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क्या 'ड्रैगन' की चाल में फंस गया है अमेरिका? एफ-35 के पुर्जे चोरी होने से मचा हड़कंप, अपने सीक्रेट्स लीक होने का डर

US F35 Jet Parts Theft News: क्या अमेरिका ड्रैगन यानी चीन की चाल में फंस गया है? यह सवाल एफ-35 के पुर्जे चोरी होने के बाद पूछा जा रहा है, जिससे यूएस में हड़कंप मचा हुआ है.

Edited By Devinder Kumar
Published: Sep 20, 2026, 02:03 AM IST | Updated: Sep 20, 2026, 02:08 AM IST
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US F35 Jet Parts Theft Latest Updates: दुनिया में हथियारों की रेस में आगे निकलने की होड़ मची है. अमेरिका, चीन, रूस जैसे देश अपने हथियारों को बेहतर बता कर बेच भी रहे हैं. इन देशों के बीच एक दूसरे के हथियारों की तकनीक पाने के लिए साम दाम दंड भेद का खेल भी चल रहा है. सारी कोशिश है कि दुनिया की सबसे अच्छी तकनीक से लैस हथियार ये देश बना पाएं.

अमेरिका जिस F35 को लेकर पूरी दुनिया में अपना दबदबा दिखाता है. उसी F35 फाइटर जेट को लेकर बवाल मचा है. अमेरिकी सरकार और F35 बनाने वाली कंपनी आमने-सामने है. दोनों के बीच टकराव की वजह क्या है .... वजह है चीन. चीन ने F35 को लेकर कुछ ऐसा किया है कि अमेरिकी अधिकारियों के होश फाख्ता हैं. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा है कि आखिर ड्रैगन की इस चाल का अमेरिका कैसे जवाब दे.

मिडिल ईस्ट में मचने वाली है खलबली

इस चाइनीज कांड के बीच मिडिल ईस्ट में तस्वीर बदलने के संकेत मिल रहे हैं. ताज्जुब की बात है कि ये मसला भी अमेरिका फाइटर F35 से ही जुड़ा है. ईरान जंग के बीच अमेरिका ने एक ऐसा फैसला लिया है जिससे युद्ध और भड़क सकता है. अगर ईरान भड़का तो मिडिल ईस्ट के आसमान में सिर्फ मिसाइलें और तबाही ही नजर आएगी. ये जानते हुए भी अमेरिका ईरान के दुश्मनों को एक ऐसा हथियार देने जा रहा है. जो ईरान को कई गहरे जख्म पहले ही दे चुका है. ये जंग ऐसे ही चलती रही तो ईरान को और भी जख्म मिल सकता है.  

आज हम आपको जी स्पेशल में बताएंगे कि अमेरिका और चीन ने ऐसा क्या किया है कि F35 को लेकर सनसनी है. क्या चीन ने F35 से घातक हथियार तैयार कर लिया है या फिर उसने कुछ ऐसा किया है जिससे F35 की डिमांड कम हो सकती है. इसके साथ ही आपको बताएंगे की अमेरिका जंग के बीच मिडिल ईस्ट के किस देश को अपना सबसे घातक हथियार दे रहा है. जो इस जंग को भड़का सकता है.

अमेरिका का स्टेल्थ फाइटर जेट F35, रूस का खतरनाक सुखोई SU 57, चीन का J 20 और J 35 और फ्रांस का राफेल दुनिया के फाइटर जेट हैं. जिन्हें अब तक के सबसे घातक लड़ाकू जहाजों में शामिल किया जाता है. लेकिन मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अमेरिका के F35 फाइटर जेट की हो रही है.

F35 पर ड्रैगन की टेढ़ी नजर

इसी F35 पर ड्रैगन की टेढ़ी नजर भी है. चीन वैसे तो कहता आ रहा है कि वो F35 को टक्कर देने वाला J 20 और J35 तैयार कर चुका है. उसके बाद भी वो F35 की तकनीक के पीछे पड़ा है. इसके लिए वो अब चोरी तक करने पर उतर आया है. सुनकर हैरान जरूर हो रहे होंगे, लेकिन हाल की घटना इसी तरफ इशारा कर रही है.

दरअसल F-35 के कुछ पुर्जे ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका भेजे जा रहे थे. लेकिन अचानक से हवा में उनका रास्ता बदल गया और वो हॉन्ग कॉन्ग पहुंच गया. फिर वहां वो पार्ट चोरी हो गए. यहीं पूरी कहानी में एंट्री होती है चीन की.

