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क्या है हुदूद, किसास और ताजीर, जिन पर टिका है सऊदी अरब का कानून; किस इस्लामी 'दस्तूर' ने बांग्लादेश से बढ़ाया तनाव?

सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सजा दिए जाने के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक विवाद बढ़ गया है. बांग्लादेश ने पूछा है कि आखिर उसके नागरिकों का वह कौन सा आचरण था, जिसके तहत उनको सूली पर लटका दिया गया और इस बारे में उसे क्यों जानकारी नहीं दी गई.

Written By Rachit Kumar
Published: Oct 22, 2026, 11:06 AM IST | Updated: Oct 22, 2026, 01:17 PM IST
Image Credit: सऊदी अरब के कानून क्यों हैं चर्चा में?
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सऊदी अरब में एक बांग्लादेशी महिला और पुरुष को फांसी दे दी गई. बांग्लादेश ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और 15 अक्टूबर को सऊदी अरब को एक 'नोट वर्बेल' (बिना दस्तखत वाला राजनयिक पत्र) भेजा. इसमें 14 अक्टूबर को बांग्लादेशी कपल को दी गई मौत के बारे में सफाई मांगी गई है. इसमें पूछा गया कि इस बारे में तारिक रहमान सरकार को कोई जानकारी क्यों नहीं दी गई.

दरअसल, इस कपल को इस्लामी सजा कानून के 'ताजीर' के तहत सजा दी गई थी. यह ऐसा सिस्टम है,जिसमें अपराध और सजा तय करने का अधिकार जज के पास होता है.सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने कहा है कि जो भी शख्स मस्जिदों की पवित्रता का उल्लंघन करेगा, उसके खिलाफ इस्लामिक कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी.

फिलहाल तारिक रहमान सरकार सऊदी अरब के जवाब का इंतजार कर रही है.इस बीच यह भी पूछा जा रहा है कि सऊदी अरब यह कैसे तय करता है कि किस अपराध के लिए क्या सजा दी जाएगी. वहां के सिस्टम में इस्लामिक कानून की कितनी और क्या भूमिका है. इसमें जज के विवेक का कितना हिस्सा है? अतीत में मौत की सजा के फैसले कैसे दिए गए हैं? चलिए इन सब सवालों के जवाब हम आपको देते हैं.

पहले घटना के बारे में जान लीजिए

फिलहाल, इस घटना को लेकर जो भी फैक्ट्स हैं, वह पूरी तरह से जारी नहीं किए गए हैं. गल्फ न्यूज के मुताबिक, बांग्लादेशी शख्स नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सीती अख्तर को 14 अक्टूबर को फांसी की सजा दी गई. कोर्ट ने उनको मक्का शहर की मस्जिद के भीतर कथित तौर पर अश्लील हरकत करने का दोषी ठहराया.  

अगले दिन, जेद्दा में बांग्लादेश के राजनयिक मिशन ने सऊदी विदेश मंत्रालय को एक नोट वर्बेल भेजकर फांसी दिए जाने के मामले पर सफाई मांगी. 18 अक्टूबर को, ढाका में सऊदी राजदूत को एक और खत भेजा गया.

मंत्रालय ने अभी तक और जानकारी नहीं दी है कि वह कौन सी मस्जिद थी? कैसी  'अश्लीलता' थी? इन दोनों को किस तारीख को गिरफ्तार किया गया था? बताया गया है कि उन पर 'ताजीर' कानून के तहत मुकदमा चलाया गया था.

जेद्दा में बांग्लादेश ने इस इलाके में मौजूद बांग्लादेशी कैदियों के बारे में जानकारी मांगी थी. मृतकों के नाम उस सूची में शामिल थे, हालांकि उनकी सजा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी. गल्फ न्यूज ने बताया कि एक न्यायिक प्राधिकरण के मौत की सजा को बरकरार रखने और एक शाही आदेश जारी होने के बाद इन दोनों को सूली पर लटका दिया गया.

हनबली विचारधारा पर आधारित है सिस्टम 

सऊदी अरब और बांग्लादेश दोनों ही मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल देश हैं. लेकिन बांग्लादेश का सिस्टम एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की तरह है और वहां का कानूनी सिस्टम इस्लामिक कानून से नहीं चलती है. 2022 की जनसंख्या और आवास जनगणना के अनुसार, वहां की 90% से ज्यादा आबादी मुस्लिम है.

बात अगर सऊदी अरब की करें तो वहां शरिया कानून चलता है. देश में क्रिमिनल, सिविल और पर्सनल मामलों पर फैसले इसी के आधार पर लिए जाते हैं. मगर, शासन-व्यवस्था में देश के कानूनों की भी भूमिका होती है, जो हर देश में अलग-अलग हो सकती है.

उदाहरण के लिए, महिलाओं के गाड़ी चलाने पर लगी पाबंदियां इस्लामी कानून से नहीं आई हैं. गौर करने वाली बात है कि इस्लामी क्रिमिनल लॉ कोई एक समान संहिता नहीं है, बल्कि इसकी व्याख्या अलग-अलग तरह से की जा सकती है.

1932 में सऊदी अरब के इंटीग्रेशन के बाद से यहां की जूडिशल इंटरप्रिटेशन 'हनबली' विचारधारा यानी इस्लामी कानून की चार अहम विचारधाराओं में से एक पर आधारित रही है. हनबली विचारधारा के तहत जजों को बहुत कम आजादी मिलती है.अपने फैसलों के लिए वे पूरी तरह से कुरान और हदीस (पैगंबर मुहम्मद के कथन और परंपराओं) पर निर्भर हैं. खास तौर से आपराधिक कानून के मामले में.

तीन कैटेगरी से मिलती है सजा

क्राइम को मोटे तौर पर तीन कैटेगरी में बांटा गया है. हुदूद (Hudud), किसास (Qisas) और ताजीर (Ta'zir). लीगल स्कॉलर शिबली मल्लात ने अपनी स्टडी 'मैपिंग सऊदी क्रिमिनल लॉ' में एक ऐसे सिस्टम के बारे में बताया है, जहां कुछ क्राइम्स से निपटने के लिए अलग से कानून बनाए गए हैं. जबकि अन्य क्राइम्स के लिए हुदूद, किसास और ताजीर का इस्तेमाल किया जाता है.

अब विस्तार से समझिए कि आखिर हुदूद, किसास और ताजीर आखिर क्या हैं और इनमें किन-किन सजाओं का प्रावधान है.

हुदूद क्या है?

हुदूद कानून उन अपराधों के लिए है, जिनके लिए इस्लामी कानून में सजाएं तय हैं. ये कुरान और हदीस पर आधारित हैं. हुदूद के तहत आने वाले आम अपराधों में जिना (अवैध यौन संबंध), चोरी, और कुछ व्याख्याओं के  मुताबिक धर्मत्याग शामिल हैं.

सात अपराधों को हुदूद के क्राइम में बांटना स्कॉलर्स की व्याख्या पर आधारित है, न कि कुरान में दी गई किसी लिस्ट पर. हुदूद के तहत सजा देने के लिए सबूतों की बहुत सख्त जरूरत होती है. अपराध और कानूनी विचारधारा (मजहब) के आधार पर, इसमें चश्मदीद गवाहों की गवाही और खास तरह के सबूत शामिल हो सकते हैं. इन शर्तों के साथ-साथ यह सिद्धांत भी है कि जहां भी शक हो, वहां हुदूद सजा देने से बचना चाहिए। इस वजह से, खासकर उन मामलों में जहां सबसे मुश्किल सजा का प्रावधान है, किसी को दोषी ठहराना मुश्किल हो सकता है.

अब किसास को समझिए

किसास का मतलब है 'बदला' लेना. यह पीड़ित को न्याय पाने का एक रास्ता देता है. कुरान में अलग-अलग तरह की सजाओं का जिक्र है. इसमें 'दिया' (मुआवजा या भरपाई) भी शामिल हो सकता है. यह 'विवेकाधीन सजा' से अलग है. इसमें हत्या (चाहे वह पहले से सोची-समझी हो या अचानक हुई हो) और मानव जीवन के खिलाफ किए गए अन्य गंभीर अपराध शामिल है.

