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BRICS का सफरः शब्द...सपने...सफलता...एक आर्थिक विचार कैसे दुनिया के बड़े राजनीतिक मंच में बदला

गोल्डमैन सैक्स के एक आर्थिक विचार से लेकर वैश्विक भू-राजनीतिक शक्ति बनने तक: जानिए कैसे ब्रिक्स (BRICS) पश्चिमी आधिपत्य को चुनौती देने वाला सबसे मजबूत कूटनीतिक मंच बना? पढ़ें इसका पूरा सफर, विस्तार और भविष्य.

BRICS का सफरः शब्द...सपने...सफलता...एक आर्थिक विचार कैसे दुनिया के बड़े राजनीतिक मंच में बदला
Image Credit: BRICS के पांच देशों को एक साथ देखें तो 2001 में इनकी कुल नाममात्र GDP करीब 2.84 ट्रिलियन डॉलर बैठती थी. 2026 तक यही आंकड़ा करीब 27.4 ट्रिलियन डॉलर हो गया.

2001 में गोल्डमैन सैक्स के तत्कालीन मुख्य अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने एक रिसर्च पेपर Building Better Global Economic BRICS में BRIC शब्द दिया था. उनका तर्क था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं आने वाले दशकों में दुनिया की आर्थिक तस्वीर बदल सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती दे सकती हैं. शुरुआत में यह सिर्फ एक आर्थिक अवधारणा थी, लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीतिक सहयोग के मंच में बदल गई.

2006 में चारों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला BRIC शिखर सम्मेलन हुआ. 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हो गया. आज BRICS का दायरा काफी बढ़ चुका है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जिस समूह की शुरुआत दुनिया की बदलती आर्थिक ताकत को पहचानने के लिए हुई थी, क्या वह अब वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का नया शक्ति केंद्र बन रहा है? आइए ब्रिक्स के इस सफर को हम 7 प्वाइंटर्स में आपको विस्तार पूर्वक समझाते हैं कि कैसे पिछले दो दशकों में इसका और इससे जुड़े देशों का विकास हुआ

1. कौन हैं जिम ओ'नील? जिन्होंने BRICS शब्द देने के साथ इसकी शुरुआत की

जिम ओ'नील का नाम दुनिया की अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वालों के लिए नया नहीं है. ब्रिटेन के जाने-माने अर्थशास्त्री ओ'नील को सबसे ज्यादा पहचान उस शख्स के तौर पर मिली, जिसने करीब 25 साल पहले ब्राजील, रूस, भारत और चीन की तेजी से बढ़ती आर्थिक ताकत को देखते हुए 'BRIC' शब्द दिया था. बाद में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद यही समूह BRICS के नाम से जाना जाने लगा. ओ'नील ने अपने करियर का बड़ा हिस्सा निवेश बैंकिंग की दुनिया में बिताया. वह 1995 में Goldman Sachs से जुड़े और आगे चलकर बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट बने. 2001 में उन्होंने BRIC की अवधारणा सामने रखी. उस समय उनका आकलन था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

ऐसा रहा जिम ओ'नील का सफर

ओ'नील का रिश्ता सिर्फ Goldman Sachs तक ही नहीं रहा. ब्रिटेन की सरकार में भी उन्होंने काम किया और 2015 से 2016 के बीच ट्रेजरी में कमर्शियल सेक्रेटरी की जिम्मेदारी संभाली. इसके अलावा वह Chatham House के चेयरमैन भी रह चुके हैं. अर्थशास्त्र के साथ उनकी दिलचस्पी वैश्विक स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों में भी रही है. उन्होंने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध पर बनी एक अंतरराष्ट्रीय समीक्षा की अध्यक्षता भी की थी. इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं से भी उनका जुड़ाव रहा है.

दो दशक पहले दुनिया की 4 अर्थव्यवस्थाओं को साथ लाए

आज भी जिम ओ'नील BRICS को लेकर अपनी राय खुलकर रखते हैं. हाल के वर्षों में उनका ध्यान इस बात पर रहा है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में किस तरह बड़ी भूमिका निभा सकती हैं. 2026 में उन्होंने यह भी कहा कि डॉलर के विकल्प के तौर पर BRICS देशों के बीच नई वित्तीय व्यवस्था की संभावना को अब पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. यानी, जिम ओ'नील सिर्फ एक अर्थशास्त्री नहीं हैं. वह उस विचार के पीछे का चेहरा हैं, जिसने दो दशक से ज्यादा समय पहले भारत समेत चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ देखकर दुनिया की बदलती आर्थिक तस्वीर की तरफ ध्यान खींचा था.

2. 2001 में BRIC का विचार आने के बाद इन 5 देशों की अर्थव्यवस्था कितनी बढ़ी? आज BRICS की कुल GDP और वैश्विक हिस्सेदारी कितनी है?

2001 से अब तक BRICS देशों की कितनी बदली अर्थव्यवस्था? ये वो सवाल है जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है. तो चलिए आपको विस्तार पूर्वक बताते हैं कि ढाई दशक के बाद BRICS से जुड़े देशों की मौजूदा आर्थिक स्थिति कितनी बढ़ी.

IMF के ताजा अनुमानों के मुताबिक चीन की अर्थव्यवस्था करीब 20.85 ट्रिलियन डॉलर, भारत की 4.15 ट्रिलियन डॉलर, रूस की 2.66 ट्रिलियन डॉलर, ब्राजील की 2.64 ट्रिलियन डॉलर और दक्षिण अफ्रीका की करीब 474 अरब डॉलर रहने का अनुमान है. इन सभी को जोड़ें तो कुल GDP लगभग 30.74 ट्रिलियन डॉलर बैठती है. यानी 2001 के मुकाबले इन पांच देशों की संयुक्त नाममात्र GDP करीब 10.8 गुना हो गई है. डॉलर के हिसाब से देखें तो करीब 27.9 ट्रिलियन डॉलर का इजाफा हुआ है. प्रतिशत में यह बढ़ोतरी लगभग 982 फीसदी बैठती है. इस बदलाव में सबसे बड़ी भूमिका चीन और भारत की तेज आर्थिक वृद्धि की रही है. खासकर चीन ने पिछले 25 वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था का आकार कई गुना बढ़ाया, जबकि भारत भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत करता गया. अगर 2001 और 2026 की अर्थव्यवस्था की तुलना करें तो इन पांच मूल देशों में सबसे तेज उछाल चीन और भारत ने दर्ज किया है.

 

  • विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2001 में चीन की GDP करीब 1.36 ट्रिलियन डॉलर थी, जो 2026 में बढ़कर करीब 20.85 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई.
  • 2001 में भारत की GDP करीब 485 अरब डॉलर थी. 2026 तक यह बढ़कर करीब 4.15 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर पहुंच गई.
  • रूस की GDP 2001 में करीब 307 अरब डॉलर थी. 2026 में यह आंकड़ा करीब 2.66 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया.
  • ब्राजील की अर्थव्यवस्था भी इस दौरान करीब 560 अरब डॉलर से बढ़कर 2.64 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई.
  • दक्षिण अफ्रीका उस समय BRIC का हिस्सा नहीं था. समूह में शामिल होने के बाद . 2001 में उसकी GDP करीब 135 अरब डॉलर थी, जो 2026 में लगभग 474 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई.

इन पांच देशों को एक साथ देखें तो 2001 में इनकी कुल नाममात्र GDP करीब 2.84 ट्रिलियन डॉलर बैठती थी. 2026 तक यही आंकड़ा करीब 27.4 ट्रिलियन डॉलर हो गया. हालांकि यहां एक बात ध्यान रखना जरूरी है. डॉलर में GDP की तुलना पर विनिमय दरों का भी असर पड़ता है, इसलिए इसे केवल वास्तविक उत्पादन में हुई बढ़ोतरी के बराबर नहीं माना जा सकता.

