Election Commission: भारतीय चुनाव आयोग (EC) के अंदर वर्किंग स्टाइल और फैसले लेने को लेकर आंतरिक विवाद छिड़ा हुआ है. इसके चलते EC में अब बड़े बदलाव का संकेत मिल रहा है. चुनाव आयोग ने बीते दिनों 'इंडियन एक्सप्रेस' की सामने आई इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के बाद बड़ा कदम उठाते हुए 4 पन्नों का दिशा-निर्देश जारी किया, जिसमें 9 महत्वपूर्ण संगठनात्मक और तकीनीकी फैसले शामिल हैं.
चीफ इलेक्शन ऑफिसर ( CEO) ज्ञानेश कुमार और 2अन्य चुनाव आयुक्त विवेक जोशी समेत सुखबीर सिंह संधू के 3 सदस्यीय आयोग में पैदा हुई इस असहज स्थिति ने न केवल देश की सबसे बड़ी इलेक्शन बॉडी की फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि चुनाव की इंटीग्रिटी को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज कर दी है.
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू की ओर से दर्ज कराई गई लगभग 14 लिखी आपत्तियां पूरे विवाद की जड़ हैं. दोनों आयुक्तों ने वोटर लिस्ट के रखरखाव, नए वोटर्स के रजिस्ट्रेशन, नाम हटाने-बदलने और बहाल करने समेत IT सिस्टम के कंट्रोल जैसे बेहद सेंसिटिव विषयों पर सवाल उठाए थे. हालांकि, इलेक्शन कमीशन ने शुरुआत में इन आपत्तियों को केवल नॉर्मल बातचीत के जरिए मिले इनपुट और सुझाव का नाम दिया था और दावा किया था कि पिछले एक साल के सारे निर्णय सभी की सहमति से लिए गए थे.
शनिवार ( 26 सितंबर 2026) को इलेक्शन कमीशन की हाई लेवल मीटिंग के बाद जारी 4 पन्नों के नोट से पता चलता है कि अब इन आंतरिक चिंताओं को इग्नोर नहीं किया जा सकता है. इलेक्शन कमीशन की ओर से घोषित 9 नियमों के मुताबिक, अब हर बैठक से पहले ऑफिशियल एंजेडा पेश किया जाएगा और बैठक खत्म होने पर मिनट्स जारी किए जाएंगे. इसके अलावा अधिकारियों की विदेश यात्रा के लिए पूरे बेंच की मंजूरी लेना भी अनिवार्य किया गया है. साथ ही नए IT मॉड्यूल और पोर्टल लॉन्च करने से पहले ऑफिसर्स की स्पेशल कमिटी से जांच कराना तय किया गया है.
टेक्निकल ट्रांसपेरेंसी बढ़ाने के मकसद से ECINet की समीक्षा के लिए सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमीशनर की अगुवाई में एक समिति का गठन किया जाएगा, जिसमें IIT या IIIT के एक इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट को शामिल किया जाएगा. इलेक्शन कमीशन का यह कदम दोनों आयुक्तों की ओर से 10 महीनों में की गई उन शिकायतों से डायरेक्ट मैच करता है, जिनमें बिना जानकारी के नए IT मॉड्यूल बनाने, फील्ड ऑफिसर्स के ERONet तक पूर्ण पहुंच न मिलने और डेटाबेस के ऑडिट की आवश्यकता की बात कही गई. इसके साथ ही आयुक्तों के आदेशों का ऑफिसर्स की ओर से कड़ाई से पालन किया जाना भी अनिवार्य कर दिया गया है.
ये प्रशासनिक खींचतान सिर्फ ऑन पेपर नहीं, बल्कि इसका सीधा असर वोटर्स की स्थिति पर भी पड़ रहा है. गोवा में लोकल ऑफिसर्स की ओर से स्वीकृत 97 वोटर्स के नाम अंतिम मतदाता सूची से गायब मिले थे, जिनमें से 81 से अब फॉर्म 6 भरवाकर चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर की प्रक्रिया को आसान बनाने का आदेश दिया गया. इलेक्शन कमीशन की ओर से दी गई रियायतों के बावजूद फॉर्म 6 का मुद्दा फिलहाल पूरी तरह नहीं सुलझ रहा है. नए नोट में कहा गया है कि रजिस्ट्रेशन नियमों के तहत तय फॉर्म SIR अवधि के बाहर लागू होगा, लेकिन ECINet पर मौजूद उस ऑनलाइन फॉर्म पर चुप्पी साधी है, जिसमें पेरेंट्स से जुड़ा एक अनिवार्य सवाल जोड़ा गया है. चुनाव आयुक्त संधू की ओर से 13 अगस्त 2026 को अवैध ठहराए जाने के बावजूद यह सवाल जुलाई 2026 से ऑनलाइन सिस्टम में क्यों दिखा रहा है, इसे किसने जोड़ा और अबतक इसका जवाब सार्वजनिक नहीं किया गया है.
इलेक्शन कमीशन के ताजा स्पष्टीकरण ने कई प्रशासनिक सवालों को अनसुलझा रखा है. उदाहरण के लिए, जैसे गोवा में अबतक वोटर्स के नाम तुरंत बहाल करने वाली सॉफ्टवेयर सुविधा को कभी एक्टिव क्यों नहीं किया गया. इसका कोई जिक्र नहीं है. इसके साथ ही जिन ऑफिसर्स के कामकाज पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताते हुए कार्रवाई की मांग की उनमें IT की डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना और सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमीशनर मनीष गर्ग का नाम है. दोनों की भूमिका और पद पर बने रहने की स्थिति अभी साफ नहीं हुई है.
ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में इलेक्शन कमीशन के लिए स्थिति बड़ी संगठनात्मक और नैतिक परीक्षा जैसी है. संविधान के आर्टिकस 324 के तहत निष्पक्ष चुनाव करवाने की जिम्मेदारी बहु सदस्यीय आयोग पर होती है. यहां सभी की सहमति और ट्रांसपेरेंसी ही संस्था की साख बनाए रखती है. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि नए नियमों के लागू होते ही दोनों आयुक्तों की निर्णयों में कितनी भागीदारी होती है.