)
Poland Refugees In India: भारत ने यहूदी, इजरायल, बांग्लादेश, ईरान, म्यांमार और अफगानिस्तान जैसे संकट से जूझ रहे अलग-अलग देशों के लोगों को मानवीय और राजनीतिक आधार पर शरण दी है. इसी में एक नाम पोलैंड का भी आता है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान साल 1942 में भारत ने पोलैंड के नागरिकों खासकर महिलाओं और अनाथ बच्चों को शरण दी थी.
महाराष्ट्र के कोल्हापुर के पास वलीवाडे कैंप में भी साल 1943 के दौरान तकरीबन 5,000 पोलिश शरणार्थियों को शरण दी गई थी. अब सालों बाद इसकी याद में पूर्ण शरणार्थियों के सहयोग से यहां एक म्यूजियम बनने जा रहा है.
दानुता बोरकोव्स्का भी युद्धग्रसित पोलैंड से भारत पहुंची थीं. वह हर रात एक माला जपती थीं, जो जंग के चलते उनके उजड़ते बचपन के दौरान भी उनके साथ थी. साल 2016 में उनकी मौत के बाद दानुता की बेटी टेरेसा सुल्मा ने उसे अगले 10 सालों तक अपने पास संभालकर रखा. अब, वह माला कोल्हापुर के पास वलीवाडे वापस पहुंच गई है. ये वही जगह है, जहां 3 साल की दानुता को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अपने परिवार से बिछड़ने के बाद पनाह और शांति मिली थी. सुल्मा ने हाल ही में इसे 'मेमोरियल ऑफ पीस एंड ह्यूमैनिटी' को डोनेट कर दिया है. इसके साथ ही उन्होंने अपनी मां की चौथी कक्षा की रिपोर्ट कार्ड की एक फोटो और हाथ से बुना कपड़ा भी दान किया है. सुलमा ने कहा,' माला मुझे सबसे प्यारी है. मेरी मां हर रात इससे प्रार्थना करती थीं और इससे उन्हें हिम्मत मिलती थी. मुझे अब तसल्ली है कि उनका सामान एक खास और सुरक्षित जगह पर रहेगा. ऐसा लगता है जैसे मेरी मां का सफर पूरा हो गया है.'
साल 1942 और 1948 के बीच वलीवाडे लगभग 5,000 पोलिश शरणार्थियों के लिए घर बनाया गया था. ये वही जगह थी, जहां सभी शरणार्थी युद्ध और देश से निकाले जाने के चलते यहां आए थे. सितंबर साल 1939 में, जब हिटलर ने पश्चिम से पोलैंड पर और सोवियत संघ ने पूर्व से हमला किया, तो हजारों पोलिश महिलाओं, बच्चों और बुजुर्ग पुरुषों को साइबेरिया भेज दिया गया.

भारत पहुंचने से पहले उनमें से कई लोगों ने ईरान से होते हुए 6,000 किलोमीटर का बेहद मुश्किल सफर तय किया. दानुता भी उन्हीं में से एक थीं. उनका परिवार युगांडा पहुंचा था, लेकिन वह अकेले वलीवाडे आईं. साल 2016 में अपनी मौत तक वह वलीवाडे को अपने दिल के करीब मानती रहीं. पोलैंड लौटने से पहले इंग्लैंड में टीचर के तौर पर रिटायर सुल्मा हाल ही में पोलिश सांसद किंगा गाजेव्स्का के नेतृत्व वाले एक प्रतिनिधिमंडल के साथ वलीवाडे गईं. यह उनके लिए उस जगह पर घूमने का मौका था, जहां उनकी मां का बचपन बीता था.
वलीवाडे ने न केवल पोलैंड से आए लोगों को रहने की जगह दी, बल्कि वहां रहने वाले पोलिश लोगों ने स्कूल, बगीचे, क्लिनिक, पोस्ट ऑफिस, बेकरी, चर्च और कोऑपरेटिव स्टोर बनाकर यहां एक बस्ती बसाई थी. वीकेंड में शरणार्थी कोल्हापुर जाकर फिल्में भी देखते थे.

80 साल से ज्यादा के बूढ़े कर्नल विजयसिंह गायकवाड़ तब 6-7 साल के थे, जब उन्होंने वलीवाडे में कैंप में कुछ लोगों को देखा था. साल1984 में 10 पूर्व शरणार्थी कोल्हापुर लौटे. तब गायकवाड़ और लोकल एक्टिविस्ट अजीत जैन ने उन्हें उस कब्रिस्तान तक जाने में मदद की, जहां वलीवाडे में रहने के दौरान मारे गए 76 शरणार्थियों को दफनाया गया था. उस यात्रा के बाद महावीर गार्डन में एक यादगार स्तंभ बनाया गया. जैसे-जैसे और लोग वापस आने लगे, एक बड़ा विचार सामने आया कि उसी पुराने कैंप की जगह पर एक म्यूजियम बनाया जाए. साल 2019 में पोलैंड के लगभग 25 पूर्व शरणार्थी वलीवाडे आए और यहां एक मेमोरियल पिलर की नींव रखी. बाद में पूर्व शरणार्थियों को कैंप से फिर से जोड़ने में मदद करने के लिए पोलिश सरकार ने गायकवाड़ को एक मेडल देकर सम्मानित किया.
नया म्यूजियम उस जगह बन रहा है, जहां कभी कैंप की बैरक हुआ करती थी. यहां मजदूरों को घरों के बीच एक खाली प्लॉट पर खुदाई के दौरान पत्थर और ईंट से बनी एक इमारत के अवशेष मिले, जिसकी छत पर टाइलें लगी थीं. बची हुई दूसरी बैरक, जिसमें कभी एक स्कूल चलता था उसे भी मेमोरियल के हिस्से के तौर पर विकसित किया जा रहा है. इसके लिए कलाकृतियों का पहला सेट आ चुका है. गजेव्स्का ने उन्हें सुरक्षित रखने के लिए पूर्व राज्यसभा सांसद संभाजीराजे छत्रपति के परिवार को सौंप दिया. इनमें एक युवा शरणार्थी की डायरी भी शामिल है, जिसमें शाहजीराजे छत्रपति के राज्याभिषेक और भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कैंप में हुए जश्न का जिक्र है. इसमें इस मौके पर स्थानीय मेहमानों के आने पर पोलिश निवासियों के उत्साह का भी जिक्र है.

