Tata Sons IPO News: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की तरफ से टाटा संस की उस कंपनी को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने बिना लिस्ट किये प्राइवेट रहने की छूट मांगी थी. आरबीआई (RBI) की तरफ से यह कदम उठाए जाने के बाद टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons) के शेयर बाजार में लिस्ट होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं. इस फैसले के बाद टाटा ग्रुप की मुश्किलें बढ़ गई हैं और अब टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होना पड़ सकता है. टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड ने रिजर्व बैंक (RBI) के पास दाखिल याचिका में रेगुलेटरी नियमों को लेकर छूट मांगी थी. पिछले कई साल से टाटा ग्रुप की यह होल्डिंग कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचती रही है. हालिया घटनाक्रम के बाद यही सवाल उठ रहे हैं कि कंपनी आखिर प्राइवेट क्यों रहना चाहती है? RBI के नियमों के तहत लिस्टिंग क्यों जरूरी होती है और यदि टाटा संस का IPO आता है तो टाटा ग्रुप, निवेशकों और शेयरहोल्डर्स पर क्या असर पड़ेगा?
टाटा संस, टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है. यह ग्रुप की वही कंपनी है जिसके जरिये टाटा ग्रुप की कई बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी रखी जाती है. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाटा कंज्यूमर और टाटा कैपिटल जैसी कंपनियों के साथ टाटा संस का कारोबारी और मालिकाना संबंध है. टाटा ग्रुप का कारोबार आईटी, ऑटो मोबाइल, स्टील, बिजली, होटल, विमानन, फाइनेंशियल सर्विसेज और कंज्यूमर प्रोडक्ट्स जैसे कई सेक्टर में फैला है. ऐसे में टाटा संस को पूरे ग्रुप की दिशा तय करने वाली अहम कंपनी माना जाता है.
टाटा संस की खासियत यही है कि यह लंबे समय से प्राइवेट कंपनी के रूप में काम करती रही है. प्राइवेट कंपनी का सीधा सा मतलब यह हुआ कि इसके शेयर आम निवेशकों के लिए शेयर बाजार में खरीदने-बेचने के लिए उपलब्ध नहीं हैं. हालांकि, कंपनी की हिस्सेदारी कुछ प्रमुख संस्थागत और स्ट्रेटजिक शेयरहोल्डर्स के पास है. इनमें टाटा ट्रस्ट की भूमिका अहम है.
टाटा संस के शेयर बाजार में लिस्ट नहीं होने का मामला कई साल से चल रहा है. पिछले कुछ साल से कंपनी और RBI के बीच इसके रेग्युलेटरी स्टेटस और लिस्टिंग की जरूरत को लेकर चर्चा होती रही है. फाइनेंशियल सेक्टर में एनबीएफसी (NBFC) के लिए आरबीआई (RBI) ने कई नियम बनाए हैं. इनका मकसद ऐसी कंपनियों की निगरानी बढ़ाना है जिनकी गतिविधियां फाइनेंशियल सिस्टम पर बड़ा असर डाल सकती हैं. आरबीआई (RBI) ने टाटा संस को ‘अपर लेयर NBFC’ के रूप में कैटेगराइज किया था. इस कैटेगरी में शामिल कंपनियों के लिए कैपिटल, रिस्क कैपिटल, कॉरपोरेट गवर्नेंस और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़े नियम ज्यादा सख्त होते हैं. नियमों के अनुसार इस कैटेगरी में आने वाली कंपनियों को तय समयसीमा के अंदर शेयर बाजार में लिस्ट होना पड़ सकता है.
