Indepth: डिमांड हाई, किराये में जाता है पाई-पाई, 45000 करोड़ की है दिल्ली की PG इकोनॉमी; समझें पूरा गणित
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में बिल्डिंग गिरने के बाद अब किरायेदारों के मन में एक सवाल घूम रहा है कि क्या जिस बिल्डिंग में वह रह रहे हैं, वह सुरक्षित है. हर साल लाखों छात्र बाहर से दिल्ली आते हैं. दिल्ली की इकोनॉमी में योगदान देते हैं. आखिर ये पीजी इकोनॉमी कितनी बड़ी है. चलिए समझते हैं.
Delhi PG Economy: हर साल लाखों स्टूडेंट्स और पेशवर पढ़ाई और काम की तलाश में देश के बाकी शहरों और विदेशों से भी दिल्ली का रुख करते हैं. चूंकि, उनका यहां घर नहीं होता इसलिए उनको किराये का घर खोजना पड़ता है या फिर पीजी में शेयरिंग में रहना पड़ता है.
अगर आप सत्य निकेतन, मुनिरका, कालू सराय, न्यू अशोक नगर और लक्ष्मी नगर की तरफ जाएंगे तो किसी भी शाम को आपको घर बनाने वाली मशीनें काम करती हुई मिल जाएंगी. 5-6 फ्लोर की संकरी इमारतें, नीचे रसोई, छोटे से कमरों में कई बिस्तर, हर फ्लोर पर वाई-फाई राउटर. मकान मालिकों ने अपने घरों को काफी वक्त पहले ही हॉस्टलों में तब्दील कर दिया था. लेकिन डिमांड बढ़ना कभी नहीं रुका. आज हम आपको दिल्ली की इसी पीजी इकोनॉमी के बारे में बताने जा रहे हैं.
दिल्ली की पीजी इकोनॉमी
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, स्टूडेंट्स शेयर्ड बेड के लिए हर महीने 8,000 से 20,000 रुपये तक देते हैं. अगर इसे लाखों किराएदारों के हिसाब से देखें, तो इसका दायरा साफ समझ आता है. प्रॉपर्टी मालिकों के लिए यह अब कोई छोटा-मोटा काम नहीं रह गया है. यह एक समानांतर इकोनॉमी है, जो चुपचाप शहर के कई बिजनेस से भी बड़ी हो गई है. नेशनल ट्रेड कॉन्फेडरेशन के अनुसार, दिल्ली की इकोनॉमी में किराए के मकानों में रहने वाले स्टूडेंट्स का योगदान सालाना 45,000 करोड़ का है.
क्या है आंकड़ा?
नेशनल ट्रेड कॉन्फेडरेशन के अनुमान के मुताबिक, दिल्ली में करीब 1.5-2 लाख पीजी हैं. इनमें 7-8 लाख स्टूडेंट्स रहते हैं. FMCG, खाना, स्टेशनरी इत्यादि में 5000-6000 करोड़ का योगदान है. जबकि 10000-12000 करोड़ इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में जाता है. अन्य खर्च जैसे कपड़े, सर्विसेज में 10-13 हजार करोड़ खर्च होते हैं.
एक इमारत गिरी, सब कुछ बदल गया
6 सितंबर को दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में 5 मंजिला इमारत गिर गई, जिसमें ब्वॉयज पीजी चल रहा था. इस हादसे में 7 लोगों की मौत हो गई. बिल्डिंग के मालिक को गिरफ्तार कर लिया गया है.
शहर में ऐसी ही इमारतों में रहने वाले छात्रों को यह हादसा अंदर तक झकझोर गया. कई छात्र अब अपने कमरों को अलग नजरिए से देखने लगे हैं. छत पर सीलन के निशान, हिलती हुई सीढ़ियां, और कमरे का वह पार्टीशन जो साफ तौर पर बिल्डिंग के मंजूर होने के बाद बनाया गया था. इस हफ्ते मीडिया से बातचीत में छात्रों ने दीवारों में दरारें, मॉनसून में पानी का रिसाव और लगातार बढ़ते किराए के बारे में बताया.
