1 नवंबर 2026 को रामलीला मैदान में राहुल गांधी की प्रस्तावित रैली पर मचा घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि वो 1 नवंबर 1984 का ही दिन था जब तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को उनके सिख सुरक्षागार्डों द्वारा गोली मारे जाने के 24 घंटे हुए थे, उसी दौरान भड़की हिंसा और दंगों में बेगुनाह सिखों को मौते के घाट उतारा जा रहा था. उस दौरान देशभर में 3500 से ज्यादा सिखों का नरसंहार हुआ था. आपको बताते चलें कि 1984 की सिख विरोधी हिंसा और हुए दंगे मध्यकालीन न्याय की बड़ी भयानक और वीभत्स नुमाइश थी. ऐसे में विपक्ष के कथित वोट चोरी, एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहे सियासी जुटान के लिए इसी तारीखी दिन का चुनाव करने से आहत 1984 के दंगा पीड़ितों ने उसी दिन 1 नवंबर को राहुल गांधी की रैली के खिलाफ रामलीला मैदान में उतरने का ऐलान करते हुए गृह मंत्री अमित शाह से ऐसे आयोजन को मंजूरी न देने की अपील की है.
बीजेपी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के सभी नेताओं को इस दिन रैली करने के बजाए सिख समुदाय और पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए. दूसरी ओर कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि राहुल गांधी की रैली में देशभर से दस लाख लोग दिल्ली पहुंचेंगे. ऐसे में कांग्रेस के चमकते तेज से परेशान बीजेपी उसके आयोजन में खलल डालना चाहती है. इसलिए किसी भी कीमत पर कांग्रेस की रैली को डाउन प्ले करने की साजिशें बुन रही है.
हमारा वोट चुराया जा रहा है और ये हम किसी हाल में चुपचाप नहीं सहेंगे। मतदाता सूचियों से नाम काटे गए। नियम-कानून तोड़े गए। और सवाल पूछने वालों पर लाठियां चलीं। अब जवाब देश देगा। 1 नवंबर - चलो दिल्ली। वोट बचाओ - देश बचाओ जन मार्च और महारैली। छात्र, किसान, मज़दूर, महिलाएं, नौजवान और व्यापारी - जिस-जिस को लोकतंत्र की फ़िक्र है, वो ज़रूर आए। वोट आपका है। लड़ाई भी आपकी है। रामलीला मैदान, नई दिल्ली PS: BJP और उसके साथियों का दिल से धन्यवाद, जो इस कार्यक्रम का इतना ज़ोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं और इसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचा रहे हैं। बस अगले 7 दिन भी यही जोश और लगन बनाए रखिए! #ChaloDilli #RamlilaMarch
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) October 25, 2026
1984 के दंगा पीड़ितों में से एक ने कहा, 'मैं राहुल गांधी से ये कहना चाहता हूं कि सिखों की भावनाओं से खेलना करना बंद करें. क्योंकि जब भी उन्हें मौका मिलता है, वो ऐसा करने लगते हैं. जब 2014 के लोकसभा चुनाव थे, तब दौसा में कांग्रेस की रैली थी और राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के पीएम कैंडिडेट थे, मैं भी वहीं था. मैंने टीवी पर देखा वो कह रहे थे, 'जब मैं सरदारों को देखता हूं तो मुझे मेरी दादी याद आती है.'
उन्होंने आगे कहा कि मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि राहुल गांधी, जब हम आपको देखते हैं, आपके परिवार को देखते हैं, तो हमें अपने वे परिवार याद आते हैं, जिनके हजारों निर्दोष लोग मारे गए थे. हमें वे हजारों गुरुद्वारे याद आते हैं जिन्हें जलाया गया था. हमें वो माताएं-बहनें याद आती हैं जिनके साथ आपके गुंडों ने दरिंदगी की थी.
एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि हम एक तारीख को इसका विरोध करने के लिए रामलीला मैदान में जाएंगे. हजारों विधवाएं वहां पहुंचेंगी. जो होगा, देखा जाएगा. हम 42 साल से कितना सहन करते आए हैं? आपने सिखों के कथित हत्यारों को टिकट दिए, उन्हें मंत्री बनाया. क्या आपको शर्म नहीं आई? आपने टाइटलर को टिकट दिया, सज्जन कुमार को टिकट दिया, कमलनाथ को आगे बढ़ाया, यहां तक कि मुख्यमंत्री बनाया. क्या आपको जरा भी शर्म नहीं आई? न आपको शर्म आती है, न आपके परिवार को, और न ही आपकी पार्टी को. राहुल गांधी, सिखों के साथ खेलना बंद करो. हमारे जख्मों पर नमक छिड़कना बंद करो.
सिख विरोधी दंगों की एक पीड़िता ने कहा, 'सिर्फ अपनी राजनीतिक सीटों के लिए कुछ भी करना सही नहीं है. पहले इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हमारे परिवारों को नुकसान पहुंचा, और अब जब सिख समुदाय अपनी बात उठाता है तो उसे दबाने की कोशिश की जाती है. क्या सिर्फ राहुल गांधी की ही चलेगी? हम भी विरोध करेंगे. अगर हम उनकी रैली का बहिष्कार करना चाहते हैं तो करेंगे. हमारे सिखों को जिस प्रकार मारा गया, उस दर्द को हम भूल नहीं सकते. हम राहुल गांधी से कहना चाहते हैं कि समझदारी से काम लें, यही उनके लिए सही रहेगा.
