SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

बर्फ का ‘टाइम बम’: भारत से 12 हजार KM दूर, गुजरात जितना बड़ा ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ क्यों है चर्चा में?

अंटार्कटिका में मौजूद ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ धरती का तापमान बढ़ने की वजह से पहले के अनुमानों की तुलना में तेजी से पिघल रहा है. अगर इस ग्लेशियर की बर्फ पूरी तरह ढह गई तो दुनिया में बहुत बड़े पैमाने पर तबाही मच सकती है. बर्फ के इस 'टाइम बम' की टिकटिक जोर से सुनाई देने लगी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अब नहीं चेते तो तबाही मचना तय है, जिसे कोई रोक नहीं पाएगा.

Written By Shwetank Ratnamber
Published: Oct 19, 2026, 01:17 PM IST | Updated: Oct 20, 2026, 06:26 AM IST
Image Credit: डूम्स डे ग्लेशियर पुराने अनुमानों की तुलना में तेजी से पिघल रहा है (AI)
Join

क्या आपको मालूम है कि आपके पैरों तले की जमीन खिसक रही है, बस ये बात महसूस नहीं हो रही. क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए काम करने वाली संस्थाएं दशकों से इस खतरे से दुनिया को आगाह कर रही हैं. हर रिपोर्ट का लब्बोलुआब बस इतना है कि वो दिन दूर नहीं जब दुनिया के तमाम शहर समंदर में समां जाएंगे. धरती का क्षेत्रफल घटना और समंदर का साइज बढ़ना ये दो अलग-अलग चीजें होकर भी एक ही मसले ग्लेशियरों के पिघलने से जुड़ी हैं, जिसे लेकर वैज्ञानिकों ने एक बार फिर खतरे की घंटी बजा दी है. कुदरत से खिलवाड़ का खामियाजा पूरी दुनिया भुगतेगी, इसमें कोई शक नहीं क्योंकि कुदरत का कहर पूरी मानवजाति पर टूटता है.

तेज रफ्तार में पिघल रहा डूम्स डे ग्लेशियर!

दुनिया का सबसे चौड़ा ग्लेशियर अब से पहले के अनुमानों के मुकाबले बहुत तेज रफ्तार से पिघल रहा है. ग्लेशियरों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों की एक टीम के नए अध्ययन में यह बात सामने आई है. इसके मुताबिक, समुद्र का जलस्तर बढ़ने पर इस ग्लेशियर का असर मौजूदा अनुमानों से दोगुना हो सकता है.

पश्चिमी अंटार्कटिका में मौजूद थ्वाइट्स ग्लेशियर को ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ भी कहा जाता है. इसकी बर्फ पूरी तरह ढह गई तो बड़े पैमाने पर तबाही मच सकती है. दुनिया में समुद्र का जलस्तर कितना बढ़ेगा, इसका अनुमान लगाना और मुश्किल हो गया है क्योंकि बीते एक दशक में दुनिया के कई शहरों की जमीन सिकुड़ने के जो अनुमान थे वो अब गड़बड़ाते नजर आ रहे हैं. खतरे कितना बड़ा होगा, इसका अनुमान लगाना एक यक्ष प्रश्न जैसी बड़ी चुनौती बन गया है.

गुजरात जितना आकार खतरा उससे भी बड़ा

भारत से 12000 किमी दूर मौजूद इस ग्लेशियर का आकार भारत के गुजरात और अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के लगभग बराबर है. यह ग्लेशियर धरती के सबसे दुर्गम इलाकों में स्थित है. जहां पहुंचना बेहद मुश्किल है. दशकों से ये ग्लेशियर पीछे खिसक रहा है. इसकी पिघलती बर्फ फिलहाल दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर बढ़ने में करीब 4 फीसदी योगदान देती है.

तबाही का अनुमान लगाना मुश्किल

यह ग्लेशियर आखिर क्यों और किस तरह पिघल रहा है, इसकी प्रक्रिया बेहद जटल है. यही वजह है कि भविष्य में इसकी बर्फ कितनी तेजी से घटेगी, इसका सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है. अगर थ्वाइट्स ग्लेशियर पूरी तरह ढह जाता है, तो इसमें मौजूद पानी से समुद्र का जलस्तर 2 फीट से ज्यादा बढ़ सकता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक यह ग्लेशियर अंटार्कटिका की विशाल बर्फ की चादर को भी थामे हुए है. यह एक तरह से उस पर लगे कॉर्क की तरह काम करता है. अगर यह 'ढक्कन' हट गया, तो भविष्य में समुद्र का जलस्तर करीब 10 फीट तक बढ़ सकता है. इससे सातों महाद्वीपों में कई देशों के तटीय इलाकों में भारी तबाही मच सकती है.

एक मिसाल के लिए समंदर की बात छोड़िए इंसानों की बनवाई नहर और खुदवाए गए तालाब के कुछ हिस्से इतने गहरे होते हैं कि डूबने का खतरा बढ़ जाता है. किसी कमरे या हाल में 10 फीट पानी भर जाए तो अंदर मौजूद लोग ज्यादा देर तक सर्रवाइव नहीं कर पाएंगे. ऐसे में जरा सोचिए जो समुद्र पहले से अनंत गहराइयां समेटे है, उसका लेवल 10 फीट बढ़ गया तो जलप्रलय में कितने लोग मारे जाएंगे इसके बारे में सोच कर ही डर लगता है.

ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार कितनी चिंताजनक?

कुछ समय पहले अंटार्कटिका के 'हेक्टोरिया ग्लेशियर' के महज दो महीनों में लगभग 50% सिकुड़ने की खबर आई थी. आधुनिक इतिहास में दर्ज यह अब तक की सबसे खतरनाक स्थिति थी.

फिलाडेल्फिया शहर के आकार जितना 'हेक्टोरिया ग्लेशियर' अंटार्कटिक प्रायद्वीप के जिस इलाके में है वो धरती पर सबसे तेजी से गर्म होने वाले इलाकों में से है. हेक्टोरिया जैसे ग्लेशियर, जो समुद्र तल पर टिके होते हैं और तैरते नहीं हैं, आमतौर पर एक साल में महज कुछ सौ मीटर के आस-पास पीछे हटते थे. लेकिन 'नेचर जियोसाइंस' जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर और दिसंबर 2022 के बीच हेक्टोरिया 5 मील पीछे हट गया था.

चेतावनी की टाइम लाइन 

कुछ ऐसी ही रिपोर्ट फरवरी, 2023 में विश्व मौसम संगठन यानी WMO ने जारी की थी. जिसमें भारत के मुंबई समेत दुनिया के कई शहरों की कई बड़ी इमारतों और सड़कों के अगले कुछ दशकों में समंदर में समा जाने यानी डूब जाने की भविष्यवाणी की गई थी.

अन्य शहरों जिनके अस्तित्व पर खतरा बताया गया था उनमें ब्रिटेन की राजधानी लंदन, अमेरिका का लॉस एंजेल्स और न्यूयॉर्क, इजिप्ट का काहिरा, चीन का शंघाई, थाइलैंड का बैंकॉक, बांग्लादेश में ढाका, इंडोनेशिया का जकार्ता, डेनमार्क के कोपेनेहेगन, अर्जेंटीना का ब्यूनर्स आयर्स और चिली के सैंटियागो का नाम शामिल था.

एक अरब पर असर!

WMO के मुताबिक समुद्र के बढ़ते हुए जलस्तर का असर छोटे द्वीप देशों पर ही नहीं घनी आबादी वाले तटीय शहरों में रहने वाले 90 करोड़ से 100 करोड़ लोगों यानी एक अरब इंसानों की जिंदगी पर पड़ने का अनुमान लगाया गया था. यानी आज की तारीख में धरती पर मौजूद हर 10 में से एक शख्स की जिंदगी समुद्र के बढ़ते जलस्तर की वजह से मुश्किल में पड़ने की भविष्यवाणी की गई थी. इसी रिपोर्ट में खाद्यान्न संकट आने का अंदेशा जताया गया था.

इसके पहले 2021 में ग्लोबल रिस्क मैनेजमेंट फर्म की रिपोर्ट में चौंकाने वाला दावा किया गया था कि भारत के मुंबई, कोच्चि, मैंगलोर, चेन्नई, विशाखाप​​​​​​ट्टनम और तिरुवनंतपुरम समेत दुनिया के कई शहरों की काफी जमीन समंदर में समा सकती है. जीआरएम की रिपोर्ट में 2050 तक ऐसा होने का अंदेशा जताया गया था.

इसी तरह रिस्क मैनेजमेंट कंसल्टेंसी फर्म रिस्क मैनेजमेंट सॉल्यूशंस इंडिया (RMSI) की स्टडी में पाया गया था कि मुंबई के हाजी अली दरगाह, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे, बांद्रा-वर्ली सी-लिंक के डूबने का खतरा है. 

RMSI ने यह बात इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की असेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर कही थी. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन के नए डेटा और प्रभाव को लेकर बनाए गए मॉडल का भी इस्तेमाल किया गया था.

आपको बताते चलें कि इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज 1988 से हर पांच से सात साल के अंतराल में दुनिया भर में हो रहे क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर (बर्फ) का क्षेत्र के अलावा ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और समुद्र के जल स्तर को लेकर रिपोर्ट जारी कर रहा है.

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इस खतरे के बारे में आगाह किया था. 

उससे पहले भी कई रिपोर्ट्स में महाविनाश का खतरा बताया गया था.

122 सालों में यूं तेजी से बढ़ा जलस्तर

इस रफ्तार से जलप्रलय का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है.

भारत समेत कई देश जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए पेरिस अकॉर्ड समेत कई समझौतों का पालन करके जीरो कार्बन उत्सर्जन पर काम कर रहे हैं. रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रीन एनर्जी पर फोकस कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने ऐसे समझौतों से बाहर निकलकर दुनिया को विनाश की ओर धकेलने की रफ्तार बढ़ा दी है.

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES