ईरान के केशम द्वीप पर अमेरिकी वार, दुनिया की तेल सप्लाई पर तलवार! भारत के लिए दांव पर क्या है?
अमेरिका ने ईरान के केशम द्वीप पर हमला किया है. इसे होर्मुज का टोल गेट भी कहा जाता है. क्यों हमले के लिए अमेरिका ने इसी को चुना और क्यों भारत के लिए यह चिंता की बात हो सकती है, चलिए आपको बताते हैं.
ईरान के दो आईलैंड्स के बीच पानी का एक छोटा सा हिस्सा है. अमेरिका-ईरान जंग के बाद से होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए यह एक अहम रास्ता बन चुका है. खबरों के मुताबिक, कुछ जहाजों ने सुरक्षित निकलने के लिए 18,95,70,200 रुपये तक का भुगतान किया है. वहीं, कुछ अन्य जहाजों ने इजाजत पाने के लिए कूटनीति का सहारा लिया है.
लेकिन, वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, अमेरिका ने 2 नवंबर को इन्हीं में से एक केशम द्वीप पर अटैक किया है. इस हमले के बाद से केशम और उसके पास स्थित लराक आइलैंड के पास मौजूद शिपिंग कॉरिडोर पर हर किसी का ध्यान चला गया है. यहां ईरानी अफसर जहाजों की जांच करते हैं. यह दुनिया का सबसे बिजी ऑयल सी रूट है. यहां से गुजरने वाले हर एक जहाज पर ईरानी अफसर नजर रखते हैं. लेकिन भारत के लिए यह क्यों जरूरी है, यह आपको बताएंगे, लेकिन पहले जानिए कि केशम द्वीप पर ही क्यों अमेरिका ने अटैक किया.
केशम द्वीप इतना अहम क्यों है?
- केशम द्वीप 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के एंट्री गेट के पास है. यह एक संकरा समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है.
- जंग शुरू होने से पहले, दुनिया भर में होने वाली तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता था.
- 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' के मुताबिक, इस आइलैंड पर एक अंडरग्राउंड मिसाइल ठिकाना और एक नेवी बेस भी मौजूद है.
- अमेरिकी अधिकारियों ने इन हमलों को 'डिफेंसिव एक्शन' बताया है, जिसका मकसद ईरान की उस ताकत को कम करना था, जिससे वह कारोबारी जहाजों को खतरा पहुंचा सकता है.
- जब यह रिपोर्ट सामने आई, तब तक अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इस हमले की सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं की थी.
ईरान का 'टोल बूथ' कैसे काम करता है?
- मार्च से, ईरान ने केशम और लराक द्वीपों के पास अपने समुद्री क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए एक कंट्रोल्ड रास्ता बना रखा है.
- शिपिंग इंटेलिजेंस फर्म 'लॉयड्स लिस्ट' ने इस सिस्टम को एक तरह का 'टोल बूथ' बताया है, जहां जहाजों को आगे बढ़ने से पहले ईरान से मंजूरी लेनी पड़ती है.
- इस प्रक्रिया में जहाज के मालिक, उसमें लदे सामान, मंजिल और क्रू के बारे में जानकारी देनी होती है. ईरान का 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) इन सबकी जांच करता है, और कुछ जहाजों की तो मौके पर जाकर तलाशी भी ली जाती है.
- मार्च में,'लॉयड्स लिस्ट' ने रिपोर्ट दी थी कि कम से कम दो जहाजों ने वहां से गुजरने के लिए भुगतान किया था, जिसमें से एक भुगतान लगभग 18 करोड़ रुपये से ज्यादा का था.
- इससे यह साबित नहीं हुआ कि इस कॉरिडोर का इस्तेमाल करने वाले हर जहाज ने भुगतान किया था.
- मई में रॉयटर्स की एक जांच में पता चला कि ईरान के क्लीयरेंस सिस्टम में गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट समझौते भी शामिल थे, और कुछ जहाजों ने कथित तौर पर 1,42,13,602 रुपये से ज्यादा की फीस चुकाई थी.
- इन भुगतानों पर अमेरिका की नजर पड़ी है. जुलाई में, अमेरिकी ट्रेजरी ने ईरान की दो कंपनियों पर बैन लगा दिया.
- इन कंपनियों पर आरोप है कि वे होर्मुज से गुजरने के लिए एक अनिवार्य समुद्री बीमा योजना चला रही थीं.
भारत के लिए चिंता की बात क्यों है?
केशम पर अमेरिका का हमला भारत के लिए महज मिलिट्री एक्टिविटी तक सीमित नहीं है. भारतीय जहाजों को पहले से ही ईरान की मंजूरी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. इसके अलावा, खाड़ी देशों से एनर्जी सप्लाई पर भारत की निर्भरता के कारण, होर्मुज में किसी भी तरह की रुकावट भारत के लिए चिंता की बात है. भारत पहले ही इस क्लीयरेंस प्रणाली से निपट चुका है.
रॉयटर्स के अनुसार, भारत ने तेहरान में अपने दूतावास का इस्तेमाल ईरानी अधिकारियों के साथ कॉर्डिनेशन करने के लिए किया, ताकि इस समुद्री रास्ते से भारतीय जहाजों की आवाजाही को आसान बनाया जा सके.
एक भारतीय नाविक ने न्यूज एजेंसी को बताया कि उनके जहाज को लराक द्वीप की ओर जाने का आदेश दिया गया था, जहां ईरानी नेवी ने जहाज के ब्योरे की जांच की और फिर आगे बढ़ने के लिए एक रास्ता (रूट) बताया.
14 मई को, भारत के जहाजरानी मंत्रालय ने बताया कि भारतीय झंडे वाले 13 जहाज इस स्ट्रेट से गुजर चुके थे, जबकि 13 अन्य जहाज इस समुद्री रास्ते के पश्चिम में फंसे हुए थे.
इसके बाद सरकार ने सुरक्षा उपायों को और कड़ा कर दिया. मंत्रालय के अगस्त के एक बयान के मुताबिक, जुलाई में भारत के समुद्री नियामक ने शिपिंग कंपनियों को सलाह दी कि वे अगले आदेश तक होर्मुज से होकर गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों को तैनात न करें.
भारत की तेल सप्लाई के लिए यह क्यों अहम है?
रॉयटर्स के अनुसार, इस जंग से पहले, भारत अपने कच्चे तेल के आयात का 40 परसेंट से ज्यादा और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) के इंपोर्ट का लगभग 90 परसेंट हिस्सा होर्मुज के रास्ते ही मंगाता था.
इस रुकावट के कारण भारत को एनर्जी सप्लाई के वैकल्पिक स्रोत खोजने पड़े और शिपिंग से जुड़ी रुकावटों का निपटारा करना पड़ा.
केशम पर हमले की रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब तेल बाजारों में फिर से अस्थिरता देखी जा रही है. 3 नवंबर को एशियाई बाजारों में शुरुआती कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत 105.25 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि पिछले सत्र में इसमें 7.63% की गिरावट आई थी.
शिपिंग कॉरिडोर पर क्या पड़ा असर?
फिलहाल यह साफ नहीं है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने केशम पर सीमित हमला किया. कहा गया कि इसका मकसद कारोबारी जहाजों के लिए ईरान से पैदा होने वाले खतरों को सीमित करना था.
हालांकि, अभी तक ऐसी कोई पुष्टि नहीं हुई है, जिससे यह पता चले कि हमले से शिपिंग चेकप्वॉइंट्स को कोई नुकसान पहुंचा है, या केशम और लराक के पास जहाजों को मंजूरी देने की प्रक्रियाओं में कोई बदलाव आया है.
फिलहाल, इस हमले की खबर और ईरान के शिपिंग पर कंट्रोल, ये दो ऐसी घटनाएं हैं जो इसी रणनीतिक रूप से अहम द्वीप से जुड़ी हैं, लेकिन इनके बीच कोई सीधा ऑपरेशनल कनेक्शन अभी तक साबित नहीं हुआ है.