जब VFX का नामोनिशान नहीं था, तब ₹40 लाख में बनी थी India की पहली 3D फिल्म, ऐसे हुआ था कमाल!
Indian Cinema: सीजीआई और वीएफएक्स के दौर से 4 दशक पहले भारत की पहली 3D फिल्म 'माई डियर कुट्टी चेतन' कैसे बनी? जानिए ₹40 लाख के बजट में बने घूमते सेट और प्रैक्टिकल इफेक्ट्स का हैरान कर देने वाला सिनेमाई जादू.
Indian Cinema: आज भारतीय सिनेमा में कोई फिल्म देखते हुए अगर कोई इमारत हवा में उड़ती दिखाई दे, पूरी दुनिया तबाह होती नजर आए या कोई किरदार ऐसी जगह पहुंच जाए, जिसे असल जिंदगी में बनाना मुश्किल हो, तो दर्शकों के लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं है. सीजीआई, वीएफएक्स, वर्चुअल प्रोडक्शन और डिजिटल टेक्नोलॉजी ने फिल्मों की कल्पना को पर्दे पर उतारने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है, लेकिन करीब 4 दशक पहले स्थिति बिल्कुल अलग थी. उस समय न आज जैसी सीजीआई तकनीक थी और न ही फिल्म निर्माताओं के पास कंप्यूटर-जनरेटेड दुनिया बनाने की सुविधा. इसके बावजूद भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा विजुअल एक्सपेरिमेंट किया, जो आज भी याद किया जाता है.
यह कहानी साल 1984 में आई मलयालम फिल्म 'माय डियर कुट्टी चेतन' की है, जिसे भारत की पहली 3D फिल्म के तौर पर जाना जाता है. केवल 40 लाख रुपये के सीमित बजट में बनी इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि एक बड़े विजुअल एक्सपीरियंस के लिए हमेशा विशाल तकनीक या सैकड़ों करोड़ रुपये के बजट की आवश्यकता नहीं होती. कई बार सीमित संसाधनों के बीच किया गया इनोवेशन भी दर्शकों को बिल्कुल नया और शानदार सिनेमाई अनुभव दे सकता है.
जब कंप्यूटर नहीं था, तब कैमरे के सामने सेट कैसे घूमता था?
'माय डियर कुट्टी चेतन' के निर्माण में रोटेटिंग सेट का इस्तेमाल प्रैक्टिकल फिल्म मेकिंग का एक बेहद दिलचस्प उदाहरण था. इस सेट को इस तरह डिजाइन किया गया था कि कैमरे और कलाकारों की स्थिति के साथ पूरा भौतिक माहौल घूम सके. इसका मकसद कंप्यूटर पर बाद में कोई इफेक्ट जोड़ना नहीं, बल्कि शूटिंग के दौरान ही ऐसा विजुअल तैयार करना था, जो दर्शकों को सामान्य भौतिक विज्ञान के नियमों से अलग महसूस कराए.
क्या आज के महंगे VFX के मुकाबले तब 3D बनाना मुमकिन था?
आज के दौर में बनने वाली बड़े बजट की फिल्मों में वीएफएक्स और सीजीआई प्रोडक्शन कॉस्ट का सबसे बड़ा हिस्सा होते हैं. ऐसे समय में, जब साल 1984 में केवल 40 लाख रुपये में 3D का इतना बड़ा और सफल प्रयोग किया गया, तो यह बात अपने आप में बहुत अनोखी और प्रेरणादायक लगती है.
डिजिटल दौर में आज यही काम कंप्यूटर कैसे करता है?
यहीं से भारतीय सिनेमा के विजुअल इवोल्यूशन की असली कहानी शुरू होती है. आज उसी तरह के सीन्स के लिए वीएफएक्स टीम आसानी से डिजिटल परिवेश तैयार कर सकती है. किसी भी शहर को डिजिटली बनाया जा सकता है, बड़ी इमारतों को गिरते हुए दिखाया जा सकता है और किसी एक्टर को ऐसी लोकेशन पर रखा जा सकता है, जहां उसने वास्तव में शूट ही नहीं किया हो. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि प्रैक्टिकल इफेक्ट्स खत्म हो गए हैं, बल्कि आधुनिक सिनेमा में प्रैक्टिकल इफेक्ट्स और सीजीआई दोनों साथ मिलकर काम करते हैं.
तब शूटिंग में गलती की गुंजाइश कम क्यों होती थी?