एक अन्य महिला ने कहा, 'कांग्रेस पार्टी शायद इससे खुश हो, लेकिन जिन लोगों ने अपने परिवार खोए हैं, उनके लिए एक नवंबर की तारीख खुशी का मौका नहीं है. आज भी अनेक विधवाएं और पीड़ित परिवारों के दिलों में मौजूद जख्म अबतक हरे हैं. हम लोग उस दर्द को याद करके सिहर उठते हैं. हमारा ऐलान है कि अगर कांग्रेस रैली निकालेगी, तो हम भी विरोध प्रदर्शन करेंगे. हम पीछे नहीं हटेंगे.'
इसी तरह सिख विरोधी दंगों के एक और पीड़ित ने बताया कि 42 साल पहले 1984 में जब हमारे लोगों को मारा गया, तो उनकी जान की कीमत दस हजार रुपए लगाई गई. जिनका लाखों-करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ, उन्हें कुछ सौ या हजार रुपए का मुआवजा मिला था. हमारे साथ जो कुछ उस समय हुआ एक भद्दा मजाक था. मैं पूछता हूं, आज किसी आंदोलन में कोई घायल हो जाए तो पचास लाख रुपए की मांग करते हो, किसी की मृत्यु हो जाए तो एक करोड़ मांगते हो. 1984 में जब सिखों का नरसंहार हो रहा था, उस समय आपको ये सब याद नहीं था?
कांग्रेस की रैली के लिए एक अक्टूबर की तारीख सुनकर भड़के कुछ सिखों ने कांग्रेस नेताओं पर संवेदना शून्य होने के साथ सेलेक्टिव पॉलिटिक्स करने का आरोप भी लगाया.
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को शर्म आनी चाहिए, आपकी माता सोनिया गांधी को और प्रियंका गांधी वाड्रा को भी शर्म आनी चाहिए. दिल्ली, तमिलनाडु, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात समेत 17 राज्यों तक भड़के दंगों में हजारों सिखों की हत्या हुई और लाखों लोगों की संपत्ति लूटी गई. अकेले दिल्ली में हजारों लोग घायल हुए थे, लेकिन उनकी एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई. हजारों लोग मारे गए, लेकिन उनके नाम तक दर्ज नहीं किए गए.
दिल्ली के तमाम मार्केट एसोसिएशन ने कांग्रेस पार्टी को पत्र लिखकर त्योहारी सीजन में ऐसे प्रदर्शन टालने की अपील की है. इससे खार खाई कांग्रेस पार्टी की नेता अलका लांबा ने कहा, 'बीजेपी से जुड़े लोग अपने व्यापारिक संगठनों का आगे कर हमारी रैली रोकना चाहते हैं. त्योहारों के दौरान मजदूर अपने घर चले जाते हैं, एक नवंबर को देशभर से लोगों को दिल्ली आने का आह्वान किया गया है. बड़ी संख्या में लोगों के आने से होटल, खानपान और बाजारों में कारोबार बढ़ेगा. लोग सदर बाजार, चांदनी चौक और दूसरे बाजारों में खरीदारी करने भी जाएंगे.'
लांबा ने कहा कारोबारियों को असली नुकसान तब हुआ था, जब जंतर-मंतर पर आंदोलन रोकने के लिए दिल्ली को छावनी में बदल दिया गया था. उस दिन इंटरनेट बंद होने से ऑनलाइन बिलिंग और कारोबार प्रभावित हुआ था, जिससे व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ाथा. कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी कहा रैली निर्धारित तारीख पर ही होगी.
1 अक्टूबर 1984 से लेकर अगले कुछ दिन दिल्ली में भारी फोर्स तैनात थी लेकिन वह मूकदर्शक बनी रही. भीड़ नारे लगा रही थी और राजधानी में चारों ओर मार-काट चल रही थी. उस दौर की तमाम रिपोर्ट्स और बयानों के मुताबिक तब तक एचकेएल भगत, ललित माकन, सज्जन कुमार और धरमदास शास्त्री जैसे कांग्रेस के कद्दावर नेता एक्टिव थे.

अदालत में चले मामलों से पता चलता है कि अपने-अपने इलाकों में कांग्रेस के कई नेताओं ने भीड़ को सिखों पर हमला करने के लिए उकसाया था. बीजेपी का दावा है कि कांग्रेस के नेताओं की करनी से अलगाववाद को हवा मिली.
हालांकि चरणबद्ध तरीके से 1 और 2 नवंबर को दिल्ली में सेना तैनात कर दी गई थी फिर भी हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही थी.
19 नवंबर 1984 राजीव गांधी ने हिंसा पर पहली बार कोई टिप्पणी की और उनकी वह टिप्पणी भी विवादास्पद साबित हुई. उन्होंने कहा था- 'जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है.' उनके बयान का गांधी फैमिली समर्थक नेताओं ने दबी जुबान से समर्थन किया था. उसी दौरान सिखों के लिए एक दुखद बात ये भी हुई थी कि नए प्रधानमंत्री ने अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने और मुआवजे को न्याय देने की बात तक नहीं की थी.

कांग्रेस पार्टी की ओर से किसी बड़े नेता को 1984 के दंगों को लेकर माफी मांगने में 30 साल लग गए.
11 अगस्त 2005 को, सिख विरोधी दंगों के 30 साल बाद, मनमोहन सिंह ने कहा, मुझे सिख समुदाय से माफी मांगने में कोई संकोच नहीं है. मैं न केवल सिख समुदाय से, बल्कि पूरे भारतीय राष्ट्र से माफी मांगता हूं. उस दौरान जो कुछ हुआ वह राष्ट्रीय भावना के खिलाफ था और इसलिए सरकार और राष्ट्र की ओर से मेरा सर शर्म से झुक जाता है. सभी को चाहिए कि इसके लिए आत्मावलोकन करें और देखें कि 1984 जैसे दंगे देश में कभी न हों.'