ताजीर क्या है?

वहीं, ताजीर उन अपराधों के लिए दी जाने वाली 'विवेकाधीन सजा' है, जिनके लिए कोई निश्चित 'हद्द' सजा तय नहीं है और जो किसास के नियमों के दायरे में भी नहीं आते. इसमें कई तरह के आचरण शामिल हो सकते हैं, जैसे कि ऐसे काम जो पब्लिक ऑर्डर या समाज के लिए हानिकारक माने जाते हैं. जज तय नियमों के दायरे में रहकर सजा देते हैं. जो आखिरी कैटेगरी है, वह सऊदी अरब में काफी अहम है.

ताजीर में अपराधों की कोई फिक्स लिस्ट और उनकी सजा नहीं होती. यह जजों के विवेक पर निर्भर होता है कि उसे क्राइम के लिए क्या सजा देनी है. असल में अगर कोई केस ताजीर के तहत आया है तो इसका मतलब यह नहीं कि उस शख्स को फांसी की सजा हो जाएगी.

यही सवाल बांग्लादेश की सरकार का  भी है कि आखिर उसके नागरिकों का वह कौन सा आचरण था, जिसके तहत उनको फांसी दे दी गई और इस बारे में उनसे जानकारी भी नहीं दी जा रही है.

तो आखिर क्यों दे दी जाती है फांसी?

साल 2021 में सऊदी अरब की सरकार ने अपने लीगल सिस्टम में ज्यादा पूर्वानुमान की जरूरत को महसूस किया. उसी साल फरवरी में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कानूनी सुधारों के एक कार्यक्रम का ऐलान किया. हालांकि, यह घोषणा लागू किए जा सकने वाले कानून से अलग है.

इस मामले में, संवाद की कमी के अलावा, मुख्य विवाद ताजीर और इसके तहत मिलने वाले विवेकाधिकार के दायरे को लेकर है. विवेकाधीन सजा का इस्तेमाल कई तरह के अपराधों के लिए किया जाता है, जिसमें जेल की सजा से लेकर जुर्माना या जैसा कि इस मामले में फांसी की सजा दिए जाने तक हो सकता है.

ताजीर अपराधों के लिए मौत की सजा का इस्तेमाल विवादित है, वह इसलिए क्योंकि यह सजा अपराधों की किसी ऐसी एक लिस्ट से जुड़ी नहीं है, जिसमें हर अपराध के लिए पहले से तय सजा हो. ऐसे में सवाल यह उठता है कि किस तरह के आचरण को अपराध माना जाए, किस कानूनी सिद्धांत के आधार पर कोई विशेष सजा दी जाए और आरोपी को क्या सुरक्षा उपाय दिए जाएं. ताजीर के दायरे को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद रहे हैं, और सऊदी अरब की आधुनिक कानूनी व्यवस्था पुराने न्याय के तरीकों और देश की दखलअंदाजी के मेल से विकसित हुई है.

सऊदी अरब में मौत की सजा का बढ़ता आंकड़ा

एमनेस्टी इंटरनेशनल की फांसी की सजा पर तैयार सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में इस राज्य ने कम से कम 356 लोगों को मौत की सजा दी. 2024 में यह आंकड़ा 345 था, जिसमें नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के लिए दी गई 122 मौत की सजाएं शामिल थीं. 2025 में, कुल 356 मौत की सजाओं में से 240 मामले नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के थे.

सऊदी अरब की वर्कफोर्स में एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेशियों का भी है. लिहाजा, यह मामला सिर्फ एक शख्स तक ही सीमित नहीं है. विदेशों में गंभीर आरोपों का सामना कर रहे नागरिकों के लिए कानूनी सहायता, दूतावास के साथ प बातचीत और आपराधिक कार्यवाही के बारे में भरोसेमंद जानकारी मिलना बहुत जरूरी हो सकता है.

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About the Author

रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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