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मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों और महाकाल की सवारी के रास्ते को चौड़ा करने के लिए कंठाल चौराहा से छतरी चौक तक सड़क चौड़ीकरण करने का काम चल रहा है. इसी दौरान नगर निगम की एक टीम लगभग 170 साल पुराने 'खड़े हनुमान' मंदिर को हटाने पहुंची, लेकिन टीम के पसीने उस समय छूट गए जब क्रेन की मदद से भी प्रतिमा हटाई नहीं जा सकी. हालांकि निगम ने कार्रवाई के दौरान मंदिर के कुछ हिस्सों को तो गिरा दिया, लेकिन जब भगवान हनुमान की मुख्य मूर्ति को हटाने की बारी आई तो अधिकारियों के होश उड़ गए. क्योंकि पांच दिन बाद भी मूर्ति अपनी जगह से नहीं हिली. यह घटना लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है. लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि निगम की तमाम कोशिशों के बावजूद मूर्ति एक इंच भी क्यों नहीं हिली.
कार्रवाई के बाद भी नहीं हट सकी खड़े हनुमान जी की प्रतिमा
शुरुआती कार्रवाई के बाद जब मूर्ति को हटाने की कोशिश की गई, तो पुरातत्व विभाग की टीम ने तुरंत रोक दिया. विभाग ने जांच की और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि इस पुरानी मूर्ति को हिलाने या निकालने से इसमें गहरी दरार आ सकती है. मतलब मंदिर का बाहरी हिस्सा हटाया जा सकता है, लेकिन करीब 170 साल पुरानी इस चमत्कारी मूर्ति को बिना नुकसान के हटाना प्रशासन के लिए बहुत मुश्किल हो रहा है. अधिकारियों का कहना है कि मंगलवार को मंदिर को हटाने की एक और कोशिश की जाएगी.
धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करने की चेतावनी
इधर, जब मंदिर को गिराने और मूर्ति को हटाने की खबर स्थानीय भक्तों और हिंदू संगठनों के सदस्यों के बीच फैली, तो उस जगह पर भारी भीड़ जमा हो गई. मंदिर को गिरते देख कई भक्तों की आंखों में आंसू आ गए. लोगों का कहना है कि यह सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि हजारों स्थानीय निवासियों की गहरी आस्था और विश्वास का प्रतीक है. पुजारियों और संगठनों ने प्रशासन को धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करने की चेतावनी दी है.
अब प्रशासन और नगर निगम क्या करेंगे?
इस अजीब स्थिति ने स्थानीय प्रशासन और नगर निगम को बड़ी परेशानी में डाल दिया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन पुरातत्व विभाग की मदद से मूर्ति को सुरक्षित तरीके से हटा पाएगा, या फिर हनुमान जी की इस आस्था के सामने नगर निगम को पीछे हटना पड़ेगा. फिलहाल मौके पर तनाव और उलझन का माहौल बना हुआ है.
एक्सपर्ट ने मूर्ति के बारे में क्या कहा?
वहीं इस प्रतिमा को लेकर विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी ने कहा कि, यह मूर्ति मालवा क्षेत्र के बेसाल्ट पत्थर से तराशी गई है. यह लगभग एक हजार साल पहले राजा भोज के समय प्रचलित मूर्ति-निर्माण परंपरा से संबंधित हो सकती है. परमार काल और राजा भोज के शासनकाल के दौरान ऐसे मजबूत बेसाल्ट पत्थर से मूर्तियां बनाने की परंपरा आम थी.