अमेरिका के मुताबिक F35 लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी लॉकहीड मार्टिन की ओर से इन पुर्जों को एक बिचौलिया लेकर अमेरिका आ रहा था. लेकिन अचानक से वो इन पुर्जों को लेकर हॉन्ग कॉन्ग पहुंच गया. जिसके बाद अमेरिका के पास इन पुर्जों को लेकर कोई अपडेट नहीं है.

F-35 की कैनोपी को लेकर चिंता

सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि इस खेप में F-35 की कैनोपी भी शामिल है, जो कॉकपिट को ढकती है. पायलट इसी पारदर्शी आवरण से बाहर के हालात पर नजर रखता है. इसमें कई ऐसी गुप्त तकनीक मौजूद है, जिस तक सिर्फ अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ही पहुंच है. अगर दुश्मन के पास ये कैनोपी आती है तो वो इसके पुर्जों का अध्ययन करके संभावित रूप से इस बहुमूल्य तकनीक की रिवर्स इंजीनियरिंग कर सकता है.

अमेरिका दुनिया के कई देशों को F35 लड़ाकू जहाज बेच चुका है और कई अन्य को बेचने वाला है. ऐसे में F-35 के पुर्जों की मरम्मत भी अलग-अलग देशों में स्थित फैसिलिटियों में होती है. हालांकि ऑस्ट्रेलिया में F-35 का मेंटीनेंस डिपो है, लेकिन उनमें से कोई भी अभी तक कैनोपी की मरम्मत करने में सक्षम नहीं है. इसीलिए उसे अमेरिका लाया जा रहा था. लेकिन यहीं से अमेरिका से साथ हो जाता है बड़ा गेम.

आइए अब आपको थोड़ा F-35 की कैनोपी की खासियत बताते हैं. कॉकपिट के ऊपर कैनोपी देखने में तो सिर्फ एक कांच जैसा हिस्सा लगता है, लेकिन इसमें विमान की स्टील्थ क्षमता से जुड़ी खास तकनीक मौजूद होती है.

क्यों बेहद खास होती है कैनोपी?

कैनोपी पर पारदर्शी रडार-एब्जॉर्बेंट सामग्री की बेहद पतली परत होती है. इसका मकसद विमान को दुश्मन के रडार से छिपाने में मदद करना है. समय के साथ इस तकनीक की क्षमता कम हो सकती है, इसलिए कैनोपी की मरम्मत या उसे बदलने की जरूरत पड़ती है. यही वजह है कि किसी असली F-35 कैनोपी का किसी दुश्मन के प्रभाव वाले इलाके तक पहुंच जाना अमेरिकी अधिकारियों के लिए बड़ी चिंता बन गया है.

अमेरिका जानता है कि चीन पहले से इलेक्ट्रॉनिक जासूसी समेत दूसरे तरीकों से F-35 की जानकारी हासिल करने की कोशिश करता रहा है. लेकिन चीन कभी एक हद से ज्यादा जासूसी करने में कामयाब नहीं हुआ है. हाल के दिनों में वो फाइटर जेट के सीक्रेट हासिल  करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखा है.

अमेरिका के पूर्व हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के स्टाफ सदस्य और सैन्य विमानन विश्लेषक जे.जे. गर्टलर के मुताबिक अगर किसी के पास पहले से इस पार्ट की कुछ जानकारी है, तो असली पार्ट मिलने से वो जानकारी को जांचने और ज्यादा सटीक बनाने में मदद मिल सकती है. जब वो देश चीन हो तो ऐसे में आशंका ये भी बढ़ जाती है कि शायद वो इससे भी बेहतर बना कैनोपी बना सके. अमेरिका को इसी बात का डर भी सता रहा है.

पांच साल में 10 लाख पार्ट्स हुए गायब

हॉन्ग कॉन्ग से F35 के पार्ट चोरी होने पर हायतौबा करने वाला अमेरिका जब से F35 बना रहा है तब से वो इसके पार्ट और तकनीक को लेकर बहुत ही ज्यादा संजीदा है. फाइटर जेट बेचने से लेकर मेंटेनेंस तक अमेरिका अपनी ही शर्तों से करता है. लेकिन हैरान करने वाली बात ये है उसके बाद भी अमेरिका के इस आधुनिक फाइटर जेट के पुर्जों की चोरी हो रही है.