अब शहर के हर PG वॉट्सऐप ग्रुप में एक बेचैन करने वाला सवाल घूम रहा है- क्या यह बिल्डिंग सुरक्षित है?
मगर छात्रों के पास नहीं कोई विकल्प!
लेकिन एक पहलू ऐसा है, जिस पर कोई बात नहीं करता. दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों के पास पर्याप्त हॉस्टल सीटें नहीं हैं. हर साल हजारों स्टूडेंट्स बाहर से आते हैं और सिर्फ कुछ ही स्टूडेंट्स को कैंपस में कमरा मिल पाता है. कुछ हॉस्टल्स ऐसे होते हैं, जो मौजूद तो हैं लेकिन रिपेयरिंग की वजह से बंद हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) के नेताओं ने कहा था कि कॉलेज नई इमारतें तो बनाते रहते हैं, जिनमें लोन का पैसा लगा होता है. लेकिन मौजूदा हॉस्टल का इन्फ्रास्ट्रक्चर वैसे का वैसे ही रहता है.
इसलिए स्टूडेंट्स को बाहर पीजी खोजना पड़ता है. पीजी मालिक ये जानते हैं. जब सप्लाई कम हो और डिमांड बहुत ज्यादा तो मकान मालिक सेफ्टी के बारे में नहीं सोचते. वे लोकेशन के आधार पर मुकाबला करते हैं, और कभी-कभी तो वह भी नहीं.
अब किरायेदार क्या चाहते हैं?
दिल्ली में किराए का मामला अब सिर्फ कॉलेज के पास रहने तक सीमित नहीं है. रियल एस्टेट एडवाइजर दीपेश गर्ग ने एनडीटीवी से बातचीत में बताया कि मार्केट में बदलाव आ रहा है.
गर्ग ने कहा, 'दिल्ली का स्टूडेंट हाउसिंग मार्केट एक दिलचस्प मोड़ पर है. सिर्फ PG किराए पर हर साल अनुमानित 11,000-15,000 करोड़ खर्च होते हैं. इस मांग का पैमाना साफ दिखाता है कि स्टूडेंट हाउसिंग अब शहर के रेजिडेंशियल मार्केट का कोई छोटा-मोटा हिस्सा नहीं रह गया है.'
वे बताते हैं कि यह सिर्फ PG की समस्या नहीं है. यह पूरे शहर में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी के इस्तेमाल के तरीके में एक बड़ा बदलाव है.
बजट से आगे जहां और भी हैं...
उन्होंने NDTV को बताया, 'चुनौती सिर्फ PG का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे शहर में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी के इस्तेमाल में हो रहे बदलाव को दिखाता है. साउथ दिल्ली के जाने-माने इलाकों जैसे ग्रेटर कैलाश, डिफेंस कॉलोनी, पंचशील पार्क, हौज खास और वसंत विहार में किराए पर उनकी लोकेशन का फायदा मिलता है, क्योंकि ये इलाके अच्छी तरह जुड़े हुए हैं और यहां सोशल कनेक्टिविटी, कमर्शियल और एजुकेशन सेंटर्स जैसी सुविधाएं मौजूद हैं. स्टूडेंट्स और युवा प्रोफेशनल्स की बढ़ती मांग के साथ, ये हालात आगे भी बने रह सकते हैं.'
उन्होंने आगे कहा, 'आजकल किराएदार सिर्फ लोकेशन और बजट से आगे की चीजें भी देखते हैं. बिल्डिंग की क्वालिटी, हवा-पानी की सुविधा (वेंटिलेशन), सुरक्षा, सुख-सुविधाएं, रखरखाव और नियमों का पालन. ये सब हाउसिंग की पेशकश के अहम हिस्से बनते जा रहे हैं.'
पुरानी या बदली हुई प्रॉपर्टी वाले मकान मालिकों के लिए भी उनके पास एक संदेश है. गर्ग ने कहा, 'मकान मालिकों के लिए यह मजबूत बनावट और कानूनी नियमों के मुताबिक प्रॉपर्टी में निवेश करने का मौका है, जिससे किराएदारों का भरोसा बढ़ता है और ज्यादा किराया मिल सकता है. लंबे समय में, दिल्ली के रेंटल मार्केट को ज्यादा व्यवस्थित हाउसिंग की ओर बढ़ने की जरूरत है, जहां सुरक्षा और क्वालिटी शुरू से ही जरूरी हिस्सा हों, न कि बाद में जोड़ी जाएं.'
