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भारतीय चुनाव आयोग एक बार फिर सवालों के घेरे में है. 23 सितंबर 2026 को पब्लिश होने वाली इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट पूरे देश का राजनीतिक माहौल बदल दिया है. रिपोर्ट में दावा किया गया कि कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की. रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल हैं.
ऐसे में सवाल पैदा होता है कि अगर खुद चुनाव आयोग के अंदर किसी मुद्दे पर आपसी सहमति ना बन पाए, तो आखिरी फैसला किसका होता है? क्या चीफ इलेक्शन कमिश्नर के पास कोई ऐसी ताकत है कि वो आपत्तियों को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ जाए? हम इन्हीं सवालों के जवाब संविधान के आर्टिकल 324 और चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े मौजूदा कानून के हवाले से बताने जा रहे हैं.

चुनाव आयोग को शुरू से जानिए
सबसे पहले चुनाव आयोग के बारे में थोड़ी जानकारी हासिल कर लेते हैं. 1947 में देश आजाद होने के बाद 25 जनवरी 1950 को चुनाव आयोग वजूद में आया. देश के पहले CEC सुकुमार सेन थे, जिन्होंने 21 मार्च 1950 से 19 दिसंबर 1958 तक पद संभाला. शुरुआत से लेकर लगभग 4 दशक तक चुनाव आयोग में ही चुनाव आयुक्त होता था. इस दौरान आयोग की कमान सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त के पास होती थी. यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 1989 तक चुनाव आयोग एक सदस्यीय था.
लेकिन 16 अक्तूबर 1989 को पहली बार चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाया गया. उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त CEC आरवीएस पेरी शास्त्री के साथ एसएस धनोआ और वीएस सीगल को चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया गया. इस तरह पहली बार चुनाव आयोग में 1 CEC और 2 EC की एंट्री हुई. यह बदलाव लंबे समय से चुनाव आयोग में सुधारों मांग के तहत हुआ था.
हालांकि 2 जनवरी 1990 को, यानी सिर्फ ढाई महीने बाद बहुसदस्यीय वाली व्यवस्था फिर से खत्म कर दिया गया. दिलचस्प बात यह भी है कि अगले ही साल फिर से बहुसदस्यीय व्यवस्था लौट आई. 25 जनवरी 1991 को Election Commission (Conditions of Service of Election Commissioners and Transaction of Business) Act, 1991 बनाया गया. इस कानून ने बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था के लिए कानूनी ढांचा तैयार किया. साथ ही 1 अक्तूबर 1993 को एक बार फिर से दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति हुई. तब से लेकर अब तक यही स्थिती चली आ रही है.

इसका सीधा मतलब: CEC चेयरमैन जरूर हैं, लेकिन उनके पास अकेले वीटो पावर नहीं है. तीन सदस्यीय आयोग में CEC और दो EC के तीन वोट होते हैं. दो सदस्य एक तरफ हों तो उनकी राय बहुमत होगी.

इस तरह का मामला पहली बार सामने नहीं आया. करीब तीन दशक पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने भी यह मुद्दा आया था.
1995 के T.N. सेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग को संवैधानिक माना. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि CEC आयोग के चेयरमैन हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह बाकी चुनाव आयुक्तों से ऊपर होकर अकेले फैसले ले सकते हैं.
1996 के चुनाव आयोग बनाम सुब्रमण्यम स्वामी मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुसदस्यीय आयोग के हर फैसले के लिए सर्वसम्मति जरूरी नहीं है. मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर फैसला लिया जा सकता है.