साल 1984 और आज की फिल्म निर्माण प्रक्रिया के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि उस दौर में अगर कोई प्रैक्टिकल सेटअप कैमरे में सही तरीके से कैप्चर नहीं हुआ, तो उसे दोबारा सेट बनाकर री-शूट करना पड़ता था. आज वीएफएक्स के जरिए कई कमियों को पोस्ट-प्रोडक्शन में ही ठीक किया जा सकता है. इससे फिल्म मेकिंग की प्लानिंग खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया है. आज भी बड़े वीएफएक्स सीन्स के लिए प्री-विजुअलाइजेशन, मोशन कैप्चर और विस्तृत प्लानिंग की जरूरत पड़ती है.
नोलन की 'इन्सेप्शन' से पहले भारतीय सिनेमा ने क्या कर दिखाया था?
जब भी रोटिंग-रूम या ग्रेविटी को चुनौती देने वाले दृश्यों की बात होती है, तो क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म 'इन्सेप्शन' का नाम आसानी से याद आता है. लेकिन भारतीय सिनेमा में उससे कई दशक पहले ही 'माई डियर कुट्टी चेतन' जैसी फिल्म प्रैक्टिकल फिल्म मेकिंग के जरिए इसी तरह की विजुअल संभावनाओं को तलाश रही थी.
चार दशकों के इस सफर में सिनेमा में असल में क्या बदला?
वहीं सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि पहले फिल्म निर्माता को कैमरे के सामने दुनिया बनानी पड़ती थी, आज वह कंप्यूटर के अंदर भी पूरी दुनिया बना सकता है. पहले फिजिकल सेट घूमता था, आज डिजिटल परिवेश घूम सकता है. लेकिन इन सब के बीच एक चीज बिल्कुल नहीं बदली, वह दर्शक को चौंकाने और कहानी की दुनिया में खींच लेने की कोशिश है. साल 1984 का यह प्रयोग आज भी यह सीख देता है कि तकनीक का इंतजार करने के बजाय उपलब्ध साधनों से ही तकनीक जैसी दुनिया बनाई जा सकती है.
पृथ्वीराज सुकुमारन की पसंदीदा फिल्म कौन-सी है?
दरअसल मुंबई के ताज लैंड्स एंड में आयोजित 'एक्सप्रेसो' के 16वें संस्करण के दौरान द इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने एक्टर पृथ्वीराज सुकुमारन से पूछा कि यदि वे जादू से हर भारतीय को एक मलयालम फिल्म दिखा सकते, तो वह कौन सी होती?
एक्टर पृथ्वीराज सुकुमारन ने थोड़ा समय लिया और बताया कि वे निर्देशक जीजो पुन्नूस की साल 1984 में आई फिल्म 'माई डियर कुट्टी चेतन' होगी, जो भारत में बनी पहली 3D फिल्म है. इस फिल्म को चुनने के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि दशकों में कई बेहतरीन फिल्में बनी हैं, लेकिन वे खुद सिनेमा नॉस्टैल्जिया के बहुत बड़े प्रशंसक हैं. यह सिर्फ इसलिए नहीं कि यह एक बेहतरीन फिल्म है, बल्कि यह भारत की पहली 3D फिल्म है. मुझे नहीं पता कि कितने लोग जानते हैं कि मलयालम सिनेमा ने यह कारनामा कर दिखाया था.
क्या है फिल्म की कहानी और 'छोटा चेतन' का कनेक्शन?
मुख्य रूप से बच्चों की फैन्टेसी पर आधारित 'माय डियर कुट्टी चेतन' की कहानी एक जादुई पिशाच के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे दुष्ट जादूगर के चंगुल से बचाने के बाद वह तीन बच्चों का दोस्त बन जाता है. रघुनाथ पलेरी द्वारा लिखित और नवोदया स्टूडियो द्वारा निर्मित यह फिल्म मलयालम में सुपरहिट रही. साल 1988 में इसका हिंदी वर्जन 'छोटा चेतन' नाम से री-रिलीज हुआ, जिसमें स्थानीय दर्शकों के लिए कुछ नए सीन जोड़े गए थे और बाद के एक संस्करण में उर्मिला मातोंडकर ने भी अहम भूमिका निभाई थी.
कितनी रही इस ऐतिहासिक फिल्म की कमाई?
इस फिल्म को महज 40 लाख रुपये में बनाया गया था और इसने बॉक्स ऑफिस पर लगभग 2.5 करोड़ रुपये की बंपर कमाई की थी. इलैयाराजा द्वारा संगीतबद्ध गीत 'आलिप्पजम पेरुक्कन' में कुट्टीचाथन और बच्चों को दीवार पर चलते हुए दिखाया गया था, जिसके लिए स्टेनली कुब्रिक की '2001: ए स्पेस ओडिसी' की तर्ज पर रोटेटिंग सेट बनाया गया था. दुनिया भर में इसके लगभग 85,000 शो हुए और दर्शकों ने 4.3 करोड़ 3D चश्मों का इस्तेमाल किया. इसे बेस्ट बाल फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला.