मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ-2028 की तैयारियों और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के तहत सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है. गोपाल मंदिर छतरी चौक के पास शाही मस्जिद का हिस्सा हटाने को लेकर सोमवार को पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच झड़प हो गई. इसके बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा और भीड़ पर काबू पाने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े. अधिकारियों ने बताया कि फिलहाल मौके पर स्थिति सामान्य है और स्थानीय लोग स्वयं चौड़ीकरण के काम में शामिल हैं. सड़क चौड़ीकरण के काम के दायरे में ऐतिहासिक शाही मस्जिद का कुछ हिस्सा आ रहा है, जिसे हटाए जाने के दौरान इलाके में तनाव की स्थिति बनी.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ द्वारा मस्जिद प्रबंधन की रोक याचिका खारिज किए जाने के बाद यह मामला अब पूरी तरह कानूनी, संवैधानिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ गया है. इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक 'धार्मिक विवाद' के रूप में देखने के बजाय भूमि अधिग्रहण कानून, सार्वजनिक उद्देश्य, संपत्ति के अधिकार (आर्टिकल 300A) और धार्मिक स्वतंत्रता (आर्टिकल 25-26) के संवैधानिक संतुलन से समझना जरूरी है. मस्जिद विवाद के कानून पहलुओं को जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप शर्मा से बात की.
1. उज्जैन की मस्जिद की जमीन किस कानून और किस सरकारी आदेश के तहत अधिग्रहित की जा रही है? क्या 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून लागू है या किसी विशेष कानून के तहत कार्रवाई हो रही है?
नगर निगम और विकास कानून: उज्जैन में यह कार्रवाई केवल लैंड एक्विजिशन एक्ट 2013 के सामान्य प्रावधानों के बजाय मध्य प्रदेश नगर पालिका निगम अधिनियम, 1956 की धारा 305 (सड़क की रेखा तय करना और बाधाएं हटाना) और मास्टर प्लान 2031 के 'मास्टर रोड एलाइनमेंट' के तहत की जा रही है.
सिंहस्थ 2028 प्रोजेक्ट: राज्य सरकार द्वारा सिंहस्थ महाकुंभ 2028 के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुगम बनाने हेतु सड़क चौड़ीकरण की विशेष परियोजना अधिसूचित की गई है.
विशिष्ट प्रक्रिया: जब नगर निगम की सीमा के भीतर सड़क चौड़ीकरण का काम होता है, तो नगर निगम अधिनियम की धाराओं के तहत नोटिस जारी कर निर्माण हटाने के निर्देश दिए जाते हैं, जिसके बदले नियमानुसार मुआवजा या पुनर्वास दिया जाता है.
भूमि अधिग्रहण कानून क्या है: सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप शर्मा ने बताया कि 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहण की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए नोटिस, आपत्ति सुनने और मुआवजे जैसी कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है. वहीं, संविधान का अनुच्छेद 300A व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित किए जाने से सुरक्षा देता है.
2. सरकार ने इस जमीन के अधिग्रहण का सार्वजनिक उद्देश्य क्या बताया है? क्या अधिग्रहण उसी उद्देश्य के लिए हो रहा है, जो आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज है?
सड़क का चौड़ीकरण: केडी गेट/कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर तक की करीब डेढ़ किलोमीटर लंबी सड़क को 15 मीटर यानी लगभग 50 फीट चौड़ा किया जाना है.
ट्रैफिक प्रबंधन और सिंहस्थ तैयारी: उज्जैन में 2028 में होने वाले 'सिंहस्थ महाकुंभ' में करोड़ों श्रद्धालुओं के आने की संभावना है. उज्जैन की संकरी सड़कों के कारण रोजाना लगने वाले जाम और आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही को दुरुस्त करना ही आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज 'सार्वजनिक उद्देश्य' है.
समान कार्रवाई: इस प्रोजेक्ट के दायरे में कुल 323 निजी मकान/दुकानें और 15 धार्मिक स्थल (मंदिर और मस्जिद दोनों शामिल) आए हैं. अब तक 12 धार्मिक स्थलों के प्रभावित हिस्सों को आपसी सहमति या प्रशासनिक कार्रवाई से हटाया जा चुका है.
3. क्या मस्जिद की जमीन के अधिग्रहण से पहले कानून में तय पूरी प्रक्रिया अपनाई गई? नोटिस, आपत्ति, सुनवाई, अधिसूचना और अंतिम अधिग्रहण आदेश की स्थिति क्या है?
प्रारंभिक सर्वे और सीमांकन: नगर निगम और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने ड्रोन और फिजिकल सर्वे के जरिए सड़क के मध्य बिंदु से दोनों तरफ निशान लगाया था. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का पैतृक घर भी इस जद में आया है और लगभग 2.90 मीटर हिस्सा तोड़ा जाएगा, जिसके लिए टीम ने पहले ही निशान लगाया था.
अधिसूचना और नोटिस: प्रभावित सभी 323 भवन स्वामियों और धार्मिक स्थलों के प्रबंधकों को लिखित नोटिस जारी कर आपत्तियां मांगी गई थीं.
दावे-आपत्तियां और सुनवाई: नगर निगम अधिकारियों ने मस्जिद इंतेजामिया कमेटी और स्थानीय लोगों के साथ कई दौर की बैठकें कीं. जब मस्जिद पक्ष ने हाईकोर्ट का रुख किया, तो इंदौर बेंच ने नगर निगम द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया और सार्वजनिक हित को देखते हुए ही स्टे देने से इनकार किया और याचिका रद्द कर दी।
4. मस्जिद की जमीन और उस पर बने धार्मिक ढांचे का मुआवजा कैसे तय होगा? जमीन की बाजार कीमत, भवन की कीमत और 100% अतिरिक्त प्रतिकर समेत कौन-कौन से प्रावधान लागू होंगे?
यदि जमीन का अधिग्रहण पूरी तरह 'भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास अधिनियम 2013' या नगर निगम क्षतिपूर्ति नियमों के तहत होता है, तो मुआवजा कई मानकों पर तय होता है. कलेक्टर गाइडलाइन के अनुसार जमीन का तत्कालीन मूल्य, पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों द्वारा हटाए जाने वाले पक्के निर्माण की लागत का आंकलन. 2013 के कानून के तहत अनिवार्य रूप से 100% सोलेशियम (अनिवार्य अर्जन का हर्जाना) जोड़ा जाता है. धार्मिक स्थलों के मामले में प्रशासन प्रायः विस्थापित हिस्से के पुनर्निर्माण या वैकल्पिक स्थान/क्षेत्र में निर्माण के लिए विशेष आर्थिक पैकेज या स्थान उपलब्ध कराता है.
5. क्या धार्मिक स्थल होने के कारण इस मामले में कोई अतिरिक्त संवैधानिक या कानूनी सुरक्षा लागू होती है? सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में मंदिर, मस्जिद और चर्च के अधिग्रहण को लेकर क्या सिद्धांत तय किए गए हैं?
संपत्ति के अधिकार (आर्टिकल 300A): सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप शर्मा ने यह भी बताया कि 1978 के 44वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 19(1)(f) को संविधान से हटा दिया गया और अनुच्छेद 300A जोड़ा गया. इसका मतलब है कि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है. उन्होंने बताया कि 2013 का कानून मुआवजे के साथ पुनर्वास की भी व्यवस्था करता है. प्रक्रिया के तहत कलेक्टर नोटिफिकेशन जारी करता है. जमीन की कीमत तय कर मुआवजे का अवॉर्ड करता है. इसके लिए स्टांप एक्ट, 1899 के प्रावधानों का भी सहारा लिया जाता है.
आर्टिकल 25 और 26 (धार्मिक स्वतंत्रता): संविधान नागरिकों को धर्म के आचरण और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार देता है। हालांकि, यह अधिकार 'सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य' के अधीन है.
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले: डॉ. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ (1994): सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि मस्जिद में नमाज अदा करना इस्लाम का अभिन्न अंग हो सकता है, लेकिन मस्जिद की इमारत या जमीन का सरकार द्वारा सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहण किया जा सकता है, जब तक कि वह स्थान उस धर्म के लिए विशिष्ट और अपरिवर्तनीय रूप से पवित्र न हो. विभिन्न फैसलों में अदालतों ने बार-बार दोहराया है कि जनहित में सड़क, फ्लाईओवर या बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च के निर्माण को हटाया या स्थानांतरित किया जा सकता है.
धार्मिक स्थल को कानूनी सुरक्षा: संदीप शर्मा ने बताया कि कानून में ऐसी कोई पूर्ण मनाही नहीं है. उन्होंने जुलाई 2026 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के रशीद अली बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित कानूनों के बावजूद सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता. साथ ही, अगर किसी पक्ष को अधिग्रहण की प्रक्रिया पर आपत्ति है, तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. यहां तक कि आपात स्थिति में भी न्यायिक चुनौती के लिए 48 घंटे की विंडो का प्रावधान बताया गया है.
6. क्या मस्जिद की जमीन के अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है? अगर हां, तो किन आधारों पर कानूनी प्रक्रिया, सार्वजनिक उद्देश्य, मुआवजा या धार्मिक अधिकार?
हाईकोर्ट की इंदौर पीठ से याचिका खारिज होने के बाद मस्जिद प्रबंधन के पास कानूनी विकल्प मौजूद हैं. हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की जा सकती है. कोर्ट में यह दलील दी जा सकती है कि 2013 के कानून के तहत सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन या व्यक्तिगत सुनवाई नहीं हुई. इसके साथ ही मस्जिद प्रबंधन का दावा है कि यह ढांचा 100 से 600 साल पुराना है, इस हिसाब से कोर्ट से इसे 'हेरिटेज' संरचना मानकर सुरक्षा देने की मांग की जा सकती है.
7. उज्जैन के इस मामले में सरकार और मस्जिद प्रबंधन/जमीन के मालिक के दावों में क्या अंतर है? सरकारी रिकॉर्ड, अधिग्रहण अधिसूचना, राजस्व दस्तावेज और कोर्ट के रिकॉर्ड इस विवाद के बारे में क्या बताते हैं?
शाही मस्जिद को लेकर राजस्व और निगम दस्तावेजों में 100 साल से अधिक पुराना उल्लेख है, जबकि इमाम और स्थानीय बुजुर्गों का दावा है कि यह 600 साल से ज्यादा पुरानी मस्जिद है. मास्टर प्लान के अनुसार 15 मीटर चौड़ी सड़क सार्वजनिक आवश्यकता है, जबकि स्थानीय लोगों का दावा है कि मस्जिद का कुछ फीट हिस्सा छोड़ने से भी सड़क का काम चल सकता है. नगर निगम का दावा है कि कानून के तहत नोटिस दिए गए और हाईकोर्ट से हरी झंडी मिली. लोगों का दावा है कि कार्रवाई में जल्दबाजी की गई और स्थानीय भावनाओं का ध्यान नहीं रखा गया.