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मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में दीपावली का एक ऐसा अनूठा उत्सव देखने को मिला है, जहां पर रोशनी और आतिशबाजी के बीच अपनों की यादों को संजोय रखने की पंरपरा निभाई गई. जहां दीवाली के एक दिन पहले यानी शनिवार को नरक चतुर्दशी पर त्रिवेणी मुक्तिधाम में श्मशान की दीवाली पूरे उत्साह और आस्था के साथ मनाई गई.
श्मशान पर अक्सर देखा होगा कि चिताएं सजती और जलती हैं, लेकिन वहां दीपावली के एक दिन पहले दीपों की रोशनी बिखेरी गई है. नीचे दो तस्वीरों को देखिए. जहां पहली तस्वीर में अंतिम संस्कार स्थल से लेकर शोक जताने वाले परिसर तक रंगोली सजाई गई है. इसके साथ ही दीप भी जलाए गए हैं.
दो तस्वीरों में देखिए पूरा नजारावहीं दूसरी तरफ लगी तस्वीर में श्मशान का नजारा बिल्कुल बदला सा नजर आ रहा है. अक्सर देखा होगा कि यहां पर सन्नाटा सा पसरा रहता और लोगों की आंखें नम होती है. लेकिन वहीं बच्चों से लेकर बड़ों तक ने बड़े उत्साह के साथ आतिशबाजी कर दीवाली की खुशियां मनाईं. हर तरफ फुलझड़ी और पटाखों के धमाके से श्मशान गूंज उठा.
दरअसल, इस परंपरा का उद्देश्य उन अपनों के साथ दिवाली मनाना है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. पूर्वजों को याद कर उनका आशीर्वाद लेने की यह परंपरा रतलाम की सांस्कृतिक विरासत और भावनात्मक आस्था की अनूठी मिसाल है. यह परंपरा बताती है कि त्योहार सिर्फ अपनों के साथ नहीं बल्कि अपनों के बाद भी है.
बताया जाता है कि यह परंपरा पिछले 21 सालों से निभाई जा रही है. जहां हर साल पूर्वजों के सम्मान में दीपावली मनाने बड़ी संख्या में लोग परिवार के साथ पहुंचते हैं. इस दौरान श्मशान घाट पर छोटे से लेकर बड़ों तक ने बड़े ही उत्साह के साथ दिवाली की खुशियां मनाई. इसके अलावा, लोगों ने जमकर आतिशबाजी की.
इस परंपरा की शुरुआत 2006 में रतलाम की एक संस्था ने शुरू की थी. इस संस्था के सदस्य गोपाल सोनी का कहना है कि शुरुआत में सिर्फ 5 लोगों ने ही परिवार के साथ श्मशान में पहुंचकर दीपक जलाने का कार्यक्रम आयोजित किया था. इसके बाद साल दर साल यहां पहुंचने वाले लोगों की संख्या बढ़ती चली गई.
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साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि अब यहां पर 100 से ज्यादा परिवार त्रिवेणी मुक्तिधाम में पहुंचकर अपने पूर्वजों की याद में दीपावली का त्योहार मनाते हैं. हालांकि, नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है. जिसमें पूर्वजों की याद में जल स्रोत पर दीपक जलाकर दीपदान किया जाता है. लेकिन रतलाम में दीपदान को अनोखे तरीके से मुक्तिधाम में पहुंचकर मनाया जाता है.
यहां पर मौजूद युवा पीढ़ी में काफी उत्साह देखने को मिला है. श्रद्धा का कहना है कि आमतौर पर श्मशान पर घोर अंधेरा और खामोशी रहती है, लेकिन नरक चतुर्दशी के दिन त्रिवेणी स्थित मुक्तिधाम में दीपावली का हर्ष उल्लास और रोशनी का माहौल रहता है. मान्यता है कि यह पूर्वजों की याद करने और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का कार्यक्रम होता है. इससे उनपर पूर्वजों की कृपा बनी रहती है.
(रिपोर्टः चंद्रशेखर सोलंकी, रतलाम)