साल 2018 में इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (IL&FS) ग्रुप के डिफॉल्ट संकट ने भारतीय फाइनेंशियल सिस्टम के सामने कई गंभीर सवाल खड़े किये थे. IL&FS से जुड़े संकट ने दिखाया कि बड़ी एनबीएफसी कंपनियों की फाइनेंशियल स्थिति खराब होने पर उसका असर केवल उसी कंपनी तक सीमित नहीं रहता. इससे बैंकों, निवेशकों, म्यूचुअल फंड्स और पूरे फाइनेंशियल मार्केट पर दबाव पड़ सकता है. इसके बाद आरबीआई (RBI) ने बड़े और प्रणालीगत रूप से अहम NBFCs की निगरानी मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए. इनमें NBFC को अलग-अलग लेवल में बांटना और बड़े संस्थानों के लिए अतिरिक्त नियम लागू करना शामिल था. अपर लेयर NBFCs के लिए लिस्टिंग की जरूरत इसी का हिस्सा है. इसका मकसद ऐसी कंपनियों की फाइनेंशियल सिचुएशन, रिस्क और कारोबारी गतिविधियों पर बाजार और नियामकों की नजर बनी रहे.
यह सवाल इसलिए खास है क्योंकि टाटा संस खुद आम लोगों को बड़े लेवल पर पर्सनल लोन देने वाली कंपनी के रूप में नजर नहीं आती. टाटा संस का अहम काम टाटा ग्रुप की अलग-अलग कंपनियों में निवेश और होल्डिंग से जुड़ा है. इस तरह की कंपनियों को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में देखा जा सकता है. सीआईसी (CIC) का कारोबार अहम रूप से ग्रुप की कंपनियों में निवेश करने और उनकी हिस्सेदारी बैन करने से जुड़ा होता है. लेकिन यदि ऐसी कंपनी फाइनेंशियल एक्टिविटी, निवेश और ग्रुप के फाइनेंशियल स्ट्रक्चर में अहम भूमिका निभाती है तो सवाल उठ सकते हैं. आरबीआई का यही मानना है कि किसी कंपनी की निगरानी केवल इस बेस पर नहीं होनी चाहिए कि वह खुद कितना लोन देती है. यह भी देखा जाना चाहिए कि वह पूरे ग्रुप का फाइनेंशियल स्ट्रक्चर में कितनी अहम है. यही कारण है कि टाटा संस का अपना लोन कम होना या कुछ फाइनेंशियल एक्टिविटी से पीछे हटना, अपने आप में उसे नियामकीय दायरे से बाहर करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता.
टाटा संस लंबे समय से शेयर बाजार में सीधे लिस्टिंग से बचने के ऑप्शन तलाशती रही है. इसके पीछे कंपनी का फाइनेंशियल स्ट्रक्चर, मालिकाना हक और स्ट्रैटजिक कंट्रोल से जुड़े कई कारण हैं.
कंपनी की तरफ से फाइनेंशियल बिजनेस से संबंधित स्ट्रक्चर में बदलाव के ऑप्शन भी तलाशे गए. हालांकि, टाटा ग्रुप की दूसरी कंपनियों की एक्टिविटी को देखते हुए यह मामला केवल टाटा संस की बैलेंस शीट तक सीमित नहीं रहता.
टाटा संस के मामले में टाटा कैपिटल का जिक्र इसलिए अहम है क्योंकि यह टाटा ग्रुप की प्रमुख फाइनेंशियल सर्विस कंपनियों में से एक है. टाटा कैपिटल लोन, फाइनेंशियल सर्विस और दूसरी फाइनेंशियल एक्टिविटी से जुड़ा कारोबार करती है. इसके जरिये टाटा ग्रुप का फाइनेंशियल सेक्टर में अहम एक्सपोजर है. यह कंपनी टाटा ग्रुप के फाइनेंशियल स्ट्रक्चर में अहम भूमिका निभाती है और उससे जुड़ी कंपनियां फाइनेंशियल एक्टिविटी करती हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि टाटा संस और टाटा कैपिटल एक ही कंपनी हैं. दोनों का अपना अलग-अलग स्ट्रक्चर और जिम्मेदारियां हैं. लेकिन होल्डिंग कंपनी और उसकी प्रमुख कंपनियों के बीच अहम हो सकते हैं.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर टाटा संस शेयर बाजार में लिस्ट होना क्यों नहीं चाहती? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. आइए एक नजर डालते हैं इन कारणों पर-
टाटा संस में टाटा ट्रस्ट की अहम हिस्सेदारी है. कंपनी के शेयर बाजार में आने के बाद उसके शेयरों की खरीद-बिक्री बढ़ सकती है. इससे नए निवेशक कंपनी में हिस्सेदारी हासिल कर सकते हैं. लिस्टिंग के बाद कंपनी के शेयरहोल्डर्स का दायरा बढ़ेगा और आने वाले समय में हिस्सेदारी में बदलाव की संभावनाएं बनेंगी. ऐसे में मौजूदा शेयरहोल्डर्स के लिए कंट्रोल और मालिकाना संरचना का अहम बढ़ जाता है.
