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Explainer: ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी पर लीगल वॉल! 2023 के कानून ने अटकाया विपक्ष का प्लान; मगर क्यों इस याचिका ने कहा- इस लॉ में लूपहोल

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी के आरोपों और राहुल गांधी की 'सरकारी गवाह' बनने की चेतावनी के बीच बड़ा विवाद छिड़ गया है. जानिए 2023 कानून की धारा 16 का सुरक्षा कवच क्या है और सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर क्या याचिका दायर की गई है.

Written By Rachit Kumar
Published: Sep 26, 2026, 08:24 AM IST | Updated: Sep 26, 2026, 09:15 AM IST
Image Credit: सीईसी ज्ञानेश कुमार विपक्षी पार्टियों के रडार पर हैं.
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वोट चोरी के आरोपों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सवालों के घेरे में हैं. विपक्ष लगातार उन पर हमलावर है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को चेतावनी दी और एक सुझाव देते हुए कहा, 'वो समय आएगा, हम आपको पकड़ लेंगे.' इसके बाद उन्होंने सलाह दी कि वोटर लिस्ट में कथित हेरफेर के मामले में सरकारी गवाह बन जाएं'.

राहुल ने की CEC की गिरफ्तारी की मांग

गांधी ने सबसे पहले पिछले साल लोकसभा में तीन सदस्यीय चुनाव आयोग को यह चेतावनी दी थी. नौ महीने बाद, 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अंदर असहमति का खुलासा होने के बाद, विपक्ष ने अपनी बात सही साबित होने का दावा करते हुए ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग की है. लेकिन इससे पहले कि बीजेपी बचाव में उतरती, गिरफ्तारी की मांग एक कानूनी प्रावधान से टकरा गई. यह कानूनी प्रावधान है दिसंबर 2023 में संसद की ओर से पारित कानून की धारा 16. इस धारा के बारे में आपको समझाएंगे और यह भी बताएंगे कि क्यों एक नई याचिका में इस प्रावधान में एक लूपहोल बताया गया है. लेकिन पहले जानिए कि आखिर विवाद क्या है?

पहले समझिए कहां से उठा विवाद?

यह नया विवाद 23 सितंबर को तब शुरू हुआ, जब द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार (एक ही दिन में चार बार) लिखित रूप में अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं. ये आपत्तियां वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के तरीके जैसे मुद्दों पर थीं. हालांकि, संधू और जोशी ने इन आपत्तियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है.

विपक्षी नेताओं ने भर-भरकर लगाए आरोप

राहुल गांधी के अलावा, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, AAP के अरविंद केजरीवाल और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी उन प्रमुख नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए वोटर लिस्ट में हेरफेर का आरोप लगाया है. विपक्ष का कहना है कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया के तहत अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाए जा चुके हैं, जो भारत के कुल मतदाताओं का लगभग 13 प्रतिशत है. दिल्ली में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा रहा है, जहां SIR से पहले के हर तीन मतदाताओं में से एक को ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर कर दिया गया, और बाकी बचे लोगों में से एक-तिहाई को विसंगतियों के लिए नोटिस मिले हैं.

ईसी बोला- अलग राय होना सामान्य बात

नए वोटरों को रजिस्टर करने वाले 'फॉर्म 6' में बदलाव को लेकर ECI के अंदर भी बहस चल रही है. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इसे ज्ञानेश कुमार के उन कामों में से एक बताया गया है जो कथित तौर पर गैर-कानूनी हैं और उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. चुनाव आयोग ने डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अधिकारी के दस्तखत वाला एक प्रेस नोट जारी किया. इसमें कहा गया है कि विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय होना एक सामान्य बात है और SIR समेत पूरे आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे. हालांकि, विपक्ष का पूरा ध्यान सिर्फ ज्ञानेश कुमार पर है.

ज्ञानेश कुमार को बचाने वाली 'कानूनी दीवार'

कानूनी भाषा को हटाकर देखें तो, 'चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट, 2023 की धारा 16 कहती है कि कोई भी अदालत मौजूदा या पूर्व CEC या इलेक्शन कमिश्नर के खिलाफ उनके सरकारी काम के दौरान किए गए किसी भी काम के लिए सिविल या क्रिमिनल केस की सुनवाई नहीं कर सकती.

यह 'ढाल' उस कानून का हिस्सा थी, जिसके तहत कमिश्नरों को चुनने के लिए एक कमेटी बनाई गई थी. 2023 से पहले, चुनने की कोई खास प्रक्रिया नहीं थी क्योंकि कोई कानून नहीं बना था, इसलिए राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर नियुक्तियां करते थे, जिसमें न्यायपालिका या विपक्ष की कोई भूमिका नहीं होती थी.

नियुक्ति प्रक्रिया से CJI को हटाया

यह कानून 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में मार्च 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आया, जिसमें संसद के कानून बनाने तक PM, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की एक अंतरिम चयन समिति बनाई गई थी. उसी साल बाद में बने कानून ने CJI को हटा दिया और पैनल में एक मंत्री को शामिल कर लिया. कानून पर हाल ही में हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने कहा कि इसका मतलब था कि 'निष्पक्ष चयनकर्ता' हट गया. PM और PM की ओर से चुने गए मंत्री असल में उस कमेटी के तीसरे सदस्य, यानी विपक्ष के नेता (लोकसभा) पर भारी पड़ते हैं.

