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जिस हीरे को बेकार समझ जूते में ठूंसा, आज 1200 करोड़ पहुंची उसकी कीमत; क्या था जैकब डायमंड को लेकर भारत सरकार और हैदराबाद के निजाम का विवाद?

Hyderabad Nizam Jacob Diamond: 'ऑपरेशन पोलो' के बाद हैदराबाद का भारत के साथ विलय हो गया था. हालांकि, इस विलय के बाद जैकब डायमंड को लेकर निजाम के वंशजों और भारत सरकार के बीच काफी लंबा विवाद चला. आज के समय में यह हीरा कहां है?

Written By Shruti Kaul
Published: Sep 05, 2026, 02:25 PM IST | Updated: Sep 05, 2026, 02:27 PM IST
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Hyderabad Nizam Property: हैदराबाद रियासत को भारतीय संघ में मिलाने के लिए 13 सितंबर से 18 सितंबर 1948 के बीच 'ऑपरेशन पोलो' चलाया गया था. साल 1947 में भारत की आजादी के समय हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने से  साफ मना करते हुए स्वतंत्र रहने का फैसला किया था, जिसके बाद सरदार वल्लभभाई पटेल के आदेश पर 13 सितंबर से 18 सितंबर 2026 तक यह मिलिट्री ऑपरेशन चला. 7 सितंबर 1948 को हैदराबाद की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया और निजाम का शासन समाप्त होने के साथ-साथ हैदराबाद आधिकारिक रूप से भारतीय का हिस्सा बन गया.    

एक समय पर दुनिया के सबसे अमीर शख्सियत हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली का जब भी जिक्र होता है, तो जैकब डायमंड का नाम सबसे आगे आता है. हैदराबाद के भारत में विलय के बाद उनके इस हीरे को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सुरक्षित तिजोरी में रख दिया गया. आज भी 184.75 कैरेट का यह हीरा वहीं रखा है. ये न सिर्फ आकार में केहिनूर से भी बड़ा है, बल्कि यह दुनिया में सबसे पॉलिश किए गए हीरों में से भी एक है. हीरे के निजाम तक पहुंचने की कहानी बहुत दिलचस्प है. जानते हैं कि यह हीरा सालों तक जूतों के अंदर ही पड़ा रहा था.

हैदराबाद के छठे निजाम तक पहुंचा हीरा 


जैकब हीरा साल 1884 में साउथ अफ्रीका की किंबर्ली माइंस में मिला था. इसका शुरुआती वजन 400 कैरेट से भी ज्यादा था. वहीं, साल 1887 में नीदरलैंड में इसे तराशने के बाद इसका वजन 184.75 कैरेट तक पहुंचा. इस दौरान शिमला में रहने वाले एक फेमस ब्रिटिश-भारतीय रत्न व्यापारी अलेक्जेंडर मैल्कम जैकब ने एम्सटर्डम के एक सिंडिकेट से इस हीरे को खरीदा. उन्हीं के नाम पर इसे जैकब डायमंड कहा जाने लगा. 

जैकब इस हीरे को बेचने के लिए हैदराबाद के छठे निजाम मीर महबूब अली खान के पास पहुंचे. इसकी डील 46 लाख रुपये में तय हुई और निजाम ने एडवांस में इसके लिए 23 लाख रुपये डिपॉजिट भी कर दिए.  

जूते के अंदर क्यों छिपाया हीरा? 


जब निजाम के पास यह हीरा पहुंचा तो, उन्हें लगा इसका आकार कांच के उस मॉडल से भी छोटा है, जिसे जैकब ने शुरुआत में दिखाया था. ऐसे में निजाम डील को तोड़ते हुए अपने पैसे वापस मांगने लगे. जैकब ने भी रकम लौटाने से मना कर दिया. 

मामले को लेकर कलकत्ता की एक कोर्ट में बड़ा मुकदमा भी चला. आखिर में कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए निजाम को ही हीरा पकड़ा दिया. कानूनी पचड़े में पड़ने और बदनामी के चलते निजाम महबूब अली खान इस हीरे को मनहूस मानने लगे और उन्होंने इसे चिढ़कर एक गंदे कपड़े में लपेटते हुए पुराने जूते के अंदर ठूंसकर रख दिया.  

हीरा बेचने पर भारत सरकार से विवाद 


छठे निजाम की साल 1911 में मौत के बाद उनके बेटे और हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान राजा बने. उन्होंने महल की सफाई के दौरान अपने पिता के पुराने जूतों के एक हिस्से में फंसे इस बड़े से हीरे को देखा. हीरे की कीमत और उसके ऐतिहासिक मूल्य से अनजान निजाम उस्मान इसे अपने टेबल में पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करने लगे.

 साल 1948 में हैदराबाद के भारत में विलय के बाद निजाम मीर उस्मान ने अपनी संपत्ति बचाने के लिए 1950 के दशक में निजाम ज्वेलरी ट्रस्ट बनाया. अन्य शाही आभूषणों के साथ जैकब हीरे को भी इस ट्रस्ट में सुरक्षित कर दिया गया. हालांकि, जब निजाम के वंशज इन आभूषणों को विदेशी खरीदारों को बेचने की कोशिश करने लगे, तो भारत सरकार ने इन्हें राष्ट्रीय धरोहर घोषित करते हुए आभूषणों को विदेश ले जाने पर बैन लगा दिया.      

अब कहां है हीरा? 


जैकब हीरे को लेकर तकरीबन 23 सालों तक कानूनी विवाद चला, जिसके बाद साल 1995 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भारत सरकार ने निजाम ट्रस्ट से पूरा ज्वेलरी कलेक्शन लगभग 200 करोड़ में खरीद लिया. 

आज के समय में जैकब हीरा मुंबई में RBI की सबसे सुरक्षित तिजोरी में रखा है. इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमत लगभग 800-1200 करोड़ के बराबर है.    

अमीरी के बावजूद कंजूस थे निजाम? 


बता दें कि हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान को साल 1937 में टाइम मैगजीन के कवर पर दुनिया का सबसे अमीर शख्स बताया गया था. उनके पास इतनी ज्यादा संपत्ति थी कि आज के अरबपति भी उनके आगे फीके लगेंगे. हालांकि, इतनी दौलत के बाद भी वह काफी कंजूस माने जाते थे. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के आखिरी साढ़े तीन दशकों में कभी भी अपने सिर की टोपी नहीं बदली. वे नई टोपी खरीदने के बावजूद बार-बार इसमें रफू करवाते रहते थे. 

टोपी का रंग फीका पड़ने और इसके पुरानी दिखने के बावजूद वह इसे बदलते नहीं थे. इसलिए लोगों ने उन्हें कंजूस कहना शुरू कर दिया था. हालांकि, निजाम को इस टोपी से बेहद लगाव था. ये उनकी किफायती जीवनशैली का प्रतीक था.  

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About the Author

ज़ी न्यूज में सब एडिटर. वनस्थली विद्यापीठ यूनिवर्सिटी, राजस्थान से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन. ये राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दो से जुड़े विषयों पर लिखती हैं. लिखने के अलावा श्रुति को नई जगहों पर घूमना, संगीत सुनना, फिल्में देखना और फूड एक्सप्लोर करने का बेहद शौक है. 
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