3. BRICS देशों के साथ भारत का कुल व्यापार कितना है? इनमें चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से भारत क्या खरीदता और क्या बेचता है?

दुनिया का हर देश BRICS की बढ़ती लोकप्रियता के बाद ये जरूर जानना चाहता है कि आखिर ये BRICS के देश आपस में ट्रेड कैसे करते हैं. तो आइए हम आपको विस्तारपूर्वक ये समझाते हैं कि BRICS देशों के बीच किन चीजों का ट्रेड होता है और भारत का इसमें कितना व्यापार होता है.  BRICS के विस्तार के साथ भारत के लिए कारोबार के नए रास्ते खुलने की उम्मीद बढ़ गई है. समूह में शामिल नए देशों के साथ व्यापार बढ़ने से भारतीय कंपनियों को कई ऐसे बाजारों तक पहुंच मिल सकती है, जहां अभी उनकी मौजूदगी सीमित है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत को इन नए बाजारों में सबसे ज्यादा फायदा किन देशों से मिल सकता है.

BRICS के ट्रेड में भारत किन सेक्टर्स में बढ़ा रहा दायरा?

किन देशों में भारतीय सामान की मांग बढ़ने की संभावना है और कहां भारतीय कंपनियां एक्सपोर्ट का अपना दायरा तेजी से बढ़ा सकती हैं. जानकारों की नजर खास तौर पर ऊर्जा, दवाइयों, इंजीनियरिंग सामान, ऑटो पार्ट्स, कृषि उत्पादों और टेक्नोलॉजी से जुड़े सेक्टरों पर है. BRICS के विस्तार के बाद इन क्षेत्रों में भारत के लिए नए कारोबारी अवसर बन सकते हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि BRICS में शामिल नए और पुराने सदस्य देशों में भारत के लिए कौन से बाजार सबसे अहम साबित हो सकते हैं और आने वाले समय में किन देशों के साथ एक्सपोर्ट बढ़ाने की सबसे ज्यादा गुंजाइश दिखाई देती है.

4. BRICS के विस्तार के बाद भारत को कौन-कौन से नए बाजार मिल सकते हैं? किन देशों के साथ भारत के लिए एक्सपोर्ट बढ़ाने की सबसे ज्यादा संभावना है?

BRICS की ढाई दशकों के बाद बढ़ते कदम को लेकर अब इन बातों पर भी मंथन किए जा रहे हैं कि आने वाले समय में BRICS के विस्तार के बाद भारत को कौन-कौन से नए बाजार मिल सकते हैं? ऐसे में हम आपको बता दें कि भारत के लिए अब BRICS सिर्फ एक कूटनीतिक मंच नहीं है, बल्कि कारोबार के लिहाज से भी इसका काफी महत्व है. चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत का व्यापार अरबों डॉलर में है. हालांकि इन देशों के साथ कारोबार का संतुलन हर जगह एक जैसा नहीं है. खासकर चीन और रूस से भारत की खरीदारी, वहां होने वाली बिक्री के मुकाबले काफी ज्यादा है. सरकारी व्यापार आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में चीन के साथ भारत का कुल माल व्यापार करीब 151.1 अरब डॉलर रहा. इसमें भारत ने चीन को करीब 19.47 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि चीन से करीब 131.63 अरब डॉलर का आयात हुआ. यानी अकेले चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर रहा.

चीन से भारत क्या-क्या खरीद रहा?

चीन से भारत मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी और कई तरह के औद्योगिक उपकरणों के अलावा रसायन और दूसरे मैन्युफैक्चरिंग इनपुट खरीदता है. दूसरी तरफ भारत चीन को फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, इंजीनियरिंग से जुड़े उत्पाद, समुद्री उत्पाद और कुछ कृषि आधारित सामान निर्यात करता है. कुल मिलाकर चीन के साथ भारत का व्यापार काफी हद तक आयात पर निर्भर दिखाई देता है. रूस की बात करें तो तस्वीर और भी अलग है. 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल कारोबार करीब 59.86 अरब डॉलर रहा. भारत ने रूस को लगभग 4.88 अरब डॉलर का सामान बेचा, जबकि रूस से करीब 55.37 अरब डॉलर का आयात किया.

रूस से भारत किन चीजों का ट्रेड कर रहा?

रूस से भारत की सबसे बड़ी खरीदारी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की है. इसके अलावा भारत वहां से उर्वरक, सूरजमुखी तेल, कोकिंग कोल और कीमती पत्थर एवं धातुएं भी खरीदता है. भारत रूस को मुख्य रूप से दवाइयां, ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक केमिकल्स, आयरन-स्टील और समुद्री उत्पाद निर्यात करता है. ब्राजील के साथ भारत का व्यापार चीन और रूस की तुलना में छोटा है, लेकिन यहां तस्वीर कुछ ज्यादा संतुलित है. 2025 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 15.21 अरब डॉलर रहा था. भारत ने ब्राजील को 8.35 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि वहां से 6.85 अरब डॉलर का सामान खरीदा.

ब्राजील और भारत के बीच किन उत्पादों की बढ़ी खरीद-बिक्री?

भारत ब्राजील को डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पाद, एग्रो-केमिकल्स, दवाइयां, केमिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, टेक्सचर्ड फिलामेंट यार्न और एल्युमिनियम जैसे सामान बेचता है. वहीं ब्राजील से भारत कच्चा तेल, सोयाबीन तेल, सोना, कच्ची चीनी, कपास, लकड़ी, केमिकल्स और लौह अयस्क समेत कई चीजें खरीदता है. दक्षिण अफ्रीका के साथ भी भारत का कारोबार खासा महत्वपूर्ण है. 2025-26 में अप्रैल से जनवरी के बीच दोनों देशों का कुल व्यापार करीब 13.02 अरब डॉलर रहा. इस अवधि में भारत ने 5.84 अरब डॉलर का निर्यात किया और 7.18 अरब डॉलर का आयात किया.

साउथ अफ्रीका को लेकर भारत का इन चीजों में बढ़ा व्यापार

भारत दक्षिण अफ्रीका को वाहन और ऑटो पार्ट्स, ट्रांसपोर्ट उपकरण, दवाइयां, इंजीनियरिंग सामान, केमिकल्स, कपड़ा, चावल और जेम्स-ज्वैलरी जैसी चीजें बेचता है. दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका से भारत सोना, स्टीम कोल, तांबा अयस्क, फॉस्फोरिक एसिड, मैंगनीज अयस्क और एल्युमिनियम समेत कई खनिज उत्पाद खरीदता है. अगर इन चारों देशों के उपलब्ध आंकड़ों को एक साथ देखें, तो भारत का इन BRICS देशों के साथ कारोबार 240 अरब डॉलर से ज्यादा के स्तर पर पहुंचता है. लेकिन इस आंकड़े के पीछे एक बड़ी कहानी भी है. भारत की बिक्री और खरीद के बीच काफी अंतर है. चीन और रूस के साथ भारत का आयात बहुत ज्यादा है, जबकि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ व्यापार अपेक्षाकृत संतुलित नजर आता है. यही वजह है कि BRICS के साथ भारत की आर्थिक साझेदारी में सिर्फ कारोबार बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं है. भारत की कोशिश यह भी है कि इन देशों के बाजारों में भारतीय दवाइयों, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग सामान, टेक्सटाइल और दूसरे तैयार उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़े, ताकि व्यापार घाटे को कम किया जा सके.

5. भारत के लिए BRICS का सबसे बड़ा फायदा क्या है, व्यापार, निवेश, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी या वैश्विक राजनीति में बढ़ता प्रभाव?

भारत के लिए BRICS सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय समूह का हिस्सा होने भर की बात नहीं है. इसके पीछे व्यापार से लेकर ऊर्जा, निवेश, टेक्नोलॉजी और वैश्विक राजनीति तक कई बड़े फायदे जुड़े हुए हैं. लेकिन सवाल यह है कि इन सबमें भारत के लिए सबसे अहम फायदा आखिर क्या है?

अगर व्यापार की बात करें तो BRICS भारत को दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के साथ कारोबार बढ़ाने का मौका देता है. रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अब समूह से जुड़े दूसरे देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत करना भारत के लिए बाजारों का दायरा बढ़ा सकता है. खासकर ऐसे समय में जब दुनिया में व्यापार को लेकर नई तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं. निवेश भी एक बड़ा पहलू है. BRICS के मंच से भारत विदेशी निवेशकों के सामने अपनी अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर और नए कारोबारी अवसरों को लेकर बेहतर स्थिति बना सकता है. इसके अलावा ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए हमेशा महत्वपूर्ण रही है. तेल, गैस और दूसरे ऊर्जा संसाधनों को लेकर BRICS देशों के साथ सहयोग भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता है.

टेक्नोलॉजी का क्षेत्र भी तेजी से अहम हो रहा है. डिजिटल पेमेंट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्पेस और नई तकनीकों में सहयोग आने वाले वर्षों में भारत के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है. लेकिन इन सभी पहलुओं से ऊपर एक चीज है, जो BRICS को भारत के लिए खास बनाती है और वह है वैश्विक राजनीति में बढ़ता प्रभाव. भारत लंबे समय से ऐसी विश्व व्यवस्था की वकालत करता रहा है जिसमें विकासशील देशों की आवाज ज्यादा मजबूती से सुनी जाए. BRICS भारत को इसी दिशा में दूसरे उभरते देशों के साथ मिलकर अपनी बात रखने का मंच देता है.

यही वजह है कि भारत के लिए BRICS का सबसे बड़ा फायदा केवल व्यापार या निवेश तक सीमित नहीं है. असली फायदा यह है कि इसके जरिए भारत वैश्विक फैसलों और बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकता है. व्यापार, ऊर्जा और टेक्नोलॉजी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन इनके साथ बढ़ता कूटनीतिक और राजनीतिक प्रभाव भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ साबित हो सकता है.

6. चीन और रूस जैसे देशों के साथ भारत के रिश्तों और मतभेदों के बीच BRICS में भारत अपने हितों का संतुलन कैसे साध सकता है

भारत के लिए BRICS सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय समूह का हिस्सा होने भर की बात नहीं है. इसके पीछे व्यापार से लेकर ऊर्जा, निवेश, टेक्नोलॉजी और वैश्विक राजनीति तक कई बड़े फायदे जुड़े हुए हैं. लेकिन सवाल यह है कि इन सबमें भारत के लिए सबसे अहम फायदा आखिर क्या है?

अगर व्यापार की बात करें तो BRICS भारत को दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के साथ कारोबार बढ़ाने का मौका देता है. रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अब समूह से जुड़े दूसरे देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत करना भारत के लिए बाजारों का दायरा बढ़ा सकता है. खासकर ऐसे समय में जब दुनिया में व्यापार को लेकर नई तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं. निवेश भी एक बड़ा पहलू है. BRICS के मंच से भारत विदेशी निवेशकों के सामने अपनी अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर और नए कारोबारी अवसरों को लेकर बेहतर स्थिति बना सकता है. इसके अलावा ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए हमेशा महत्वपूर्ण रही है. तेल, गैस और दूसरे ऊर्जा संसाधनों को लेकर BRICS देशों के साथ सहयोग भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता है.

टेक्नोलॉजी का क्षेत्र भी तेजी से अहम हो रहा है. डिजिटल पेमेंट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्पेस और नई तकनीकों में सहयोग आने वाले वर्षों में भारत के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है. लेकिन इन सभी पहलुओं से ऊपर एक चीज है, जो BRICS को भारत के लिए खास बनाती है और वह है वैश्विक राजनीति में बढ़ता प्रभाव. भारत लंबे समय से ऐसी विश्व व्यवस्था की वकालत करता रहा है जिसमें विकासशील देशों की आवाज ज्यादा मजबूती से सुनी जाए. BRICS भारत को इसी दिशा में दूसरे उभरते देशों के साथ मिलकर अपनी बात रखने का मंच देता है.