हॉन्ग कॉन्ग वाली घटना ने F-35 के स्पेयर पार्ट्स की निगरानी को लेकर पुराने सवाल भी सामने ला दिए हैं. 2023 में अमेरिका की गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस रिपोर्ट के मुताबिक, पांच साल में 10 लाख से ज्यादा F-35 के स्पेयर पार्ट्स गायब हुए.

रिपोर्ट में कहा गया कि पेंटागन करोड़ों डॉलर के इन पार्ट्स के नुकसान की पूरी जांच नहीं कर पाया, क्योंकि इनकी जानकारी लॉकहीड मार्टिन के नियंत्रण में थी. F-35 ज्वाइंट प्रोग्राम ऑफिस खुद इन स्पेयर पार्ट्स का पूरा रिकॉर्ड ऐसे सिस्टम में नहीं रखता, जिससे हर समय ये पता चलता रहे कि कौन सा पार्ट कहां है और उसकी स्थिति क्या है.

ट्रंप प्रशासन और कंपनी में बढ़ी असहमति

गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा इंजन से जुड़े पार्ट्स, लैंडिंग गियर, टायर, बोल्ट, स्क्रू फास्टनर गायब थे. गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस की इस रिपोर्ट के बाद लॉकहीड मार्टिन और अमेरिकी सरकार के बीच का मतभेद भी सामने आ गया.

सरकार का मानना था कि ये स्पेयर पार्ट्स सरकारी संपत्ति हैं और इसलिए इन्हें सरकारी सिस्टम में दर्ज करके इनके नुकसान की रिपोर्टिंग होनी चाहिए. लेकिन संबंधित संगठनों और कॉन्ट्रैक्टर के बीच इस बात पर सहमति नहीं थी कि इन सभी पार्ट्स को Government-Furnished Property के रूप में किस तरह अलग अलग कैटेगरी में बांटा जाए.

इस असहमति का सीधा असर ट्रैकिंग और सॉल रिपोर्ट पर पड़ा. इसके साथ ही बेकार या अनुपयोगी पार्ट का कानूनी और वित्तीय तरीके से निपटारे को लेकर भी कंपनी और सरकार में विवाद था. जो अब तक चला ही आ रहा है. हालांकि गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस ने इस विवाद को खत्म करने के लिए सुझाव दिए थे, जिससे विवाद को खत्म करने में मदद मिल सके.

अमेरिकी हथियारों पर चीन की टेढ़ी नजर

किसी तरह सुपरपावर बनने को बेचैन चीन की नजर हमेशा से अमेरिका के हथियारों पर रही है. इसीलिए चीन अमेरिकी तकनीक को पाने के लिए किसी भी हद तक सकता है. फिर चाहे उसे चोरी करवानी पड़े या फिर बेकार हो चुके हथियारों को ही खरीदना पड़े. यही कारण है कि चीन के कई हथियार अमेरिकी और रूसी हथियारों से मेल खाते हैं.

साल 2011 में पाकिस्तान में अमेरिका ने बड़ा ऑपरेशन किया था. उसका टारगेट ओसामा बिन लादेन था. एबटाबाद में अमेरिका कमाडोज़ ने बेहद गोपनीय ऑपरेशन को अंजाम देते हुए ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था. लेकिन इस ऑपरेशन में इस्तेमाल किए गए हेलिकॉप्टरों में से एक दुर्घटनाग्रस्त हो गया. ये कोई सामान्य Black Hawk नहीं था.

माना गया कि इसमें ऐसी मोडिफिकेशन की गई थीं, जिनसे उसकी रडार विजिविलिटी कम हो सके. अमेरिकी कमांडो इस क्षतिग्रस्त हेलिकॉप्टर को पूरी तरह अपने साथ नहीं ले जा सके. बाद में अमेरिका ने उसके संवेदनशील हिस्सों को नष्ट कर दिया. लेकिन हेलिकॉप्टर का टेल सेक्शन काफी हद तक बच गया.

तकनीक चोरी में माहिर है 'ड्रैगन'

यहीं से शुरू हुआ चीन का असली खेल. 2011 में अमेरिकी मीडिया में ऐसी रिपोर्टें सामने आईं कि पाकिस्तान ने चीन के सैन्य अधिकारियों को इस हेलिकॉप्टर के मलबे का निरीक्षण करने दिया. रिपोर्टों में दावा किया गया कि चीनी अधिकारियों ने हेलिकॉप्टर की तस्वीरें लीं और उसकी बाहरी स्टेल्थ स्किन के नमूने तक लिए. जिसके बाद उसके रिवर्स इंजीनियरिंग करके उसने Black Hawk जैसा ही अपना हेलिकॉप्टर तैयार किया.

