अब दुनिया में 'शिपबिल्डिंग' का हब बनेगा भारत! HSL और KSPL मिलाया हाथ, जानिए इस स्मार्ट मूव के पीछे क्या है मास्टरप्लान?
भारत ने अब 'शिपबिल्डिंग' का हब बनने के लिए कमर कस ली है. इसके लिए देश के पूर्वी तटीय सीमा पर बसा एक शहर चिह्नित किया गया है, जहां पर जहाज बनाने की सुविधाएं पहले से ही मौजूद हैं.
आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में जहाज़ बनाने की संभावना तलाशने के लिए हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) और काकीनाडा सीपोर्ट्स लिमिटेड (KSPL) ने शुक्रवार को एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए. HSL की ओर से सीएमडी रियर एडमिरल चंद्रशेखरन रघुराम, वीएसएम (रिटायर्ड) और KSPL की ओर से सीएमडी के.वी. राव ने इस पर दस्तखत किए. पहली नजर में ये दो कंपनियों के बीच का एक कागजी समझौता लग सकता है. लेकिन इसके पीछे एक सीधा सवाल है कि जहाज बनाने के लिए जगह कहां से आए. आइए, इसे एक-एक करके समझते हैं.
ये दोनों कंपनियां हैं कौन?
असल में, HSL विशाखापत्तनम का शिपयार्ड है और रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली मिनीरत्न (श्रेणी-I) कंपनी है. यहां जहाज बनते हैं, उनकी मरम्मत होती है और नौसेना की पनडुब्बियों की मरम्मत और आधुनिकीकरण का काम भी होता है. इसी महीने की 6 तारीख को यहां देश का पहला स्वदेशी फ्लीट सपोर्ट शिप सूर्य पानी में उतारा गया.
वहीं, KSPL काकीनाडा डीप वाटर पोर्ट चलाती है. मार्च 1999 से ये बंदरगाह आंध्र प्रदेश सरकार से मिले कंसेशन के तहत उसके पास है. यानी एक कंपनी जहाज बनाती है और दूसरी बंदरगाह चलाती है.
समझौते में आखिर है क्या?
ये समझौता दोनों कंपनियों को मिलकर संभावनाएं तलाशने का एक ढांचा देता है. इसके तहत देखा जाएगा कि काकीनाडा में KSPL का मौजूदा स्लिपवे और उससे जुड़ा ढांचा, जिसमें जेटी भी शामिल है, HSL के जहाज़ बनाने के काम आ सकता है या नहीं.
समझौते में ढांचे का आकलन करने और ज़रूरत के हिसाब से उसे बढ़ाने की बात है. साथ ही, वहां के लिए सही जहाज निर्माण प्रोजेक्ट पहचानने और दोनों कंपनियों के बीच साथ काम करने के सही तरीके तलाशने की बात भी है. यानी किन प्रोजेक्ट्स पर काम होगा और साझेदारी किस रूप में होगी, ये इसी प्रक्रिया से तय होना है.
स्लिपवे और जेटी क्या होते हैं?
स्लिपवे को आप एक ढलान वाला चबूतरा समझिए. जहाज का ढांचा इसी पर खड़ा किया जाता है और तैयार होने पर उसे फिसलाकर पानी में उतारा जाता है. जेटी पानी के किनारे बना वो प्लेटफॉर्म है, जहां उतरे हुए जहाज को बांधकर उसके अंदर का बाकी काम पूरा किया जाता है.
नया शिपयार्ड बनाने में क्या हैं दिक्कतें?
नया शिपयार्ड खड़ा करने के लिए समुद्र किनारे बड़ी जमीन और भारी-भरकम ढांचा चाहिए. जबकि, काकीनाडा में स्लिपवे और जेटी पहले से मौजूद हैं. HSL ने इस पहल को मौजूदा समुद्री ढांचे का फायदा उठाने की दिशा में एक रचनात्मक कदम बताया है.
वैसे HSL नए शिपयार्ड का रास्ता भी देख रहा है. नवंबर 2025 में उसने आंध्र प्रदेश मैरीटाइम बोर्ड के साथ राज्य में एक ग्रीनफील्ड शिपयार्ड की संभावना तलाशने का समझौता किया था. HSL के मुताबिक, प्रस्तावित शिपयार्ड से बड़े पैमाने पर जहाज निर्माण की क्षमता बढ़ेगी, जहाज़ बनाने की आधुनिक तकनीक को बढ़ावा मिलेगा और ऊंचे दर्जे के रोजगार बनेंगे. यानी एक तरफ लंबी अवधि की योजना है, तो दूसरी तरफ पहले से मौजूद ढांचे का इस्तेमाल.
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब?
HSL का कहना है कि इस पहल से उसकी काम करने की क्षमता बढ़ेगी और जहाज निर्माण व उससे जुड़ी समुद्री गतिविधियों में नए मौके बनेंगे. सूर्य की लॉन्चिंग के मौके पर आंध्र प्रदेश के सड़क एवं भवन मंत्री बी.सी. जनार्दन रेड्डी ने कहा था कि राज्य का समुद्री तट, बंदरगाह और औद्योगिक कॉरिडोर विकास, व्यापार और निवेश के लिए बड़ी गुंजाइश देते हैं. उनके मुताबिक, जहाज़ निर्माण मजबूत होने से इससे जुड़े उद्योगों को सहारा मिलेगा और एमएसएमई व हुनरमंद युवाओं के लिए रोजगार बनेगा.
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देश के लिहाज़ से ये क्यों अहम है?
सितंबर 2025 में केंद्रीय कैबिनेट ने जहाज निर्माण और समुद्री क्षेत्र के लिए 69,725 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी थी. इसमें 19,989 करोड़ रुपये की शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम भी शामिल है, जिसका लक्ष्य देश की जहाज बनाने की सालाना क्षमता को 45 लाख ग्रॉस टन तक ले जाना है. ये स्कीम शिपबिल्डिंग क्लस्टर, ढांचे को बेहतर बनाने और सहायक उद्योगों को मदद देती है.
सरकार के मुताबिक, इस पैकेज से करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश आ सकता है और करीब 30 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार बन सकते हैं. सरकार की रणनीति में नए शिपयार्ड बनाने के साथ-साथ पुराने शिपयार्ड को आधुनिक बनाने की बात भी है. काकीनाडा का समझौता भी पहले से मौजूद ढांचे के इस्तेमाल पर टिका है.