यही वजह है कि भारत के लिए BRICS का सबसे बड़ा फायदा केवल व्यापार या निवेश तक सीमित नहीं है. असली फायदा यह है कि इसके जरिए भारत वैश्विक फैसलों और बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकता है. व्यापार, ऊर्जा और टेक्नोलॉजी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन इनके साथ बढ़ता कूटनीतिक और राजनीतिक प्रभाव भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ साबित हो सकता है.

7. BRICS में चीन का दबदबा कितना है और भारत के लिए सबसे बड़ा व्यावहारिक फायदा क्या निकल सकता है, नए बाजार, निवेश, सस्ती ऊर्जा, लोकल करेंसी में कारोबार या ग्लोबल संस्थाओं में ज्यादा प्रभाव?

BRICS में चीन का दबदबा किसी से छिपा नहीं है. अर्थव्यवस्था का आकार हो, व्यापार हो या वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक प्रभाव, चीन इस समूह में सबसे मजबूत ताकतों में शामिल है. ऐसे में भारत के सामने असली सवाल यह है कि BRICS में चीन की बढ़ती भूमिका के बीच उसे अपने लिए सबसे बड़ा व्यावहारिक फायदा क्या मिल सकता है.

भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा नए बाजारों तक पहुंच और व्यापार के विस्तार के रूप में सामने आ सकता है. BRICS में शामिल और इससे जुड़े देशों के साथ भारत का कारोबार बढ़ता है तो भारतीय कंपनियों के लिए दवाइयों, आईटी, कृषि उत्पादों, इंजीनियरिंग सामान और दूसरे क्षेत्रों में नए अवसर खुल सकते हैं. इसके साथ ही निवेश भी एक बड़ा मुद्दा है. अगर BRICS के मंच का इस्तेमाल आपसी निवेश बढ़ाने के लिए होता है, तो भारत को बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में फायदा मिल सकता है.

भारत को ऊर्जा जरूरतों के लिए मिले विकल्प

सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा भी भारत के लिए बेहद अहम है. रूस जैसे ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ रिश्ते मजबूत होने से भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहतर विकल्प मिल सकते हैं. इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और उद्योगों की लागत पर पड़ सकता है. लोकल करेंसी में कारोबार की बात भी लगातार चर्चा में है. डॉलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम करने की कोशिश भारत के लिए लंबे समय में फायदेमंद हो सकती है, लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा. इसके लिए अलग-अलग देशों के बीच भुगतान व्यवस्था, मुद्रा विनिमय और व्यापार संतुलन जैसी कई व्यावहारिक चुनौतियों को दूर करना पड़ेगा.

नए बाजारों और निवेश में भारत देगा चीन को चुनौती

जहां तक ग्लोबल संस्थाओं में ज्यादा प्रभाव की बात है, वहां भी BRICS भारत को एक मजबूत मंच देता है. भारत विकासशील देशों की आवाज को ज्यादा मजबूती से उठा सकता है और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग को आगे बढ़ा सकता है. लेकिन इन सभी विकल्पों में भारत के लिए सबसे सीधा और व्यावहारिक फायदा नए बाजारों और निवेश के विस्तार में दिखाई देता है. ऊर्जा और लोकल करेंसी में कारोबार लंबे समय में महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जबकि वैश्विक संस्थाओं में प्रभाव बढ़ाना रणनीतिक फायदा होगा. यानी BRICS में चीन का दबदबा भारत के लिए चुनौती जरूर है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि चीन की ताकत भारत के हितों के खिलाफ ही जाए. अगर भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए इस मंच का इस्तेमाल करता है, तो BRICS उसके लिए नए बाजार, निवेश और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण जरिया बन सकता है.

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About the Author

Ravindra Pratap Singh

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रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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