लोकतंत्र में खूबसूरत बात यही है कि जनता असली किंग है. उसी के हाथ में हर पार्टी, उम्मीदवार के हार-जीत की डोर है. फिर चाहे कोई नेता किसी सुपरपावर मुल्क का 'प्यादा' हो या 'चेला', उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इसका जीता-जागता उदाहरण सर्बिया और ब्राजील चुनाव के नतीजों से मिलता है. सर्बिया में पिछले 12 साल से अलेक्जेंडर वुसिक राज कर रहे थे. लेकिन 2024 में हुए एक हादसे ने जनता का गुस्सा इतना ज्यादा भड़का दिया कि वह उनके शासन को खत्म करके ही माना. वुसिक को पुतिन का समर्थन हासिल था.
वहीं, दूसरी ओर ब्राजील में लगातार चौथी बार 80 साल के वामपंथी नेता लूला डा सिल्वा को जीत मिली है. उनके सामने थे दक्षिणपंथी नेता फ्लावियो बोल्सोनारो. वह और उनका परिवार डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाते हैं. ट्रंप ने खुलकर ब्राजील चुनाव में बोल्सोनारो का समर्थन किया था. लेकिन उनको करारी शिकस्त हासिल हुई. यानी एक तरह से देखा जाए तो ये नतीजे इन दोनों ही नेताओं के लिए भी एक 'झटका' ही है.
पहले बात करते हैं ब्राजील की. सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के उम्मीदवार और मौजूदा 'महामहिम' लूला डा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर (रनऑफ) में जीत हासिल की है. 99.89 प्रतिशत वोटों की गिनती पूरी होने पर, लूला को कुल वैध वोटों का 51.79 प्रतिशत हिस्सा मिला. वहीं, लिबरल पार्टी से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे, फ्लेवियो बोल्सोनारो को 48.21 प्रतिशत वोट मिले. पहले दौर में लूला पिछड़ गए थे, लेकिन इसके बाद उन्होंने शानदार वापसी की. लूला ने 2022 के चुनाव में फ्लावियो के पिता और ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो को भी हराया था. उस चुनाव में लूला को दूसरे चरण में 50.90 फीसदी वोट मिले थे, जबकि जायर बोल्सोनारो को 49.10 फीसदी वोट मिले थे.
लूला 5 जनवरी 2027 को चार साल के कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे. यह चौथी बार होगा, जब वे ब्राजील के राष्ट्रपति बनेंगे. वे पहले दौर में पीछे रह गए थे. उनकी इस जीत के कारण लैटिन अमेरिका में उस दक्षिणपंथी झुकाव को रोक दिया है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन हासिल था. लूला 2027 से 2030 तक शासन करेंगे. उनके सामने एक ऐसी कांग्रेस (संसद) होगी, जिसमें बोल्सोनारो की लिबरल पार्टी के पास दशकों में सबसे ज्यादा सीटें हैं. अक्टूबर को हुए मतदान के पहले दौर में, बोल्सोनारो 47.03 प्रतिशत वैध वोटों के साथ आगे थे, जबकि लूला को 45.16 प्रतिशत वोट मिले थे. इस नतीजे के बाद, लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े देश में तीन सप्ताह तक जोरदार चुनाव प्रचार चला.
अब आते हैं सर्बिया पर. भले ही दक्षिण-पूर्वी यूरोप का यह देश भले ही चारों तरफ से जमीन से घिरा हुआ हो लेकिन यहां की जनता ने जो क्रांति दिखाई है, वह आने वाली पुश्तें भी याद करेंगी. 1 नवंबर 2024 को नोवी साद रेलवे स्टेशन पर एक दर्दनाक दुर्घटना हुई. स्टेशन पर कंक्रीट की छतरी गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद छात्रों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू किया. शुरुआत में यह सिर्फ यूनिवर्सिटीज तक ही सीमित था. लेकिन धीरे-धीरे सरकार के खिलाफ यह छोटी सी चिंगारी आंदोलन के ज्वालामुखी में तब्दील हो गई. प्रदर्शनकारियों ने कंस्ट्रक्शन वर्क में कथित लापरवाही, भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी को लेकर सवाल उठाए.
समय के साथ आंदोलन को छात्रों के अलावा समाज के अन्य वर्गों का भी समर्थन मिलने लगा. स्टूडेंट ग्रुप ने संसद की सभी 250 सीटों के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार की, जिसमें शिक्षाविदों, खिलाड़ियों और किसानों सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को शामिल किया गया. आंदोलन का मकसद भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने, अर्थव्यवस्था में सुधार और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने का था. सर्बियाई चुनावों के दौरान, पुतिन ने नियमित तौर पर पब्लिक टेलीग्राफ और दोस्ती भरे मैसेज भेजकर वुसिक का समर्थन किया. उन्होंने साफ तौर पर वुसिक की लीडरशिप और सहयोग करने की उनकी काबिलियत की तारीफ की.
राष्ट्रपति पद छोड़कर संसदीय चुनाव के जरिए सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे अलेक्जेंडर वुसिच ने अपनी हार स्वीकार कर ली.यह नतीजा सर्बिया की राजनीति में एक बड़ा बदलाव है, जहां 2012 से वुसिच और उनकी पार्टी एसएनएस का दबदबा रहा है. संसदीय चुनाव में हिस्सा लेने के लिए वुसिच ने 27 सितंबर को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था. छात्र समर्थित उम्मीदवारों को पूर्ण बहुमत मिला है.वुसिक ने कहा कि स्टूडेंट लिस्ट को करीब 135-140 सीटें मिल सकती हैं. जबकि उनकी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी (एसएनएस) को 105 सीटें. यानी इन चुनावों से यह तो साफ हो गया कि भले ही नेताओं के पीछे किसी भी 'बड़े आदमी' का हाथ हो, जीत और हार सिर्फ जनता ही तय करती है.