जनता का बदला मिजाज, डेमोक्रेट्स का 'डबल' राज, व्यापार से लेकर वॉर तक ट्रंप के लिए कैसे बढ़ेंगी मुश्किलें?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्र्ंप के लिए बुधवार का दिन किसी सदमे से कम नहीं रहा. मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन सीनेट और हाउस दोनों में ही बुरी तरह हार गई है. अब ट्रंप के लिए क्या बदलेगा? चलिए समझते हैं.
अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन में राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में करारी हार का सामना करना पड़ा. वहीं, इन दोनों सदनों पर अब विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी का कब्जा हो गया है.
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कुल 435 सीटें हैं और सभी सीटों पर चुनाव हुए. विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने 221 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया है. वहीं, सीनेट में डेमोक्रेट्स ने 53 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया है. सीनेट में बहुमत के लिए 51 सीटों की जरूरत होती है.
ट्रंप के कार्यकाल को अभी आखिरी दो साल और बाकी हैं. ऐसे में क्या इस चुनावी हार से उनकी शक्तियों पर असर पड़ेगा, क्या उनका रसूख कम हो जाएगा? चलिए समझते हैं.
ट्रंप पहले भी ऐसी स्थिति का सामना कर चुके हैं. 2018 के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा पर कब्जा कर लिया था, जिससे उनके पास रिपब्लिकन सीनेट और एक विरोधी निचली सदन रह गई थी. इसके बाद के दौर में बॉर्डर वॉल के लिए पैसा जुटाने को लेकर एक कड़वी लड़ाई और उनका पहला महाभियोग हुआ था. इस दौरान एक अहम बिजनेस डील और सुप्रीम कोर्ट में एक और नियुक्ति भी हुई थी.
यह इतिहास इस सुझाव की तुलना में स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में मददगार है कि कांग्रेस हारने से ट्रंप शक्तिहीन हो जाएंगे. उनके पास अभी भी काफी अधिकार होंगे. लेकिन डेमोक्रेट्स को यह तय करने की शक्ति हासिल कर सकते हैं कि कौन सी मांगें उनके पास पहुंचेंगी और कौन से अधिकारी उनकी समितियों के सामने पेश होंगे.
बॉर्डर वॉल बनी थी चेतावनी
यह टकराव जनवरी 2019 में डेमोक्रेट्स की ओर से औपचारिक रूप से प्रतिनिधि सभा का कंट्रोल संभालने से पहले ही शुरू हो गया था. मैक्सिकन सीमा पर ट्रंप की ओर से प्रस्तावित दीवार के लिए पैसे को लेकर विवाद के कारण 22 दिसंबर 2018 को आंशिक सरकारी कामकाज ठप हो गया. यह 25 जनवरी तक चला, और इस दौरान रिपब्लिकन से डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि सभा का कंट्रोल ट्रांसफर हुआ. व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच ट्रंप के प्रमुख चुनावी वादों में से एक पर चल रही खींचतान के कारण फेडरल कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला.
ट्रंप ने दीवार के लिए 5.7 अरब डॉलर की नई रकम मांगी थी. आखिर में पारित एक्सपेंस बिल में एक्स्ट्रा बॉर्डर बैरिकेड्स लिए 1.375 अरब डॉलर का प्रावधान किया गया. इसके बाद उन्होंने अन्य प्राधिकरणों के जरिए और पैसा हासिल करने के लिए नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दी. कांग्रेस ने उस इमरजेंसी को खत्म करने के लिए वोटिंग की. ट्रंप ने मार्च 2019 में इस प्रस्ताव को वीटो कर दिया.
बदल सकता है कामकाज का तरीका
यह घटनाक्रम दिखाता है कि कैसे कांग्रेस में हार राष्ट्रपति के कामकाज को बदल सकती है. ट्रंप जिस नीति को लागू करना चाहते थे, वह विनियोग, आपातकालीन शक्तियों और कार्यकारी कार्रवाई की सीमाओं को लेकर संघर्ष में तब्दील हो गई.
एक डेमोक्रेटिक हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स उनके विरोधियों को सरकारी कामों के लिए जरूरी बिलों पर फिर से फायदा उठाने मौका देगी. वे खर्च में बदलाव या पैसों के इस्तेमाल पर बैन लगाने की मांग कर सकते हैं. ट्रंप उनकी शर्तों को नामंजूर कर सकते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें एक ऐसे समझौते की जरूरत होगी, जो कांग्रेस से पारित हो सके.
इसका मतलब यह नहीं है कि एक और शटडाउन जरूरी है. इसका मतलब यह है कि हाउस से फंडिंग बिल पास कराने के लिए, व्हाइट हाउस अब केवल रिपब्लिकन पार्टी की सहमति को ही काफी नहीं मान सकता.
समिति के बदल जाएंगे अध्यक्ष
ट्रंप के लिए, सबसे ज्यादा दबाव जांच-पड़ताल से आ सकता है. हाउस में बहुमत मिलने से किसी पार्टी को समितियों की अगुआई और सदन के जांच एजेंडे पर काफी हद तक कंट्रोल मिल जाता है. डेमोक्रेटिक अध्यक्ष सुनवाई बुला सकते हैं, रिकॉर्ड मांग सकते हैं और प्रशासन के अधिकारियों से उन फैसलों के बारे में सवाल पूछ सकते हैं, जिन पर रिपब्लिकन नेताओं ने कोई कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया था.
व्हाइट हाउस को इन मांगों का जवाब देने, उनका विरोध करने या उन पर बातचीत करने में अपना समय लगाना पड़ सकता है. एक सुनवाई राजनीतिक कवरेज पर हावी हो सकती है, भले ही उससे कोई नया कानून न बने.
जांचकर्ता जो जानकारी हासिल कर सकते हैं, उसकी भी कुछ सीमाएं होती हैं. अधिकारी समन को चुनौती दे सकते हैं या 'एग्जीक्यूटिव प्रिविलेज'का हवाला दे सकते हैं, और ऐसे विवादों को सुलझाने में महीनों लग सकते हैं. लेकिन यह विरोध खुद कांग्रेस और राष्ट्रपति कार्यालय के बीच टकराव का हिस्सा बन सकता है.
ट्रंप का पहला कार्यकाल इस बात का सबसे साफ उदाहरण है कि यह टकराव किस हद तक जा सकता है. दिसंबर 2019 को डेमोक्रेट्स की अगुआई वाले हाउस ने उन पर सत्ता के दुरुपयोग और कांग्रेस के कामकाज में बाधा डालने के आरोप में महाभियोग चलाया था. बाद में सीनेट ने उन्हें बरी कर दिया.
अगर फिर से डेमोक्रेट्स को बहुमत मिलता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि अपने आप एक और महाभियोग शुरू हो जाएगा. साथ ही, कांग्रेस जीतने से डेमोक्रेट्स को उन्हें पद से हटाने के लिए जरूरी वोट भी नहीं मिल जाएंगे. इसका सबसे बड़ा नतीजा यह होगा कि प्रशासन को ऐसे जांचकर्ताओं का सामना करना पड़ेगा, जिनके पास जवाब मांगने की ताकत है.
सीनेट इतनी अहम क्यों है?
2018 के बाद ट्रंप के अनुभव से यह भी पता चलता है कि हाउस हारना और सीनेट हारना, दोनों कितने अलग-अलग तरह के झटके हैं. जब हाउस पर डेमोक्रेट्स का कंट्रोल था, तब सीनेट रिपब्लिकन के पास थी. अक्टूबर 2020 में, उसी सीनेट ने एमी कोनी बैरेट को 52 के मुकाबले 48 वोटों से सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में मंजूरी दी. हाउस के डेमोक्रेट्स के पास इस नियुक्ति पर वोट देने का कोई मौका नहीं था.
इसलिए, ट्रंप को भले ही एक विरोधी हाउस का सामना करना पड़े, फिर भी वे ऐसी नियुक्तियां कर सकते हैं, जिनके परिणाम उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के बाद तक बने रहेंगे.
अब सीनेट में भी डेमोक्रेट्स को बहुमत मिल गया है, तो यह रास्ता मुश्किल हो सकता है. वे फेडरल जजों, कैबिनेट पदों और अन्य सीनियर पदों के लिए नॉमिनेटड लोगों को खारिज कर सकते हैं या उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से इनकार कर सकते हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट में कोई पद खाली होता है, तो ट्रंप को अपने चुने गए उम्मीदवार के मामले में विपक्ष के बहुमत का सामना करना पड़ेगा.
यही कारण है कि नॉर्थ कैरोलिना के नतीजे केवल सिर्फ ट्रंप के समर्थन वाले उम्मीदवार की हार से कहीं ज्यादा मायने रखते हैं. रिपब्लिकन के कब्जे वाली जितनी सीटें डेमोक्रेट्स जीतते हैं, वे उतनी ही उस संस्था पर कंट्रोल पाने के करीब पहुंच जाते हैं, जो इन नियुक्तियों पर फैसला लेती है.
ट्रंप के कार्यकारी आदेशों का सिलसिला
अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान,ट्रंप ने अपने एजेंडे को लागू करने के लिए कार्यकारी आदेशों, टैरिफ, इमरजेंसी पावर्स और नियमों में बदलावों का भरपूर सहारा लिया है. अपने मौजूदा कार्यकाल में, उन्होंने अब तक 292 कार्यकारी आदेश जारी किए हैं, यह तादाद 1981 के बाद से किसी भी राष्ट्रपति की ओर से अपने पूरे चार साल के कार्यकाल में दस्तखत किए गए आदेशों की संख्या से भी ज्यादा है. इससे पहले, ट्रंप के ही पहले कार्यकाल के दौरान 220 कार्यकारी आदेशों के साथ दूसरी सबसे बड़ी संख्या दर्ज की गई थी.
'लेम-डक' दौर में कानून बनाने का चलन
कांग्रेस का 'लेम-डक' सत्र तब होता है, जब नई कांग्रेस के चुने जाने के बाद, लेकिन मौजूदा कांग्रेस का संवैधानिक कार्यकाल खत्म होने से पहले, वह (मौजूदा कांग्रेस) बैठक करती है. एमके रिसर्च के मुताबिक, ऐतिहासिक रूप से 'लेम-डक' सत्रों में काफी कानून पारित किए गए हैं. अगर डेमोक्रेट्स कांग्रेस के किसी भी सदन (हाउस या सीनेट) पर कब्जा कर लेते हैं, तो पेंडिंग पड़े प्रस्तावों को जल्द से जल्द पास कराने की कोशिश और भी तेज हो सकती है. 'लेम-डक' सेशन के दौरान पारित कानूनों का हिस्सा 2003-05 में 16.9% था, जो 2023-25 में तेजी से बढ़कर 61.3% हो गया है.
भले ही रिपब्लिकन पार्टी ने मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस पर अपना कंट्रोल खो दिया है,फिर भी ट्रंप की नीति तय करने की क्षमता तुरंत कम नहीं होगी. कार्यकारी आदेशों की रिकॉर्ड संख्या और 'लेम-डक' सत्रों का बढ़ता महत्व यह बताता है कि व्हाइट हाउस के पास अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अभी भी शक्तिशाली साधन मौजूद हैं। इसलिए, निवेशकों और पॉलिसी-मेकर्स का ध्यान इस बात से हटकर कि कांग्रेस पर किसका कंट्रोल है, इस बात पर जा सकता है कि प्रशासन अपनी कार्यकारी शक्तियों और कानून बनाने के बचे हुए मौकों का कितनी आक्रामकता से इस्तेमाल करता है.
ईरान वॉर का क्या होगा?
नतीजे आने के बाद से ट्रंप का रुख ईरान युद्ध की ओर नरम पड़ता नजर आ रहा है. अपने बयान में ट्रंप ने खुद माना कि रिपब्लिकन पार्टी की हार में ईरान युद्ध एक बड़ा फैक्टर रहा. ट्रंप ने कहा, 'मुझे लगता है कि इसका एक कारण ईरान था, लेकिन साथ ही लोगों को यह भी समझ आया कि ईरान को लेकर मैंने जो किया है, वह कितना अहम है. ऐतिहासिक रूप से, यह आज की शाम से कहीं अहम होगा, क्योंकि आप आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले नंबर एक देश को परमाणु हथियार रखने की छूट नहीं दे सकते.' लिहाजा, ऐसा लगता है कि ईरान को लेकर उनके रुख में शायद बदलाव देखने को मिल सकता है.
डेमोक्रेट्स की जीत, भारत के लिए क्या मायने?
मिडटर्म चुनावों में दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स का कंट्रोल होने से, उन्हें कानून बनाने, जांच करने और फंडिंग से जुड़े मामलों में ज्यादा ताकत मिल जाएगी. हालांकि, अमेरिकी विदेश नीति पर कांग्रेस का सीधा कंट्रोल नहीं होगा, क्योंकि राष्ट्रपति के पास वीटो समेत अहम कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी. भारत के लिए, इसके नतीजे काफी अहम हो सकते हैं. कांग्रेस और अमेरिकी सरकार के लिए गए फैसले भारतीय इंपोर्ट, अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के फ्यूचर और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को प्रभावित कर सकते हैं.
डेमोक्रेट्स का बहुमत होने पर टैरिफ, मेडिकल सर्विस, जीवन-यापन की लागत और राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर लगाम लगाने जैसे मुद्दों पर ज्यादा बहस और विधायी गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं. इनमें से कोई भी प्रस्ताव कानून बनेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि डेमोक्रेट्स को कितनी बड़ी जीत मिली है, सीनेट की प्रक्रिया क्या रहती है और ट्रंप इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं.
व्यापार और टैरिफ
अमेरिका भारतीय सामानों के लिए एक बड़ा बाजार है, इसलिए अमेरिकी टैरिफ नीति में कोई भी बदलाव सीधे तौर पर एक्सपोर्टर्स को प्रभावित करता है. फरवरी में, दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक रूपरेखा पेश की थी, जिसके तहत अमेरिका ने भारतीय मूल के सामानों पर 18 प्रतिशत का रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने की बात कही थी. इसके बाद, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने दुनिया भर के व्यापारिक साझेदारों पर टैरिफ लगाने के लिए ट्रंप के आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल को खारिज कर दिया, जिससे टैरिफ घटकर 10 प्रतिशत के बेस लेवल पर आ गया.
हालांकि, भारत और अमेरिका के बीच एक पूर्ण व्यापार समझौता अभी भी दूर की कौड़ी लगता है.विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस महीने की शुरुआत में मीडिया को बताया था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अंतिम रूप लेने के करीब है.
H-1B वीजा और इमिग्रेशन
चुनाव नतीजों का अमेरिका में रह रहे भारतीय पेशेवरों, खासकर H-1B वीजा धारकों पर भी असर पड़ सकता है. कांग्रेस में नियंत्रण बदलने से भविष्य के इमिग्रेशन कानूनों और उन पर निगरानी रखने के तरीकों पर असर पड़ सकता है, हालांकि इससे वीजा नियमों में तुरंत कोई बदलाव आए, यह जरूरी नहीं है.
डेमोक्रेट्स की जीत से इमिग्रेशन नियमों पर कांग्रेस की निगरानी बढ़ सकती है और रिपब्लिकन समर्थित कुछ प्रस्तावों पर रोक लग सकती है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रंप के सभी आदेश अपने आप पलट जाएंगे. उदाहरण के लिए, पिछले सितंबर में घोषित नए H-1B वीजा आवेदनों पर 100,000 डॉलर की फीस लगाने का फैसला भी इसमें शामिल है.
अब चूंकि डेमोक्रेट्स ने दोनों सदनों पर कब्जा कर लिया है, तो उनकी ताकत बढ़ जाएगी. लेकिन विदेश नीति जैसे मामलों में, ट्रंप का वीटो, सीनेट में 'फिलीबस्टर' (कानून पारित होने में रुकावट डालने की प्रक्रिया) और इकोनॉमी के लिए साझा राजनीतिक जिम्मेदारी के कारण उनकी नीतियां सीमित ही रहेंगी. अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने पिछले हफ्ते कहा था कि भले ही हाउस में डेमोक्रेट्स का कंट्रोल हो, फिर भी वे ट्रम्प के एजेंडे को रोकने के लिए 'बहुत कम' ही कुछ कर पाएंगे.