App

आवारा कुत्तों को न तो मारा और न भगाया... भूटान ने कैसे खत्म किया रेबीज का खौफ? भारत के लिए बड़ा सबक

बिना किसी क्रूरता के भूटान ने वैज्ञानिक नसबंदी और 100% टीकाकरण अभियान से आवारा कुत्तों और रेबीज की समस्या पर काबू पा लिया है. जानिए भारत इस सफल मॉडल से क्या सीख ले सकता है.

आवारा कुत्तों को न तो मारा और न भगाया... भूटान ने कैसे खत्म किया रेबीज का खौफ? भारत के लिए बड़ा सबक
Image Credit: हमारे देश में भी हर दिन कुत्ते के काटने की खबरें आती हैं. अगर हमारे शहर और गांव भी भूटान जैसा तरीका अपनाएं, तो रेबीज का डर हमेशा के लिए खत्म हो सकता है. इसके लिए जरूरी है कि कुत्तों को मारने के बजाय उनकी नसबंदी की जाए और टीके लगाए जाएं.

रेबीज दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में शामिल है. यह वायरस संक्रमित जानवर के काटने या उसकी लार के संपर्क में आने से इंसानों तक पहुंचता है. समय पर इलाज नहीं मिलने पर यह बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा साबित होती है. भारत समेत कई देशों में आवारा कुत्ते रेबीज के संक्रमण का बड़ा कारण बने हुए हैं, लेकिन पड़ोसी देश भूटान ने इस समस्या से निपटने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है.

भूटान के लोगों ने कुत्तों को मारा नहीं और न ही उन्हें भगाया. उन्होंने एक-एक करके देश के सारे आवारा और पालतू कुत्तों को पकड़ा, उन्हें रेबीज का टीका लगाया और उनकी नसबंदी (ऑपरेशन) कर दी. नसबंदी होने से नए पिल्ले पैदा होना बंद हो गए और कुत्तों की संख्या अपने आप कम होने लगी. वहीं, टीका लगने से वे कुत्ते बीमारी फैलाने लायक ही नहीं रहे. भूटान की सरकार, डॉक्टरों और वहां की जनता ने मिलकर काम किया. उन्होंने सिर्फ बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे गांवों में जाकर भी कुत्तों को टीके लगाए. लोगों को समझाया गया कि कुत्तों से डरने या उन्हें मारने के बजाय, उन्हें टीका लगवाने में मदद करें.

भारत के लिए बड़ा सबक है

भारत में हर साल आवारा कुत्तों के काटने और रेबीज के हजारों मामले सामने आते हैं. हमारे यहां अलग-अलग राज्यों में इस पर काम तो हो रहा है, लेकिन कोई ठोस और एक समान व्यवस्था नहीं है. भूटान का मॉडल दिखाता है कि सिर्फ कुत्तों की संख्या कम करना काफी नहीं है, बल्कि लगातार नसबंदी और टीकाकरण ही इसका स्थाई हल है. अगर भारत को रेबीज से मुक्ति चाहिए तो सभी राज्यों को एक साथ मिलकर काम करना होगा. स्थानीय निकायों को इसके लिए बजट, सही संसाधन और प्रशिक्षित टीमें देनी होंगी. इसके अलावा आम लोगों को भी जागरूक करना होगा कि कुत्ता काटने पर बिना लापरवाही किए तुरंत डॉक्टर के पास जाएं और टीका लगवाएं. भूटान की यह सीख भारत के लिए बेहद काम की साबित हो सकती है.

भारत को लेनी चाहिए सीख

भारत में हर साल बड़ी संख्या में लोग कुत्तों के काटने के बाद रेबीज के खतरे का सामना करते हैं. देश के कई शहरों में आवारा कुत्तों की आबादी और उनके टीकाकरण को लेकर लंबे समय से चुनौती बनी हुई है. भूटान का अनुभव बताता है कि समस्या का स्थायी समाधान केवल कुत्तों की संख्या कम करने में नहीं, बल्कि व्यापक और लगातार चलने वाले टीकाकरण कार्यक्रम में है. इसके लिए स्थानीय निकायों को पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारियों और बेहतर निगरानी व्यवस्था की जरूरत है.

