2 समुदायों को जोड़ता मंदसौर का 'कच्चा धागा': दक्षिण भारत तक धूम, 5 दशकों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस काम में जुटे नीलगर मुस्लिम परिवार
हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला कलावा मध्य प्रदेश के मंदसौर में बड़े पैमाने पर बनाया जाता है. यहां मुस्लिम नीलगर समुदाय के 500 से ज्यादा परिवार पीढ़ियों से कलावा बनाने के पारंपरिक कारोबार से जुड़े हैं.
सूत के लाल, पीले और हरे रंग से रंगे धागे को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है. कई लोग लच्छा कहते हैं, तो कोई कलावा के नाम से जानता है. कलावा को हिंदू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. जन्म से लेकर मरने तक हर मांगलिक और धार्मिक कामों में इसका उपयोग किया जाता है. इसका उत्पादन मध्य प्रदेश के मंदसौर में बड़ी मात्रा में किया जाता है, लेकिन इसे बनाने के पीछे काफी दिलचस्प कहानी है.
दरअसल, मंदसौर में मुस्लिम नीलगर समुदाय के लगभग 500 से ज्यादा परिवार ऐसे हैं, जो पिछले पांच दशकों यानी पीढियां दर पीढ़ियां इसे बनाने का काम करते आ रहे हैं. आज भी दिन-रात इस कारोबार को बड़े ही उत्साह से कर रहे हैं. कलावा बनाने के लिए परिवार की महिलाओं से लेकर पुरुषों तक सभी लोग इसमें किसी न किसी रूप में अपना योगदान दे रहे हैं. बताया जाता है कि यहां की अच्छी गुणवत्ता वाला कलावा की पूरे देश में काफी डिमांड रहती है.
मंदिरों में भारी डिमांड
मध्य प्रदेश के उज्जैन से ही नहीं पूरे देश के हर मंदिरों में इसकी भारी डिमांड रहती है. इस त्योहारी सीजन में इसकी डिमांड इतनी बढ़ जाती है कि यहां के कारोबारी पूरी मेहनत के साथ ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करने में जुटे रहते हैं. अभी दीपावली का त्योहार आने वाला है. इस मौके पर इसकी डिमांड हर घर से लेकर मंदिरों तक खूब रहती है. लोग पूजा पाठ के दौरान इसे यूज करते हैं. कई लोग तो अपने हाथों में भी बांधते हैं.
कहां से आता है धागा
कलावा बनाने वाले कारीगर ने बताया कि लच्छा बनाने के लिए कच्चा सूत मुंबई और कोल्हापुर से मंगवाया जाता है. इसके बाद इसे अच्छे रंगों से रंगकर सुखाया जाता है. इस रंग-बिरंगे धागे को तैयार करने के लिए इसे कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है. कड़ी मेहनत के बाद दिनभर में प्रति परिवार तकरीबन 60-100 किलो लच्छा तैयार किया जाता है.
कारीगरों की समस्या
यहां के कारीगरों का कहना है कि इसमें उन्हें सिर्फ 10 से 20 रुपए प्रति किलो मजदूरी ही बच पाती है. इससे किसी तरह उनका गुजारा चल पाता है. वहीं इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि तैयार माल मांग और गुणवत्ता के हिसाब से 160 से 200 रुपए प्रति किलो बिकता है. लेकिन स्थानीय विपणन (मार्केटिंग) के लिए कोई बाजार नहीं मिल पा रहा है और न कोई सहकारी समति, जिसकी वजह से यहां के कारीगरों को उचित सहायता नहीं मिल पाती है.
लोगों की क्या मांगें ?
इसी वजह से यहां के रहने वाले लोगों की मांग है कि इस पारंपरिक कला को खास कला में शामिल किया जाए और विशेष दर्जा दिया जाए. साथ ही एक समिति बनाई जाए, ताकि विपणन की व्यवस्था सुचारू हो सके. इसके अलावा, उनकी मांग है कि यह समुदाय अच्छी तरह से अपना जीवन यापन कर अपनी मेहनत का उचित दाम मिल सके.
(रिपोर्टः मनीष पुरोहित, मंदसौर)