वायरलेस पर कोड लैंग्वेज, एंबुलेंस में पुलिस और 20 मिनट में खत्म खेल! 22 साल पहले कैसे हुआ था 'खूंखार' वीरप्पन का खात्मा?
जंगलों में खौफ का दूसरा नाम रहे वीरप्पन को पकड़ना पुलिस के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था. वह वायरलेस पर STF की बातचीत सुनता था और जंगल की मामूली आहट से भी खतरा भांप जाता था. लेकिन पुलिस ने कोड लैंग्वेज, अंडरकवर एजेंटों और आंख के इलाज के बहाने ऐसा जाल बिछाया कि वह खुद जंगल से बाहर निकल आया.
तमिलनाडु और कर्नाटक के जंगलों में दहशत का पर्याय रहे कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन के एनकाउंटर को इस 18 अक्तूबर को 22 साल पूरे हो जाएंगे. इसी दिन 18 अक्तूबर 2004 को तमिलनाडु एसटीएफ ने 'ऑपरेशन कोकून' के उसे तीन साथियों समेत मुठभेड़ में मारा गया था. यह इतनी बड़ी सफलता थी, जिसकी देश-दुनिया में तमाम जगहें चर्चाएं हुईं और मीडिया की सुर्खियां बनी. इस घटना पर फिल्म भी बनी, जिसमें इस एनकाउंटर और वीरप्पन की दहशत को विस्तार से दिखाया गया था. इस मुठभेड़ को लीड करने वाले अफसर थे, तमिलनाडु एसटीएफ के प्रभारी के. विजय कुमार. उन्होंने बाद में 'वीरप्पन: चेसिंग द ब्रिगैंड' (Veerappan: Chasing the Brigand) नाम से किताब भी लिखी, जिसमें इस वीरप्पन के सफाये से जुड़े तमाम किस्सों का विस्तार से जिक्र किया. आज हम आप आपको इस घटना से जुड़े ऐसे ही कुछ कहानियां बताने जा रहे हैं. जिसे जानकर आप भी दंग रह जाएंगे.
सीक्रेट वायरलेस से सुनता था पुलिस की बातचीत
किताब में विजय कुमार ने खुलासा किया है कि वीरप्पन के पास एक सस्ता 'आईकॉम' वायरलेस सेट था. यह वही तकनीक थी जिसका इस्तेमाल लिट्टे (LTTE) जैसे उग्रवादी संगठन किया करते थे. इस उपकरण की मदद से घने जंगलों में बैठकर भी वीरप्पन STF के अधिकारियों और जवानों की बातचीत को चुपचाप सुन लिया करता था. लगातार उनकी आवाज सुनते-सुनते वह यह भी पहचानने लगा था कि अब कौन सा जवान या अधिकारी बोल रहा है. उस वायरलेस की वजह से उसे पहले से ही पुलिस-एसटीएफ की रणनीति का पता चल जाता है और वह लोकेशन बदलकर अपने गिरोह के साथ घने जंगलों में गुम हो जाता था.
धीरे-धीरे एसटीएफ को आभास हो गया कि वीरप्पन के पास कोई ऐसा सेट है, जिससे वह वायरलेस पर होने वाली उनकी बातचीत सुन रहा है. इस संकट से निपटने के लिए विजय कुमार की टीम ने एक तकनीकी मास्टरस्ट्रोक चला. सभी अधिकारियों और जवानों ने सामान्य भाषा में बातचीत बंद करके संख्या बोलने का फॉर्मूला अपना लिया. वे अपनी लोकेशन, मूवमेंट और दिशाओं की जानकारी शेयर करने के लिए घड़ी की सुईं की स्थितियों, जैसे 12 बज, 3 बज का वर्णन करने लगे.
चकमा देने के लिए पुलिस ने शुरू की कोड लैंग्वेज
यह कोड भाषा इतनी पेचीदा थी कि वीरप्पन और उसके साथियों के लिए इसे डिकोड करना असंभव हो गया. वह वायरलेस पर पुलिस की बातें तो सुनता था, लेकिन नंबर्स का यह खेल उसकी समझ से पूरी तरह बाहर था. उसे हमेशा इस बात का डर रहता कि आखिर ये नंबर क्या इशारा कर रहे हैं और कहीं एसटीएफ जवान एकदम से उस पर हमला न बोल दें. एसटीएफ की इस ट्रिक ने वीरप्पन समेत उसके पूरे गिरोह में दहशत बैठा दी थी.
इन सब कोशिशों के बावजूद वीरप्पन जंगल से बाहर नहीं आ रहा था. ऐसे में एसटीएफ ने उसके खात्मे के लिए निर्णायक अभियान 'ऑपरेशन कॉकून' (Operation Cocoon) शुरू किया. इस ऑपरेशन का मकसद किसी भी तरह वीरप्पन को जंगल से बाहर निकालकर उसका खेल खत्म करना था. इसके लिए उसकी सक्रियता वाले जंगल के आसपास अंडरकवर एजेंटों का जाल बिछाया गया.
पुलिस वालों मजदूर, दुकानदार बनाकर गांवों में उतारा
एसटीएफ ने खामोशी के साथ अपने गुप्तचरों और पुलिसकर्मियों को बस कंडक्टर, फेरीवाले, मजदूर और छोटे कारोबारी बनाकर सत्यमंगलम और चामराजनगर के जंगलों में बसे गांवों में छोड़ दिया. वे अपने रुटीन काम करते हुए इलाके में हो रही हर गतिविधि पर बारीक निगाह रखने लगे और वीरप्पन के गिरोह की खबर निकालने लगे.
अपनी किताब में के. विजय कुमार लिखते हैं कि घने जंगल में वीरप्पन और उसके गिरोह को ढूंढना भूसे में सुई खोजने जैसा था. दूसरी बात ये थी कि वीरप्पन बहुत शातिर था. वह और उसका पूरा गिरोह कई दिनों तक बिना नहाए रहता था. साथ ही अपने शरीर पर घास-मिट्टी लपेटे रहता था. पूरा गैंग मिट्टी-पत्थरों के बीच ऐसे छिपता था, जिससे उनकी इंसानी गंध पूरी तरह खत्म हो जाती थी. इसके चलते पुलिस के कुत्ते भी उनकी लोकेशन ट्रेस नहीं कर पाते थे.
पहचान जाता था जंगल की जरा सी भी आहट
विजय कहते हैं कि वीरप्पन कोई साधारण अपराधी नहीं था. उसके पास परिस्थितियों को समझने की गजब की सेंस थी. वह हवा के रुख में जरा सा बदलाव, पेड़ों के टूटने या पक्षियों की चहचहाहट से यह अंदाजा लगा लेता था कि आसपास इंसान है या कोई जानवर. वह अपने गिरोह के पास किसी भी जगह पर ज्यादा देर नहीं रुकता था और लोकेशन बदलता रहता था.
कई महीनों तक चले चूहे-बिल्ली के खेल के बाद वर्ष 2004 में आखिरकार वह समय आ गया, जिसका एसटीएफ को बेसब्री से इंतजार था. एसटीएफ को इस बात की भनक लग गई थी कि वीरप्पन की आंख की बीमारी काफी बढ़ गई है और जल्द ही सर्जरी की जरूरत है. यह सूचना मिलते ही एसटीएफ ने जाल बिछाया और किसी तरह यह बात वीरप्पन तक पहुंचा दी कि तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में एक हथियार डीलर है, जिससे सौदा होने पर वह हथियार देने के साथ ही उसे श्रीलंका भेजकर इलाज भी करवा सकता है.
वो काली रात, जब जंगल से निकला वीरप्पन
चूंकि वीरप्पन आंख के दर्द से परेशान था. इसलिए वह इस जाल में फंस गया. वह अपने सेथुमुथु, चंद्रन और गोविंदराज के साथ 18 अक्तूबर 2004 की रात को जंगल से निकला. योजना के तहत धर्मपुरी जिले के पापिरापट्टी गांव के पास एक प्राइवेट एंबुलेंस खड़ी थी. उस एंबुलेंस में एसटीएफ के कुछ चुनिंदा अधिकारी डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ के रूप में बैठे थे. एंबुलेंस के अंदर और बाहर कैमरे फिट किए गए थे, जो पूरी फीड विजय कुमार तक भेज रहे थे.
जंगल में कुछ आगे चलने पर ड्राइवर ने यूरिन करने के बहाने एक सुनसान जगह पर एंबुलेंस रोक दी. उसे देखने के बहाने वैन में बैठे बाकी पुलिसकर्मी भी चुपके से उतर गए. विजय कुमार के मुताबिक, इसके बाद लाउडस्पीकर के जरिए वीरप्पन और उसके साथियों को सरेंडर करने की चेतावनी दी गई. लेकिन ऐसा करने के बजाय उसने अपने साथियों के साथ रात के अंधेरे में ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. इसके बाद पुलिस ने भी जवाबी फायर खोला.
20 मिनट में खत्म हो गया 20 साल का खौफ
दोनों पक्षों के बीच करीब 20 मिनट तक ताबड़तोड़ गोलियां चली. जब एंबुलेंस के अंदर से गोलियां चलनी बंद हुई तो पुलिस ने सावधानी के साथ दरवाजा खोलकर देखा. अंदर कुख्यात वीरप्पन ढेर हो चुका था. खास बात ये थी कि उसकी उसी बायीं आंख के पास पुलिस की गोली लगी थी, जिसके इलाज के लिए उसे योजना बनाकर बाहर लाया गया था. उसके तीन साथी भी इस मुठभेड़ में मारे गए. इस तरह करीब 20 वर्षों से तीन राज्यों की पुलिस के लिए दहशत का पर्याय बना रहा वीरप्पन महज 20 मिनट के एनकाउंटर में इस दुनिया से चला गया.