बड़े स्तर पर अभियान की जरूरत

भारत में रेबीज नियंत्रण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई कार्यक्रम चलाए हैं, लेकिन उनकी पहुंच और प्रभावशीलता अलग-अलग राज्यों में अलग है. विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सभी राज्यों में कुत्तों का नियमित टीकाकरण, नसबंदी और निगरानी एक समन्वित योजना के तहत की जाए तो रेबीज के मामलों में बड़ी कमी लाई जा सकती है.
इसके अलावा, कुत्ते के काटने के बाद तुरंत चिकित्सा सहायता लेने को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है. समय पर वैक्सीन और आवश्यक उपचार मिलने से संक्रमण को रोका जा सकता है.

भूटान ने अपनाई अलग रणनीति

भूटान ने रेबीज को खत्म करने के लिए केवल आवारा कुत्तों को हटाने या मारने पर निर्भर रहने के बजाय बड़े स्तर पर टीकाकरण और नसबंदी कार्यक्रम शुरू किया. सरकार ने कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के साथ-साथ उन्हें रेबीज से बचाने पर भी ध्यान दिया. इस अभियान में आवारा और पालतू दोनों तरह के कुत्तों को शामिल किया गया. बड़े पैमाने पर टीकाकरण के जरिए संक्रमण की संभावना कम की गई और नसबंदी के माध्यम से आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण पाया गया.

नसबंदी और टीकाकरण बना अभियान का आधार

भूटान की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था कुत्तों की सामूहिक नसबंदी. इसके जरिए आवारा कुत्तों की संख्या को धीरे-धीरे नियंत्रित किया गया. साथ ही, नियमित टीकाकरण से रेबीज वायरस के प्रसार को रोकने में मदद मिली. इस मॉडल में स्थानीय प्रशासन, पशु चिकित्सकों और स्वयंसेवी संगठनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. सरकार ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि अभियान केवल राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि दूरदराज के इलाकों तक भी पहुंचे.

भूटान का मॉडल क्यों महत्वपूर्ण है

भूटान ने दिखाया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक रणनीति और सामुदायिक भागीदारी के साथ रेबीज जैसी बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है. भारत के लिए यह अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों में भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में कई समानताएं हैं. अगर भारत भी स्थानीय स्तर पर लगातार टीकाकरण और नसबंदी कार्यक्रमों को मजबूत करे, तो कुत्तों से फैलने वाली रेबीज की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. यह सिर्फ पशु नियंत्रण का मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौती है.

भूटान ने कैसे पाई कामयाबी

भूटान ने कुत्तों को मारने या हटाने के बजाय एक वैज्ञानिक और मानवीय रास्ता चुना. उन्होंने पूरे देश में कुत्तों के टीकाकरण और नसबंदी का एक बड़ा अभियान चलाया. इसमें पालतू और आवारा, दोनों तरह के कुत्तों को शामिल किया गया. नसबंदी से आवारा कुत्तों की तादाद पर लगाम लगी और समय पर लगे टीकों से रेबीज का खतरा खत्म हो गया. इस अभियान को कामयाब बनाने में डॉक्टरों, स्थानीय प्रशासन और समाजसेवी संस्थाओं ने मिलकर काम किया. भूटान सरकार ने यह ध्यान रखा कि यह मुहिम सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचे. इसके साथ ही लोगों को जागरूक किया गया कि वे कुत्तों से डरने या उन्हें नुकसान पहुंचाने के बजाय टीकाकरण में सहयोग करें.

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

Ravindra Pratap Singh

Ravindra Pratap Singh

रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
Read More