टाइगर-चीता के बाद अब 'गिद्ध स्टेट' बना MP: 11 हजार से ज्यादा आबादी, जानें क्यों इन्हें कहा जाता है कुदरत का सबसे बड़ा 'सफाईकर्मी'
MP News: मध्य प्रदेश में गिद्धों की बढ़ती आबादी पर्यावरण और जैव-विविधता संरक्षण के लिए बहुत अच्छी खबर है. प्रदेश में गिद्धों की संख्या 11 हजार से ज्यादा दर्ज की गई है. एमपी में गिद्धों की गिनती साल में दो बार होती है.
मध्य प्रदेश जैव-विविधता संरक्षण के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है. टाइगर, चीता और तेंदुआ स्टेट के बाद अब राज्य वल्चर स्टेट (गिद्धों का राज्य) बनने की राह पर है, क्योंकि यहां गिद्धों की आबादी 11,000 से ज्यादा हो गई है. दो अलग-अलग सर्वे में इनकी संख्या 15,642 और 11,120 दर्ज की गई. वाइल्डलाइफ IFS अधिकारियों के अनुसार, गिद्ध प्रकृति के सबसे असरदार सफाईकर्मी (scavengers) होते हैं. उनके पेट में एक खास तरह का एसिड होता है जो बीमार या मरे हुए जानवरों के मांस और हानिकारक बैक्टीरिया को आसानी से पचा सकता है, जिससे इंसानों और पर्यावरण में बीमारियों के फैलने का खतरा कम हो जाता है.
गिद्धों की 7 प्रजाति एमपी में पाई जाती हैं
दरअसल, मध्य प्रदेश में साल में दो बार गिद्धों की गिनती की जाती है. एक बार सर्दियों में (जनवरी-फरवरी) और दूसरी बार गर्मियों में (अप्रैल-मई). इन गिनती में क्रमशः 15,642 और 11,120 गिद्ध पाए गए. गिद्ध इकोसिस्टम में अहम भूमिका निभाते हैं. उनका संरक्षण न केवल जैव-विविधता की रक्षा के लिए, बल्कि पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए भी जरूरी है. राज्य सरकार गिद्धों और अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है. IFS अधिकारी विजय कुमार ने बताया कि गिद्धों की गिनती पॉइंट काउंट तरीके से की जाती है. यह गिनती तीन दिनों तक चलती है और इसमें सुबह 6:00 बजे से 9:00 बजे के बीच गिनती की जाती है. मध्य प्रदेश में गिद्धों की सात प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें से चार यहीं रहने वाली प्रजातियां हैं और तीन प्रवासी हैं.
भोपाल के केरवा गिद्ध प्रजनन केंद्र में 6 गिद्धों को छोड़ा गया
मध्य प्रदेश में गिद्ध संरक्षण की कोशिशों के तहत भोपाल के केरवा गिद्ध प्रजनन केंद्र से छह गिद्धों को पहली बार कल, बुधवार को प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा गया. इन गिद्धों की गतिविधियों, व्यवहार और सुरक्षा पर लगातार नजर रखने के लिए इनमें GPS ट्रैकर लगाए गए हैं.
साल 2000 में गिद्धों की संख्या में कमी
हालांकि, साल 2000 के आसपास गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट देखी गई. इसका मुख्य कारण डाइक्लोफेनाक दवा थी, जो मवेशियों को दर्द निवारक के तौर पर दी जाती थी. जिन गिद्धों ने इस दवा से इलाज किए गए जानवरों के शव खाए, उन्हें जानलेवा नतीजों का सामना करना पड़ा. 2006 में डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
क्यों इन्हें कहा जाता है कुदरत का सबसे बड़ा 'सफाईकर्मी'
गिद्धों को प्रकृति का सबसे महत्वपूर्ण सफाईकर्मी माना जाता है. जब कोई जानवर मरता है, तो उसका मांस सड़ने लगता है, गिद्ध इस मरे हुए और सड़ते मांस को खाकर पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं. उनके पेट में एक खास तरह का एसिड होता है जो सड़े-गले और संक्रमित मांस को भी पचा सकता है. इसी वजह से, गिद्ध इंसानों और दूसरे जीवों दोनों के लिए बहुत जरूरी है.