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भारत की अध्यक्षता में होने जा रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं. दुनिया की करीब आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली यह समिट उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच होने वाली अहम बैठक के साथ भारत और चीन दोनों के लिए एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा भी है. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी एक मशहूर बात है कि हम अपने पड़ोसियों को नहीं बदल सकते. यह बात पाकिस्तान के पल्ले तो नहीं पड़ी, लेकिन क्या राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस बात को समझेंगे, वो भी तब जब एक्सपर्ट्स का मानना है कि वह अमेरिका का सुपरपावर वाला टैग छीनकर चीन को नंबर वन यानी दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमिक ताकत बनाना चाहते हैं.
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और दशकों से लगातार बढ़ रही चीन की सैन्य ताकत और ग्रोथ रेट देखते हुए जिनपिंग की चाहत कोई असंभव लक्ष्य नहीं लगती, लेकिन BRICS में पिछले कुछ वर्षों में डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की चर्चा तेज हुई है उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए चीन, भारत के साथ चालबाजी छोड़कर ईमानदारी से सीमा विवाद सुलझा दे, तो शायद जिनपिंग खुद अपने कार्यकाल में उस खास मकसद को कामयाब होते देख सकें.
चीनी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हाल ही में सेंट्रल एशिया और मिडिल-ईस्ट के हाई-लेवल डिप्लोमैटिक दौरे पर गए राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत में ब्रिक्स समिट में शामिल होंगे. माना जा रहा है उनकी इस कवायद का मकसद 'ग्लोबल साउथ' के साथ रिश्ते मजबूत करना और अमेरिका के साथ संभावित बातचीत से पहले चीन का असर बढ़ाना है. अब अगर वो ईमानदारी से सीमा विवाद सुलझाने और ब्रिक्स देशों की करेंसी में आपसी व्यापार करने पर फोकस करते हैं तो 2026 की आगामी ब्रिक्स समिट कई मायनों में ऐतिहासिक हो सकती है.
भारत, BRICS को चीन सेंट्रिक मंच बनने से रोकने के साथ सदस्य देशों का ध्यान व्यापार, सप्लाई चेन, तकनीक, एआई, एनर्जी और ग्लोबल साउथ के हितों जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित करना चाहता है. ब्रिक्स के व्यापार मंत्रियों की बैठक में भी व्यापार बढ़ाने, सेवाओं को मजबूत करने और सप्लाई चेन को ज्यादा लचीला और विविध बनाने पर जोर दिया जा चुका है.
गलवान कांड के बाद से दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी देखी गई. ऐसे में दोनों को एक-दूसरे के सहयोग की जरूरत है. इसलिए चीन पुराना रवैया छोड़कर विकास के एजेंडे पर बढ़े, भारत, ऐसी उम्मीद रखता है.
चीन,दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी है तो भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल चौथे से छठे पायदान पर पहुंच गई है. दोनों देश दुनिया के सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं. दोनों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं और महत्वाकांक्षाएं हैं. अमेरिकी डॉलर दोनों की राह का रोड़ा है. ऐसे में उस कथित डी-डॉलराइज़ेशन वाली सोंच पर आगे बढ़ने के आसार एक बार फिर दिख रहे हैं, जिसमें वैश्विक व्यापार, वित्तीय लेनदेन के साथ अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने का लक्ष्य रखा जाता है.
दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ा है, हालांकि व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है. ऐसे में दिल्ली की कोशिश होगी कि बीजिंग के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत हों, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों की कीमत पर नहीं.
दोनों देशों के बीच बीते दो सालों में संवाद बढ़ा है. कैलाश मानसरोवर यात्रा का द्वार खोलने के अलावा भारत और चीन ने उड़ानों, वीजा, व्यापार और लोगों के बीच आपसी संपर्क बहाल करने कोशिश की है.
अगस्त में भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी सीमा पर शांति को द्विपक्षीय संबंधों के लिए अहम बताया था. इस बार ब्रिक्स के मंच पर मोदी और शी की मुलाकात सिर्फ हाथ मिलाने या फोटो खिंचाने तक सीमित नहीं होगी. इसके पीछे सीमा, कारोबार और रणनीतिक भरोसे के कई सवाल मुंह बाए खड़े होंगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के टारगेट पर काम कर रहे हैं. वो कई बार कह चुके हैं कि बीते 12 सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. पीएम मोदी 'वाइब्रेट गुजरात' के मंच से ये तक कह चुके हैं कि भारत दुनिया की तीसरी बड़ी इकोनॉमी बनने की ओर बढ़ रहा है, ये 'मोदी' की गारंटी है.
BRICS में चीन के साथ सहयोग जरूरी है, इसलिए इस बार BRICS की मेज भारत चीन रिश्तों के लिए एक तरह का ट्रस्ट टेस्ट होगी. अगर दोनों सीमा विवाद को नियंत्रित रखते हुए व्यापार और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग को बढ़ाते हैं, तो बात बन सकती है. लेकिन अगर विश्वास बहाली में कमी बरकरार रही, तो BRICS की चमकदार तस्वीर के पीछे जी-20 वाला पुराना तनाव भी साफ दिख सकता है.
गौरतलब है 2023 में नई दिल्ली में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में चीन ने भारत की बढ़ती कूटनीतिक और आर्थिक ताकत के बीच मुख्य रूप से दूरी बनाने और अपनी उपस्थिति सीमित रखने की रणनीति अपनाई थी, तब शी जिनपिंग ने खुद दिल्ली न आकर प्रधानमंत्री ली कियांग को भेजा था.