चीन पर अक्सर तकनीक हासिल करने का आरोप लगता रहा है. कभी मलबे से तकनीक हासिल करने का आरोप, कभी विदेशी हथियारों की लाइसेंस्ड कॉपी, कभी रिवर्स इंजीनियरिंग, कभी साइबर जासूसी का आरोप लगा. कभी संवेदनशील तकनीकी दस्तावेजों की चोरी का भी आरोप लगा.

चीन का J11, J-15,  HQ-9 इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. 1990 के दशक में चीन ने रूस से Su-27 फाइटर जेट लिया. फिर दोनों देशों के बीच लाइसेंस प्रोडक्शन एग्रीमेंट हुआ. जिसके बाद चीन में Su-27 के आधार पर J-11 का उत्पादन शुरू हुआ. यहीं से असल विवाद शुरू हुआ.

रूस को भी धोखा दे चुका है चीन

रिपोर्ट के मुताबिक चीन लाइसेंस प्रोडक्शन से आगे बढ़कर J-11 के ऐसे इंडीजीनियश वर्जन विकसित किया, जिसमें अपना रडार, हथियार और दूसरे सिस्टम को लगाया. जबकि डील में ये शामिल नहीं था.

ऐसा ही J15 के साथ भी हुआ. सोवियत संघ के टूटने के बाद कई स्वतंत्र देश बने. अलग-अलग देशों को सोवियत युग के हथियार और फाइटर जेट मिले. यूक्रेन के पास Su-33 का एक अन फिनिश्ड प्रोटोटाइप था. जिसे चीन ने 2001 में हासिल किया.

अमेरिकी की ओपेन सोर्स इंटेलीजेंस के मुताबिक चीन ने इस प्रोटोटाइप का अध्ययन किया और इसके आधार पर J-15 विकसित किया. J-15 का एयरफ्रेम Su-33 से काफी मिलता-जुलता है. HQ-9 भी रूस के S300 का कॉपी वर्जन है. जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में पूरी तरह से फेल हुआ था. अमेरिका में चोरी हुए F35 के पार्ट को लेकर भले ही हल्ला मचा है.

कितनी कीमत है F-35A की?

F 35 अमेरिका का 5वीं पीढ़ी का मल्टीरोल स्टील्थ फाइटर है. इसे बनाने वाली कंपनी लॉकहीड मार्टीन इसे तीन वेरिएंट में बनाती है. जिसका पहला वर्जन F-35A है.. जो सामान्य रनवे से टेकऑफ और लैंडिंग के लिए जाना जाता है. इसका दूसरा वर्जन F-35B है. ये छोटे रनवे से ऑपरेशन और वर्टिकल लैंडिग में सक्षम है. तीसरा वर्जन F-35C है, इसे एयरक्राफ्ट से ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है.

F-35 की सबसे बड़ी खासियत स्टेल्थ पावर है, जो इसे आसमान का सिकंदर बनाती है. आसमान में इसे रडार पकड़ नहीं पाता है. इसके साथ ही सेंसर फ्यूजन डेटा शेयरिंग जैसे तमाम खासियत इसे किलर फाइटर जेट बनाती है.

अगर इस घातक जेट के कीमत की बात की जाए तो F-35A  की कीमत 8 अरब रूपये है. F-35B की कीमत 1,046 करोड़ रुपये है जबकि F-35C की कीमत करीब ₹988.14 करोड़ रूपये है. इसका इस्तेमाल अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड्स, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, नॉर्वे, इजरायल, जापान  जैसे देश करते हैं.

अमेरिका- इजरायल ने इसका इस्तेमाल ऑपरेशन फ्यूरी में किया था. ISIS के खिलाफ भी अमेरिका ने ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व में भी F-35 फाइटर जेट का इस्तेमाल किया था. ऑपरेशन शेडर में ब्रिटेन ने इराक और सीरिया में इसी जेट से दुश्मनों पर हमला किया था. आने वाले दिनों में दुनिया के और भी देश इस आसमान के सिकंदर का इस्तेमाल करते नजर आएंगे.

ब्यूरो रिपोर्ट ज़ी मीडिया 
 

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About the Author

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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