इस कलेक्शन में लोविच की पोलिश पारंपरिक पोशाक, पत्र और सर्टिफिकेट, तस्वीरें और एल्बम, कैनवस बैकपैक, मिलिट्री-स्टाइल जैकेट और नक्शे भी शामिल हैं. पूर्व शरणार्थियों के परिवार पीढ़ियों से सहेजकर रखे गए ट्रंक, एल्बम और अलमारियां खोल रहे हैं. ऐसे में उम्मीद है कि अभी और भी चीजें आ सकती हैं.
पोलैंड-इंडिया पार्लियामेंट्री ग्रुप की चेयरपर्सन गजेव्स्का ने कहा कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए तब बेहद पर्सनल हो गया, जब उन्होंने बड़े पैमाने पर लोगों को दूसरी जगहों पर डिपोर्टेशन के दौरान फंसे बच्चों की तस्वीरें देखीं. उन्होंने कहा,' जब मैंने उन बच्चों की तस्वीरें देखीं, जिन्हें बड़े पैमाने पर पूर्व USSR के दूर-दराज इलाकों में भेजा जा रहा था, तो मुझे अपने बच्चे याद आ गए. मैंने उन्हें वालिवडे कैंप की तस्वीरें दिखाईं और वे मुझसे और जानकारी के लिए पूछते रहे. इससे सब कुछ साफ हो जाता है.'

उन्होंने आगे कहा,' कोल्हापुर के महाराजा ने 5,000 शरणार्थियों को पनाह, सुरक्षा और सम्मान दिया. पोलिश शरणार्थियों की मदद करने वाला भारत पहला देश था. इसलिए, हमने शाही परिवार और राज्य सरकार के साथ मिलकर यहां एक स्मारक बनाने का फैसला किया.' सुल्मा के दौरे के बारे में गजेव्स्का ने लिखा,' हमने साथ मिलकर वालिवडे की यात्रा की. यह असाधारण और दिल को छू लेने वाले पलों में से एक था.'
UNESCO की लिस्ट में शामिल कंजर्वेशन आर्किटेक्ट शिखा जैन ने पोलैंड से आए डेलीगेशन के सामने म्यूजियम का प्लान पेश किया. उन्होंने बताया,' यह म्यूजियम बिल्कुल रिफ्यूजी बैरकों जैसा होगा और उसी जगह पर बनेगा जहां वे पहले थीं. इसमें चार हिस्से होंगे रिसेप्शन एरिया, एक एग्जिबिशन स्पेस, एक इमर्सिव ऑडियो-विज़ुअल गैलरी और बची हुई तस्वीरों के साथ पारंपरिक भारतीय जीवनशैली का रीक्रिएशन. इंटरैक्टिव स्क्रीन विजिटर्स को अलग-अलग शरणार्थियों के बारे में जानकारी देंगी. आखिर में उन सभी 5,000 लोगों से जुड़ी तस्वीरें, रिकॉर्डिंग और विज़ुअल मटीरियल दिखाए जाएंगे जो कैंप में रहते थे.'

संभाजीराजे ने कहा कि जब तक महाराष्ट्र सरकार ने इसके लिए 6 करोड़ रुपये मंजूर नहीं किए, तब तक प्रोजेक्ट का काम रुका हुआ था. उम्मीद है कि पोलैंड के प्रधानमंत्री अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में कोल्हापुर का दौरा करेंगे.संभाजीराजे ने कहा,' इस प्रोजेक्ट का मकसद म्यूजियम से कहीं अधकि है. हम सरकार से इसे UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज टैग के लिए नॉमिनेट करने का आग्रह करेंगे.'
1939 में सोवियत संघ (USSR) और जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया था. इस दौरान लाखों पोलिश लोगों को युद्ध-बंदी बना लिया गया और साइबेरिया के कैंपों में भेज दिया गया था. साल1941 में सिकोर्स्की-मेस्की समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके तहत पोलिश कैदियों को माफी दी गई. साल 1942 में विस्थापित शरणार्थियों को पहले ब्रिटिश-कब्जे वाले ईरान, फिर कराची और उसके बाद बांदा ले जाया गया. पहला जत्था गुजरात के बालाचाडी और दूसरा महाराष्ट्र के वलीवाडे भेजा गया. जामनगर में साल 1942 में महाराजा दिग्विजयसिंहजी ने बालाचाडी कैंप की स्थापना की थी. यहां साल 1945 तक 1,000 पोलिश बच्चे रहे.