जहां तक कमिश्नरों के लिए सुरक्षा प्रावधान की बात है, तो अगस्त 2023 में जब कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मूल बिल पेश किया था, तब यह उसमें नहीं था. इसे चार महीने बाद जोड़ा गया, और विपक्ष के वॉकआउट और हंगामे के बावजूद कानून इसके साथ ही पास हो गया.

क्या इस 'ढाल' में कोई लूपहोल है?

हालांकि, यह 'कानूनी ढाल' सिर्फ कार्यकाल के दौरान किए गए कामों पर ही लागू होती है. सुप्रीम कोर्ट में वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि वोटर लिस्ट में कोई भी हेरफेर करना चीफ इलेक्शन कमिश्नर के काम के दायरे में नहीं आता. याचिका में कहा गया है, 'चीफ इलेक्शन कमिश्नर को आपराधिक मुकदमे से कोई निजी छूट नहीं मिलती है.' इसमें मांग की गई है कि ज्ञानेश कुमार की जांच हो और उन पर किसी भी दूसरे आरोपी की तरह मुकदमा चलाया जाए. इसमें 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट, 1950 की धारा 32 और रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़े भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाने की मांग की गई है. याचिका में यह भी बताया गया है कि संविधान सिर्फ राष्ट्रपति और राज्यपालों को ही पूरी छूट देता है.

इसमें पश्चिम बंगाल का उदाहरण सबसे अहम बताया गया है. आरोप है कि आयोग के नाम पर 16 लाख से ज्यादा अपीलें दायर करके उन वोटरों के नाम हटाए गए, जिन्हें 700 ज्यूडिशियल अफसरों ने वोटर लिस्ट में बहाल किया था. यह सब बाकी दो कमिश्नरों की जानकारी के बिना किया गया. गोवा के मामले में कहा गया है कि अदालती निर्देशों के बावजूद 97 योग्य वोटरों के नाम बहाल नहीं किए गए. सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस याचिका को सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं किया है.

तीन साल बाद मामला गरमाया

हालांकि, कुछ खास मुद्दे अब सामने आए हैं. लेकिन विपक्ष 2023 के कानून और EC की आजादी के मुद्दे पर उससे पहले से ही आवाज उठाता रहा है. दिसंबर 2025 में एक भाषण में राहुल गांधी ने यहां तक ​​कहा कि सत्ता में आने पर कांग्रेस इस कानून को पिछली तारीख से बदल देगी. उन्होंने इस प्रावधान को 'इम्युनिटी का तोहफा' कहा, जो इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं दिया था. इम्युनिटी का यह कवच मिलने के बाद से ही पूर्व कमिश्नरों की राय बंटी हुई है. कुछ लोगों ने राजनीतिक मंशा से दर्ज मुकदमों से बचाव के तौर पर इसका स्वागत किया, वहीं 2019 में आयोग से इस्तीफा देने वाले अशोक लवासा ने इसे पूरी तरह हैरान करने वाला बताया.

गृह मंत्री अमित शाह ने 10 दिसंबर, 2025 को संसद में बहस का जवाब देते हुए कहा था, 'हमने सिर्फ रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट, 1951 के प्रावधानों को दोहराया है. RPA की धारा 32 और RPA 1951 की धारा 146C के तहत हुए संशोधन में कहा गया है कि चुनाव आयोग का कोई भी अधिकारी, जिसमें चीफ इलेक्शन कमिश्नर और इलेक्शन कमिश्नर भी शामिल हैं, चुनाव प्रक्रिया से जुड़े किसी भी मामले में मुकदमे का सामना नहीं कर सकता. राहुल गांधी ने कहा था कि अमित शाह ने 'बेतुका तर्क' दिया.

'वे बन सकते हैं सरकारी गवाह'

उसी महीने के आखिर में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई एक रैली में, गांधी ने मंच से तीनों कमिश्नरों के नाम लिए और कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई होगी. इस हफ्ते बाकी दो कमिश्नरों की आपत्तियां सामने आने के बाद, उन्होंने खास तौर पर ज्ञानेश कुमार का जिक्र किया. उन्होंने उनसे यह भी कहा कि वे 'सरकारी गवाह' बन सकते हैं और बीजेपी की अगुआई वाली NDA सरकार में जिस किसी ने भी उनसे वोटर लिस्ट में हेरफेर करवाई थी, उसके खिलाफ गवाही दे सकते हैं. दूसरी ओर, बीजेपी ने किसी भी तरह की हेरफेर से इनकार किया है और कहा है कि कांग्रेस बार-बार मिली हार को पचा नहीं पा रही है.

क्या फिर से महाभियोग प्रस्ताव लाएगा विपक्ष?

विपक्ष ने इससे पहले ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दूसरे तरीके भी आजमाए थे, जैसे कि जजों के लिए मौजूद प्रावधान की तरह महाभियोग की मांग करना. हालांकि, अप्रैल में राज्यसभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने इस कदम के लिए लाए गए प्रस्ताव के नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष अब ऐसा ही एक और नोटिस लाने की योजना बना रहा है.

जनवरी से, सुप्रीम कोर्ट NGO 'लोक प्रहरी' की ओर से धारा 16 को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका पर विचार कर रहा है, लेकिन अब तक उसने इस प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. इसी मामले से जुड़ी एक घटनाक्रम में, 23 सितंबर को दो जजों की बेंच का फैसला बंटा हुआ रहा, जिसके बाद 2023 के कानून से जुड़ी कानूनी लड़ाई को चीफ जस्टिस के पास भेज दिया गया. अब वे तय करेंगे कि क्या इस मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन किया जाना चाहिए या नहीं. फिलहाल यह रोक बरकरार है.
 

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रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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