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13 अक्टूबर 1972. ये किसी आम दिन जैसा ही था. उरुग्वे की रग्बी टीम को लेकर चार्टर्ड ट्विन-इंजन वाले प्लेन ने उड़ान भरी. लेकिन किसी को नहीं पता था कि उनके साथ जो होने वाला है, वह इतिहास में इंसानी जज्बे की एक मिसाल के तौर पर दर्ज हो जाएगा.
रग्बी टीम का यह चार्टर्ड प्लेन एंडीज के पहाड़ों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. जब प्लेन में गड़बड़ी के शुरुआती संकेत मिले, तो कोई भी यात्री घबराया नहीं. किसी को ज्यादा टेंशन नहीं हुई. प्लेन में 45 लोग सवार थे और ज्यादातर युवा (20s की शुरुआत में) थे. सवार लोगों में से 19 टीम के सदस्य थे, जबकि बाकी ज्यादातर यात्री टीम के सदस्यों के दोस्त और परिवार वाले थे.
ये लोग चिली में एक एग्जीबिशन मैच खेलने जा रहे थे. तभी अचानक उनका चार्टर्ड प्लेन एंडीज के ऊपर टर्बुलेंस (हवा के तेज झोंकों) की चपेट में आ गया. प्लेन कई सौ फीट नीचे गिरा, तो वे खुशी से चिल्लाने लगे. फिर प्लेन हवा के एक और झोंके (एयर पॉकेट) की चपेट में आया, जिसके बाद और नीचे गिर गया. अब अचानक जैसे ही वह बादलों के घेरे से नीचे आया. यात्रियों को सिर्फ 10 या 20 फीट की दूरी पर पहाड़ का एक हिस्सा दिखाई दिया.
उनमें से एक पांचिटो अबाल् ने अपने दोस्त नैंडो पर्राडो से पूछा, 'क्या इतनी पास से उड़ना नॉर्मल है?' पर्राडो ने जवाब दिया, 'मुझे नहीं लगता.' फिर उनके आस-पास सब कुछ अंधेरे में डूब गया.
जब उसे होश आया, तो लगभग 48 घंटे बीत चुके थे. वह शुक्रवार 13 अक्टूबर 1972 का दिन था और उरुग्वे एयरफोर्स का फेयरचाइल्ड F-227 विमान एंडीज की पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित एक बर्फीली घाटी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. विमान का पिछला हिस्सा (टेल) गायब था. वह मेन हिस्से से अलग हो गया था क्योंकि दाहिना विंग पहाड़ से टकराकर टूट गया था. हादसे के एक घंटे के भीतर ही चिली की एयर सर्च एंड रेस्क्यू सर्विस ने बचे हुए लोगों की तलाश के लिए विमान भेज दिए थे, लेकिन उन्हें ढूंढने में 72 दिन लग गए.

प्लेन के क्रैश होने से पहले ही उसमें सवार सात लोग प्लेन के मुख्य हिस्से से बाहर खिंचकर गिर गए थे. चार और लोग, जिनमें पायलट और पराडो की मां भी शामिल थीं, टकरान के कारण मारे गए. जब तक पराडो को होश आया, तब तक पांच और लोगों की मौत हो चुकी थी, जिनमें को-पायलट और पराडो का दोस्त अबाल् भी शामिल थे.
अब एंडीज की जानलेवा ठंड में 29 लोग बचे थे, जिनके पास बाहरी दुनिया से संपर्क करने का कोई जरिया नहीं था. उनके प्लेन का सफेद फ्यूजलेज बर्फ में लगभग गायब हो चुका था, जिससे ऊपर से गुजरने वाले किसी भी बचाव दल को उसका पता नहीं चल पाता था.
बाद में पता चला कि जो लोग बच गए थे, उन्होंने कुछ हद तक अपने मरे हुए साथियों का मांस खाकर ही अपनी जान बचाई थी. शुरुआत में तो दुनिया भर में इसे लेकर नफरत का भाव था, लेकिन जल्द ही लोगों ने उस हिम्मत और सूझबूझ की तारीफ की, जिसकी बदौलत वे नामुमकिन लगने वाली मुश्किलों से पार पा सके. इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना को 'एंडीज का चमत्कार' कहा गया.
पहाड़ों पर जिंदा बचे इन लोगों को ग्यारहवें दिन एक जुगाड़ू रेडियो से पता चला कि तलाशी अभियान रोक दिया गया है. उनके पास खाने का सामान जल्दी ही खत्म हो गया. बचे हुए लोगों में से एक रॉबर्टो कैनेसा ने कहा था, 'कुछ ही दिनों में हमें ऐसा महसूस होने लगा था कि जिंदा रहने के लिए हमारा शरीर खुद को ही खा रहा है. हमें जवाब पता था, लेकिन उसके बारे में सोचना भी बहुत भयानक था.' आखिरकार, प्रार्थना और दिल दहला देने वाली सोच-विचार के बाद, एक शख्स को छोड़कर बाकी सभी इस बात पर सहमत हो गए कि इसका समाधान मरे हुए लोगों का मांस खाना ही है. यह लगभग तय था कि अगर हम इंसानी मांस खाने नहीं खाते तो बाकी लोग भी मर जाते.'
