ओरछा का अनोखा लक्ष्मीनारायण मंदिर: श्री यंत्र - उल्लू की चोंच के आकार में हुआ निर्माण, 40 साल से गर्भगृह में नहीं है मां लक्ष्मी की प्रतिमा
मध्य प्रदेश के ओरछा में एक अनूठा मंदिर बना है. इस मंदिर का आकार उल्लू की चोंच और श्री यंत्र के आकार में बना है. आइए इस मंदिर के इतिहास और खासियत के बारे में बताते हैं.
देश में एक अनूठा मंदिर बना है, जो कि उल्लू की चोंच और श्री यंत्र के आकार में तांत्रिक विधि से बनाया गया था. कभी बुंदेलखंड राज्य की राजधानी रही ओरछा रियासत आज मध्य प्रदेश के सबसे छोटे जिले निवाड़ी की तहसील है. यहां पर भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है, जामुनी और बेतवा नदी के किनारे बसा यह ऐतिहासिक नगर अपने अंदर कई सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजे हुए है, जिसे देखने के लिए देश के ही नहीं बल्कि विदेशों से भी सैलानी आते हैं.
ओरछा में स्थित रामराजा मंदिर, जहांगीर महल, राजा महल, चतुर्भुज मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर खास बताए जाते हैं. इसमें 17वीं सदी की शुरुआत में बना लक्ष्मीनारायण मंदिर अपने आप में खास है, यह मंदिर 1622 ई. में वीर सिंह जूदेव ने बनवाया था, यह मंदिर ओरछा के पश्चिम में एक पहाड़ी पर मौजूद है.
भगवान कृष्ण की लीलाओं की आकृतियां
यह मंदिर पिछले 40 सालों से मूर्ति विहीन है. इस मंदिर में 17वीं और 19वीं शताब्दी के चित्र बने हुए हैं, चित्रों के चटकीले रंग इतने जीवंत लगते हैं, जैसे वह हाल ही में बने हों. मंदिर में रामायण महाभारत झांसी की लड़ाई के दृश्य और भगवान कृष्ण की लीलाओं की आकृतियां बनी हैं.
बुंदेलखंड समेत पूरे देश में यह इकलौता मंदिर है, जिसका निर्माण तत्कालीन विद्वानों द्वारा श्रीयंत्र के आकार में उल्लू की चोंच को दर्शाते हुए किया गया था. इसके अलावा, 17वीं सदी में बने इस मंदिर की मान्यता है कि दीवाली के दिन इस सिद्ध मंदिर में दीपक जलाकर मां लक्ष्मी की पूजा करने से वह प्रसन्न होती है.
गर्भगृह का सिंहासन सूना पड़ा
1983 में मंदिर में स्थापित मूर्तियों को चोरों ने चुरा लिया था. तब से आज तक मंदिर के गर्भगृह का सिंहासन सूना पड़ा है. बताया जाता है कि 1622 में राजा वीर सिंह देव ने ओरछा में कई ऐतिहासिक इमारतों के साथ इस मंदिर का निर्माण तत्कालीन विद्वानों के द्वारा श्री यंत्र के आकार में उल्लू की चोंच को दर्शाते हुए तांत्रिक विधि से बनाया गया था.
बिना प्रतिमा के भी पूजा पाठ
यह मंदिर देश दुनिया का इकलौता धन की देवी माता लक्ष्मी को समर्पित हैं. मंदिर में माता की प्रतिमा ना होने के बावजूद भी यहां पूजा पाठ की जाती है और श्रद्धालु मंदिर की चौखट पर माथा टेककर बिना मां लक्ष्मी के दर्शन किए वापिस लौट जाते हैं, तो वहीं धनतेरस से दीपावली तक हजारों की संख्या में देश विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं. ऐसी मान्यता है कि दीपावली की रात मंदिर व परिसर में दीपक प्रज्वलित करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है.
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कब हुआ था इसका निर्माण?
इतिहासकार हेमंत गोस्वामी का कहना है कि लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण ओरछा के बुंदेला राजा वीर सिंह ने 17वीं शताब्दी में किया था. क्योंकि यह लक्ष्मी जी है, इनको धन की अधिष्ठात्री देवी माना गया है. उन्होंने कहा कि लक्ष्मी को पाने के लिए कभी-कभी आंतरिक पूजाओं का भी प्रयोग किया जाता है.
उन्होंने आगे कहा कि जब आप इस मंदिर के पास जाएंगे, तो आपको लगेगा ये मंदिर तांत्रिक पूजाओं के लिए उस समय मेरे हिसाब से आर्किटेक्चर के हिसाब से रहा होगा. क्योंकि, इसका जो गर्भ गृह है, वो श्री यंत्र के आकार का है. जब मंदिर के सामने खड़े होकर आप इसका मुख्य प्रवेश द्वार देखेंगे तो एक उल्लू की आकृति उल्लू के चेहरे के समान आकृति लगती है.