ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमा पर बसे 21 गांवों के समूह 'कोटिया' पर अधिकार को लेकर विवाद जारी है. इसी बीच, आंध्र प्रदेश ने यहां के तीन गांवों में चुनाव कराने का ऐलान कर दिया. इस घोषणा के बाद ओडिशा की राजनीति गरमा गई है. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक ने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को पत्र लिखकर जवाब मांगा है. उन्होंने बीजेपी के पुराने चुनावी वादे की याद दिलाते हुए सवाल उठाया कि जब पार्टी ने ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने और कोटिया विवाद का स्थायी समाधान निकालने का वादा किया था, तो अब विवादित गांवों में चुनाव कराने के ऐलान पर सरकार क्या कदम उठा रही है?
अपने पत्र में पटनायक ने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी सरकार ने ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष किया था. उन्होंने याद दिलाया कि भाजपा नेता भी पहले यह दावा करते रहे हैं कि कोटिया ओडिशा का हिस्सा है और उन्होंने 'गो बैक आंध्र' जैसे नारे भी लगाए थे. उन्होंने कहा कि 2024 के चुनाव से पहले भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि डबल इंजन सरकार बनने पर कोटिया विवाद का स्थायी समाधान निकाला जाएगा, ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा की जाएगी और 'ओड़िया स्वाभिमान' को मजबूत किया जाएगा. पटनायक ने सवाल किया कि उन वादों का क्या हुआ.
आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सरहद पर बसे 21 गावों के एक समूह को 'कोटिया' कहते हैं. ये सभी गांव ओडिशा के कोरापुट जिले और आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मन्याम जिले (सालूर मंडल) के बीच पड़ते हैं. यह विवाद लगभग 70 वर्ष पुराना है. जब 1936 में ओडिशा को भाषा की बुनियाद पर अलग राज्य बनाया गया और बाद में 1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ, तब इस पहाड़ी सीमावर्ती क्षेत्र का बंटवारा स्पष्ट रूप से नहीं किया गया था.

'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के मुताबिक,'आंध्र प्रदेश अपने दावे के पीछे ब्रिटिश काल की मद्रास प्रेसीडेंसी के आदेश हैं. जिनमें कहा गया था कि ये गांव सालूर के जमींदारों के तहत हैं. जबकि दूसरी तरफ ओडिशा का कहना है कि ये सभी गांव हमेशा से कोरापुट जिले का हिस्सा रहे हैं. यह मामला 1968 में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था. ओडिशा ने आंध्र प्रदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दाखिल किया था, तब अदालत ने यथास्थिति बरकरार रखने की बात कही थी.
हालांकि, 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को लेकर कहा कि इसका फैसला सरकार को संसद के जरिए करना चाहिए. अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 131 के तहत ऐसे विवादों का हल निकालने का हक संसद के पास है.
इस तरह के विवाद में वहां रह लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. सरकारी स्कीमों और पहचान को लेकर भी सवाल उठते रहते हैं. ग्रामीणों को रोजमर्रा की जिंदगी में भी प्रशासनिक और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के मुताबिक,'मुत्यालु मर्री नाम के करीब 60 साल के एक आदिवासी व्यक्ति के दो राज्यों के सरकारी रिकॉर्ड में अलग-अलग नाम दर्ज हैं. आंध्र प्रदेश में: Muthyalu Marri, जबकि ओडिशा में Mutal Mari नाम है. उनके पास दोनों राज्यों के अलग-अलग वोटर आईडी और राशन कार्ड हैं.'

आंध्र और ओडिशा के बीच ही सरहदी जगहों को लेकर विवाद नहीं है. इन दोनों राज्यों के अलावा कई और भी चर्चित मामले हैं. कहीं गांवों पर अधिकार को लेकर खींचतान है, तो कहीं जमीन और प्रशासनिक सीमाओं का मामला उलझा हुआ है. नीचे दी गई टेबल में ऐसे ही कुछ प्रमुख अंतर-राज्य सीमा विवादों और उनके मुख्य मुद्दों को समझिए.
| राज्य | किसके साथ विवाद | मुख्य विवाद |
|---|---|---|
| असम | अरुणाचल प्रदेश | सीमा और गांवों पर दावा |
| असम | मेघालय | 12 विवादित क्षेत्र |
| असम | मिजोरम | सीमा निर्धारण |
| असम | नागालैंड | जमीन और जंगलों पर दावे |
| महाराष्ट्र | कर्नाटक | बेलगावी और आसपास के क्षेत्र |
| ओडिशा | छत्तीसगढ़ | सीमावर्ती गांवों का विवाद |
| हरियाणा | हिमाचल प्रदेश | सीमा निर्धारण |
| लद्दाख | हिमाचल प्रदेश | कुछ क्षेत्रों की सीमा |