प्राइवेट कंपनी के तौर पर टाटा संस को अपने लॉन्ग टर्म के कारोबारी फैसले लेने में ज्यादा स्वतंत्रता मिलती है. होल्डिंग कंपनियां कई बार अपने प्रॉफिट को नए कारोबार, रणनीतिक निवेश या कम प्रॉफिट वाले अहम सेक्टर में लगा सकती हैं. अगर कंपनी लिस्ट हो जाती है तो उसके फाइनेंशियल डिसीजन, इन्वेस्टमेंट और कैपिटल के इस्तेमाल पर पब्लिक शेयरहोल्डर्स की नजर बढ़ जाएगी. इससे मैनेजमेंट को ज्यादा जवाबदेही के साथ फैसले लेने पड़ सकते हैं.
शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों को अपने फाइनेंशियल रिजल्ट, अहम कारोबारी घटनाएं और अन्य जरूरी सूचनाएं सार्वजनिक करनी होती हैं. इससे निवेशकों को कंपनी की फाइनेंशियल सिचुएशन, प्रॉफिट, लोन, निवेश और रिस्क की जानकारी मिलती है. लेकिन होल्डिंग कंपनी के लिए इसका दूसरा पहलू भी है. उसकी निवेश रणनीति, ग्रुप की कंपनियों से जुड़े ट्रांजेक्शन और फाइनेंशियल डिसीजन पर बाजार की नजर बढ़ जाती है. टाटा संस जैसी बड़ी होल्डिंग कंपनी के लिए यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण हो सकता है.
लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की कीमत रोजाना बाजार में बदलती है. कंपनी के प्रदर्शन, ग्रुप की किसी दूसरी कंपनी की खबर, आर्थिक परिस्थितियों या निवेशकों की धारणा का असर शेयर मूल्य पर पड़ सकता है. प्राइवेट कंपनी होने पर टाटा संस को शेयर मार्केट में रोजाना शेयर मूल्य के दबाव का सामना नहीं करना पड़ता. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि प्राइवेट कंपनी पर किसी तरह की जवाबदेही नहीं होती. लेकिन लिस्टिंग वाली कंपनी की जिम्मेदारियां अलग तरह की होती हैं.
अगर टाटा संस शेयर बाजार में लिस्टेड होती है तो इसका असर केवल कंपनी तक ही सीमित नहीं रहेगा. पूरे टाटा ग्रुप पर इसका असर पड़ सकता है.
टाटा संस का IPO आता है तो यह भारतीय शेयर बाजार के लिए बड़ा अपडेट हो सकता है. टाटा ब्रांड की मजबूत पहचान और ग्रुप की बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी के कारण निवेशकों की दिलचस्पी इस आईपीओ में बढ़ सकती है. लेकिन किसी भी IPO में निवेश करने से पहले कंपनी की फाइनेंशियल सिचुएशन, वैल्यूएशन, शेयर के दाम, कारोबार की संभावनाओं और रिस्क का आकलन करना जरूरी होता है. केवल किसी बड़े कारोबारी ग्रुप का हिस्सा होने से किसी कंपनी का शेयर में अच्छा निवेश नहीं होता. आईपीओ (IPO) आने की स्थिति में यह भी देखना होगा कि शेयर नए जारी किये जा रहे या मौजूदा शेयरहोल्डर्स ही अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं.