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भारत देश में त्योहारों पर कई अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं. इस बीच कुछ ऐसी परंपराएं भी हैं, जो अपने आप में सबसे अलग हैं और सबको हैरान कर देने वाली हैं. ऐसे ही दीपावली के दूसरे दिन याने पड़वा पर मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के गौतमपुरा में हिंगोट युद्ध होता है, जिसमें योद्धा एक दूसरे पर बारूद से भरे हिंगोट एक-दूसरे पर बरसाते हैं, लेकिन इस युद्ध की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न किसी की हार होती है और न ही किसी की जीत. यह युद्ध आपसी भाईचारे की भी एक अनूठी मिसाल है.
सबसे बड़ी बात तो यह होती है कि इस युद्ध में ना तो कोई आयोजक होता है और ना ही कोई प्रायोजक होता है. युद्ध रूपी यह परंपरा सालों से आज भी आधुनिक युग तक चली आ रही है. इस युद्ध को लेकर योद्धा एक माह पूर्व ही तैयारी में जुट जाते हैं. यह युद्ध कब शुरू हुआ? किसी को नहीं पता, लेकिन बुजुर्ग बताते हैं कि उनके भी बाप-दादाओं के जमाने से यह परंपरा चली आ रही है.
यह युद्ध किसी जोखिम से कम और खतरों से खाली नहीं है, लेकिन इसके बाद भी लोग दूर-दूर जंगलों में जाकर युद्ध के लिए हिंगोनिया नामक पेड़ से फल तोड़कर लाते हैं. फल का गूदा निकाला जाता है और उन्हें सुखाया जाता है. इसके बाद योद्धा फल के आंदर बारूद भरते हैं और फिर उसके आखिरी सिरे पर पीली मिट्टी लगाकर पैक किया जाता है.
हिंगोट युद्ध में दो योद्धा दल होते हैं. एक योद्धा दल का नाम तुर्रा होता है, तो दूसरे योद्धा दल का नाम कलंगी होता है. दोनों ही दल के योद्धा सर पर पगड़ी और हेलमेट लगाकर युद्ध में जाने की तैयारी करते हैं. इससे पहले घर की माताएं-बेटियां तिलक लगाकर उन्हें युद्ध मैदान में भेजती हैं. दोनों ही दल के योद्धा सबसे पहले युद्ध मैदान के पास स्थित भगवान देवनारायण के मंदिर जाते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेकर युद्ध के लिए मैदान में पहुंचते हैं.
भगवान से आशीर्वाद लेने के बाद योद्धा मैदान में उतरते हैं और एक-दूसरे पर हिंगोट फेंकते हैं. इस युद्ध में कई बार योद्धा के साथ-साथ कई दर्शक भी घायल हो जाते हैं. ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए बड़ी-बड़ी जालिया लगाई जाती हैं और स्वास्थ विभाग का अमला एंबुलेंस के साथ तैयार रहता है. हिंगोट युद्ध की तैयारी को लेकर प्रशासन भी अपनी तैयारी रखता है. युद्ध मैदान में बड़ी संख्या में बैरिकेडिंग और बड़ी-बड़ी जालियां लगाने के साथ ही मैदान में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जाते हैं, ताकि चप्पे-चप्पे पर निगरानी रखी जा सके.
इस युद्ध की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इस युद्ध का ना तो कोई आयोजक होता है और ना ही कोई प्रायोजक होता है. इतना ही नहीं इस युद्ध में दो दल होते हैं. आमने-सामने हिंगोट फेंककर युद्ध भी होता है, लेकिन इस युद्ध में ना तो किसी की हार होती है और ना ही किसी की जीत होती है, जिसे भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक भी माना जाता है. (इनपुट- यत्नेश सेन)