कई दशकों से हो रही PG को रेगुलेट करने की कोशिशें
CNBC की रिपोर्ट के मुताबिक, PG अकोमोडेशन को रेगुलेट करने की कोशिश कोई नई बात नहीं है. 1993 में, केंद्र सरकार ने 'पेइंग गेस्ट हाउसिंग स्कीम' शुरू की थी. इसका मकसद घरेलू और विदेशी पर्यटकों को रिहायशी घरों में किफायती और साफ-सुथरी रहने की जगह उपलब्ध कराना था.
इसकी एक मुख्य शर्त यह थी कि मकान मालिक को उसी घर में रहना होगा जहां PG की सुविधा दी जा रही है.
बाद में इस स्कीम की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार को सौंप दी गई. साल 2000 में, शीला दीक्षित की अगुआई वाली दिल्ली सरकार ने अपनी 'पेइंग गेस्ट अकोमोडेशन स्कीम' को मंजूरी दी.
इस स्कीम के तहत, मकान मालिक दिल्ली टूरिज्म डिपार्टमेंट के पास रजिस्ट्रेशन करा सकते थे. घर के आधे से ज्यादा कमरों का इस्तेमाल PG अकोमोडेशन के लिए नहीं किया जा सकता था. साथ ही, कमरों की संख्या चार और बेड की संख्या अधिकतम आठ तक सीमित थी. हालांकि, तब से PG बिजनेस का स्वरूप और दायरा काफी बदल गया है.
दिल्ली में फिलहाल पीजी के लिए क्या नियम हैं?
फिलहाल दिल्ली में ऐसा कोई एक खास कानून नहीं है, जिसके तहत हर PG का रजिस्ट्रेशन करवाना, उसकी नियमित जांच और निगरानी किसी एक तय रेगुलेटरी अथॉरिटी से अनिवार्य रूप से की जाए.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि PG पूरी तरह से कानून के दायरे से बाहर काम करते हैं.
इमारत की सुरक्षा, जमीन के इस्तेमाल, आग से सुरक्षा और दूसरे स्थानीय नियमों जैसे मुद्दों के आधार पर अलग-अलग नियम लागू हो सकते हैं. मुख्य मुद्दा PG बिजनेस को खास तौर पर नियंत्रित करने वाले एक एकीकृत रेगुलेटरी सिस्टम का न होना है, जहां ऑपरेटर एक ही फ्रेमवर्क के तहत रजिस्टर्ड हों और उनकी जिम्मेदारियां साफ तौर पर तय हों.
नई व्यवस्था के तहत क्या प्रस्ताव है?
सत्य निकेतन हादसे के बाद अब दिल्ली सरकार जागी है. एक्शन में भी नजर आ रही है. पहली बार पीजी प्रॉपर्टी को रेग्युलेट करने के लिए प्लान का खाका खींचा जा रहा है. प्रस्तावित नियमों के तहत, हर पीजी मालिक को ऑपरेटिंग लाइसेंस लेना होगा. इसके अलावा पीजी खोलने से पहले पुलिस और म्युनिसिपल वेरिफिकेशन करानी पड़ेगी.
दिल्ली नगर निगम से भी उम्मीद है कि वह समय-समय पर बिल्डिंगों की मजबूती की जांच करता और सेफ्टी सर्टिफिकेट देता रहेगा. यानी सर्टिफिकेट नहीं तो पीजी नहीं चला पाएंगे. हालांकि, इसमें फ्लोर एरिया के नियमों में राहत देने को लेकर बातचीत हुई है. ताकि हॉस्टल को ज्यादा क्षमता के साथ कानूनी तौर पर फिर से बनाया जा सके, बजाय इसके कि मालिक उसी गैर-कानूनी जगह में ज्यादा बेड ठूंस दें.
क्या सरकार तय करेगी किराये की कीमत?
प्रस्तावित 'पेइंग गेस्ट अकोमोडेशन रेगुलेशन एंड सेफ्टी बिल, 2026' का मकसद इस सेक्टर में बेहतर नियम-कानून लाना है. इसमें PG अकोमोडेशन के लिए अलग-अलग किराया स्लैब (रेंट बैंड) का प्रस्ताव भी शामिल है. अगर इसे लागू किया जाता है, तो सरकार को एक ऐसा सिस्टम मिल सकता है जिससे अलग-अलग तरह के PG अकोमोडेशन के लिए किराए की सीमा तय की जा सके. यह ऐसे मार्केट में अहम हो सकता है जहां किराए की कीमतें तय करने में किसी खास रेगुलेटरी लिमिट के बजाय डिमांड (मांग) की बड़ी भूमिका होती है.
हालांकि, किराए को रेगुलेट करने के लिए संतुलन बनाना भी जरूरी होगा. दिल्ली में प्रॉपर्टी की कीमतें और किराए ज्यादा हैं, जबकि PG चलाने वालों को मेंटेनेंस, बिजली, पानी, खाना, हाउसकीपिंग और दूसरी सुविधाओं पर खर्च करना पड़ता है. इसलिए, पॉलिसी बनाने वालों के सामने चुनौती यह होगी कि वे ऐसे नियम न बनाएं जिनसे सही PG चलाने वाले मार्केट से बाहर हो जाएं, बल्कि यह पक्का करें कि स्टूडेंट्स ज्यादा किराए और असुरक्षित अकोमोडेशन से बचे रहें.
अब सुविधाएं नहीं, सुरक्षा पर नजर
संत नगर में न्यू पीजी फॉर गर्ल्स में रहने वाली स्नेहा मिश्रा ने कहा, 'सत्य निकेतन के हादसे के बाद मेरा उस जगह को देखने का नजरिया बदल गया है. मैं झारखंड के देवघर से आई हूं और इस जगह को अपना घर मानती हूं.' स्नेहा ने आगे कहा, 'जब मैं देवघर से दिल्ली आई तो पीजी मेरा दूसरा घर बन गया. मैं यहां पढ़ाई करती हूं, खाना खाती हूं और सोती हूं. लेकिन इस पर कभी ध्यान नहीं गया कि क्या यह जगह सेफ है या नहीं. लेकिन अब यह सवाल सोते हुए भी पीछा करता है.'
नोएडा में पीजी में रहने वाली शिल्पाश्री मोंडल का कहना है कि बजट के कारण उनके पास च्वॉइट का दायरा कम हो जाता है. उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि मेरी जैसी वर्किंग महिलाओं के पास सच में यह च्वॉइस होती है कि वह अपनी पसंद की जगह पर रह पाएं. यह बजट से ही तय होता है, खासकर दिल्ली जैसे शहर में, जहां किफायती और सुरक्षित जगह मिलना मुश्किल है.'
उन्होंने आगे कहा, 'मैं सोचने लगी कि अगर ऐसा कुछ मेरे पीजी में हो गया तो? मैंने किस तरह खुद को समझाया कि ऐसा नहीं होगा. लेकिन कुछ ऐसी चीजें हैं, जो मुझे परेशान करती हैं, जैसे वाटर सप्लाई, साफ-सफाई और दीवारों में सीलन की प्रॉब्लम.'
2047 के मास्टरप्लान में भी स्थिति साफ नहीं!
यह एक शुरुआत है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि दिल्ली के 2047 के मास्टर प्लान में PG के नियमों को साफ तौर पर नहीं बताया गया. कुछ कॉलोनियों में इन पर रोक तो लगा दी गई, लेकिन इनके लिए कोई सही ढांचा नहीं बनाया गया. कागज पर बने नियमों के बावजूद, असुरक्षित इमारतों में ऐसे किराएदार रहने को मजबूर हैं जिनके पास रहने के लिए कोई और जगह नहीं है.
फिलहाल, हजारों छात्र हर रात उन्हीं तंग सीढ़ियों से ऊपर-नीचे जा रहे हैं, इस उम्मीद में कि इमारत सुरक्षित रहेगी. दिल्ली की PG इकोनॉमी कहीं जाने वाली नहीं है. यह बहुत बड़ी, बहुत जरूरी और बहुत मुनाफे वाली है.