सत्रहवें दिन, बर्फ का एक बड़ा तूफान उस प्लेन के हिस्से से टकराया जहां बचे हुए लोगों ने शरण ली हुई थी. इसमें आठ और लोगों की मौत हो गई और बाकी लोग लगभग जिंदा ही दब गए थे. 15 नवंबर को चार लोगों का एक दल मदद की तलाश में पास की एक घाटी की ओर निकला. हालांकि उन्हें वापस लौटना पड़ा, लेकिन उन्हें दुर्घटनाग्रस्त प्लेन का पिछला हिस्सा (टेल) मिल गया, जिसमें थोड़ा सा खाना, दवाइयां और कॉमिक बुक्स थीं.
उनका खुद को बचाने का पहला अभियान फेल हो गया था. अब उनको लगा कि मदद पाने के लिए पश्चिम की तरफ जो पहाड़ है, उस पर चढ़ना चाहिए. बचे हुए लोगों ने प्लेन के इंसुलेशन से एक स्लीपिंग बैग बनाया. यह बैग कैनेसा, नैंडो पैराडो और एंटोनियो विजिंटिन को बचाने के लिए था, जिन्हें दूसरे अभियान के लिए चुना गया था. तीन दिन की बेहद मुश्किल चढ़ाई के बाद, पैराडो और कैनेसा चोटी पर पहुंचे. वहां उन्हें पता चला कि वे पहाड़ों में अपनी उम्मीद से कहीं ज्यादा अंदर आ गए थे. चिली के क्यूरिको शहर के पास होने का उनका अंदाजा उसी नेविगेशन की गलती पर आधारित था, जिसकी वजह से प्लेन क्रैश हुआ था.

अब यह पक्का हो चुका था कि वह मौत की तरफ बढ़ रहे हैं. लेकिन फिर भी पैराडो और कैनेसा 9 और दिनों तक आगे बढ़ते रहे. आखिरकार, एक नदी के सहारे वे नीचे घाटी में पहुंचे, जहां उन्हें मदद मिली. एक स्थानीय खच्चर चालक ने उनको बचाया. इसके बाद चिली की घुड़सवार पुलिस और पत्रकारों का एक दल वहां पहुंचा. बचाव कार्य में लगे हेलीकॉप्टर उतरे. हालांकि उनके क्रू को पहाड़ पर चढ़ने और उतरने की पैराडो की कहानी पर साफ तौर पर शक था, फिर भी वे प्लेन की तलाश में उसके साथ निकल पड़े.
तेज हवाओं के झोंकों ने हेलिकॉप्टरों को बुरी तरह हिला दिया. पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश में उनकी आवाजें गूंज रही थीं. जैसे ही वे चोटी के ऊपर पहुंचे. तेज हवाओं ने उन्हें पीछे धकेल दिया, जिससे उन्हें पहाड़ के चारों ओर घूमकर दक्षिण की तरफ से आना पड़ा. इससे पैराडो को लगा कि वे रास्ता भटक गए हैं. उन्हें डर सताने लगा कि वे अपने साथियों को नहीं ढूंढ पाएंगे. तभी, अचानक उन्हें बर्फ पर कुछ काले धब्बे नजर दिए. दोनों हेलिकॉप्टर 22 दिसंबर को नीचे उतरे और छह बचे हुए लोगों को साथ ले लिया. साथ ही, उन्होंने एक रेस्क्यू टीम को वहां छोड़ा ताकि वे बाकी लोगों की रात भर देखभाल कर सकें. अगली सुबह यानी 23 तारीख को बाकी बचे हुए लोगों का भी रेस्क्यू कर लिया गया.
चिली के सैन फर्नांडो के एक अस्पताल में पैराडो के गंदे कपड़े उतारे गए और उन्हें गर्म पानी से नहलाया गया. जब उन्हें तौलिए से पोंछा जा रहा था, तो ढाई महीने पहले प्लेन में सवार हुए उस खिलाड़ी ने बस अपनी एक परछाई देखी. शरीर में सिर्फ हड्डी और चमड़ी ही नजर आ रही थी. लेकिन, हर सांस के साथ वे यही शब्द बार-बार कह रहे थे- 'मैं जिंदा हूं. मैं जिंदा हूं. मैं जिंदा हूं.'