिया मुल्क हैं. दोनों के नाता सदियों पुराना है. आपस में सांस्कृतिक, सियासी और सैन्य रिश्ते हैं. इसी कड़ी में ईरान गुपचुप तरीके से इराक के अंदर मौजूद शिया मिलिशिया ग्रुप्स (हथियारबंद समूहों) को अमेरिकी मौजूदगी के बावजूद फंड और हथियार मुहैया कराता आया है.
वाशिंगटन पोस्ट की लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक इस फैसले के साथ ही आईएसआईएस मिशन का संचालन इराक के बजाए जॉर्डन होगा क्योंकि 'बगदाद' में बची-खुची अमेरिकी फौज वहीं शिफ्ट हो रही है. यानी अब 'अम्मान' से इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के खिलाफ चल रहे मिशन का हेडक्वार्टर संचालित होगा.
अमेरिकी बयान के मुताबिक इराक से मिशन खत्म हुआ और CJTF-OIR का मुख्यालय जॉर्डन में है, हालांकि सीरिया में ISIS विरोधी मिशन जारी है.
अमेरिकी फौज की वापसी उस समय हो रही है जब इराक की ट्रंप समर्थित नई सरकार पूरे सरकारी नियंत्रण के बाहर काम करने वाले यानी अलग सरकार चलाने वाले हथियारबंद ग्रुप्स की भूमिका साफ करना चाहता है. ‘दी इस्लामिक रेसिस्टेंस इन इराक’, दशकों से अमेरिकी फौज पर हमले करता आया है.
वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक ये ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों का एक शीर्ष संगठन है, जिसने हथियार छोड़ने का विरोध किया है. इसलिए उनके हथियारों को छोड़ने की डेडलाइन जून 2027 तक बढ़ा दी गई है.
ईरानी मदद वाली इराकी मिलिशिया ने इसी साल जुलाई के महीने में ट्रंप के सिर पर 10 लाख डॉलर का इनाम रखा था. हमास, हूती और हिजबुल्ला के अलावा ‘दी इस्लामिक रेसिस्टेंस इन इराक’ भी अमेरिका और इजरायल को अपना दुश्मन नंबर 1 मानते हैं.
अमेरिकी सेना की इराक से पूरी वापसी हो चुकी है. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के इस कदम को ईरान और उसके समर्थक गुट अपनी रणनीतिक बढ़त के तौर पर देख रहे हैं, क्योंकि इराक में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी ईरानी प्रभाव के लिए बड़ी चुनौती थी. इस फैसले से भले ही एक बार ISIS की इस इलाकी में वापसी की अटकलें लगाई जा रही हों, लेकिन ईरान के लिए ये किसी बड़ी राहत से कम नहीं है.
इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया था. ईरानी मिलिशिया हों या उसके प्रॉक्सी संगठन जिन्हें अमेरिका ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है, सब एक साथ ट्रंप के खून के प्यासे हैं. ट्रंप और कई अमेरिकी नेता और सैन्य कमांडर ईरान की कथित 'किलर लिस्ट' में शामिल हैं.
हाल ही में 'फ्लाई दुबई' एयरलाइन के प्लेन (जिसमें अधिकांश इजरायली नागरिक थे) को एक को-पायलट द्वारा कथित तौर पर क्रैश कराने की कोशिश करने के घटनाक्रम की जांच भी ईरान के एंगल से हो रही है. हालांकि अभी ये अटकलें भर हैं, इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन जिस तरह अमेरिका में विमान हाईजैक करके 9/11 हमले को अंजाम दिया गया था उसके मद्देनजर भी इस घटना की जांच हो रही है.
अल जजीरा ने बताया कि इराक से अमेरिका के जाने को चार 'सॉवरेन्टी डेज़' के तौर पर मनाएगा, जो वहां एक राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर घोषित है जो अमेरिकी सेना की मौजूदगी के खत्म होने की अहमियत को दिखाता है.
इसी बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री हेगसेथ ने देश के डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को साइबर हमलों, तोड़-फोड़ और जियोपॉलिटिकल जैसी तमाम रुकावटों से बचाने के लिए, 'FORTRESS America' नाम का एक प्रोग्राम लॉन्च किया है. 'नेशनल इंश्योरेंस पॉलिसी' के तौर पर लॉन्च कार्यक्रम के तहत, अमेरिकी मिलिट्री बेस को सिविलियन पावर ग्रिड से अलग कर दिया जाएगा ताकि राष्ट्रीय आपातकाल या दुश्मन के हमलों के दौरान भी कामकाज बिना किसी रुकावट के चलता रहे.
FORTRESS का मकसद यह है कि अमेरिका के हर बड़े मिलिट्री बेस में अपनी बिजली खुद पैदा की जाएगी. जो सिविलियन ग्रिड से अलग होगी. अगर कोई दुश्मन ग्रिड को ठप कर देता है-चाहे साइबर हमले से, तोड़-फोड़ से या किसी भी तरीके से तो भी हमारे मिलिट्री बेस चालू रहेंगे. फाइटर जेट उड़ते रहेंगे. कमांड सेंटर कभी बंद नहीं होंगे.' इसकी प्रोग्रामिंग का मेन डिजाइन सेना के लिए जरूरी सप्लाई चेन को तेजी से देश में वापस लाने (रीशोरिंग) पर आधारित है, ताकि किसी भी चीज के लिए विदेशी सप्लाई नेटवर्क पर निर्भरता खत्म हो सके.
इसके लिए हाई एल्टीट्यूड एरिया समेत स्पेस तक एक्शन होगा. एयरवेव को सेफ किया जाएगा. यूएस सैटेलाइट्स, स्पेक्ट्रम, और नेविगेशन सिस्टम समेत एक-दूसरे से बातचीत करने की क्षमता मजबूत और सिक्योर होगी. इस दौरान एक 'ऑफिस ऑफ़ रिलीजियस अफेयर्स' बनाया जा रहा है, जिसके लोग बिना किसी ब्यूरोक्रेटिक बिचौलिए के सीधे वॉर डिपार्टमेंट में मौजूद टॉप डिफेंस लीडरशिप को रिपोर्ट करके किसी भी तरह की असुरक्षा और खतरे को पैदा होने से रोकेंगे.'
हेगसेथ ने कहा, हमारे चैपलिन (धार्मिक सलाहकार) की बात सीधे राष्ट्रपति तक रखने वाला कोई अधिकारी होगा. हमने जिस डिपार्टमेंट ऑफ वॉर 'ऑफिस ऑफ रिलीजियस अफेयर्स' (धार्मिक मामलों का कार्यालय) का ऐलान किया है, वो बजट की सुरक्षा और देखभाल करेगा, इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग करेगा और पूरी अमेरिकी फौज में धार्मिक सहयोग को मजबूत करेगा.'
इस तरह इराक से लेकर अमेरिका में नया मिलिट्री प्रोग्राम लॉन्च करके डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिल-ईस्ट से लेकर वाशिंगटन डीसी तक नया मिलिट्री रिसेट किया है, जिसका विश्लेषण दुनियाभर में हो रहा है.