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छिंदवाड़ा जिले के गंगई गांव के शासकीय प्राथमिक स्कूल से सरकारी शिक्षा व्यवस्था की दावों को उजागर करती एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर स्थित इस स्कूल की छत पिछले एक साल से पूरी तरह जर्जर और गायब है. नतीजतन, अच्छी सुविधाओं वाले क्लासरूम के बजाय इन बच्चों के भविष्य की नींव एक हनुमान मंदिर के बरामदे में रखी जा रही है. हालात ने संकट मोचन हनुमान मंदिर के बरामदे को बच्चों का कामचलाऊ स्कूल बनने पर मजबूर कर दिया है.
स्कूल में बच्चों के लिए टॉयलेट की सुविधा तक नहीं
गंगई गांव के शासकीय प्राथमिक स्कूल की हालत ऐसी है कि यहां बच्चों के लिए टॉयलेट की सुविधा तक नहीं है. यह स्कूल MLB क्लस्टर के तहत कपरवाड़ी जन शिक्षा केंद्र से जुड़ा हुआ है. यहां कक्षा 1 से 5 तक के लगभग 32 बच्चे पढ़ते हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे मजदूर और किसान परिवारों से आते हैं. ये बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, पुलिस अफसर और टीचर बनने का सपना देखते हैं, लेकिन जिस स्कूल में उनके ये सपने आकार लेते हैं, वही स्कूल आज सरकारी अनदेखी का शिकार है.
हनुमान जी के सहारे बच्चों का भविष्य
स्कूल टीचर ने बताया कि इस मामले की जानकारी BO, BRC और कलेक्टर तक को दी गई है. लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला है. 32 बच्चों के लिए सिर्फ एक टीचर होने की वजह से बच्चों का भविष्य खतरे में नजर आ रहा है. ग्रामीणों ने स्कूल की छत की मरम्मत के लिए स्थानीय नेताओं से लेकर अधिकारियों तक सबसे गुहार लगाई. लेकिन जब फंड की कमी का हवाला देते हुए सभी ने काम करने से मना कर दिया, तो भगवान हनुमान संकट मोचन ही बच्चों की एकमात्र उम्मीद बन गए.
हम इसकी मरम्मत करवा लेंगे- जिला शिक्षा अधिकारी
वहीं प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी जे.के. इडपाचे ने बताया कि यह गंगई का प्राइमरी स्कूल है. गंगई का स्कूल एक साल पहले ही खराब हो गया था, लेकिन हमने AWP में इसका प्रस्ताव रखा है. जैसे ही सरकार से फंड मिलेगा, हम इसकी मरम्मत करवा लेंगे. हमने अभी इसके लिए खास तौर पर मांग भी की है कि छत का काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए. इसके साथ ही हमने दूसरे लोगों से भी प्रस्ताव भेजने को कहा है. बहुत जल्द हमें फंड मिल जाएगा और हम इस पर काम शुरू कर देंगे.
शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
गंगई गांव के हालात सिर्फ एक जर्जर इमारत की कहानी नहीं हैं. ये देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और मन में बड़े-बड़े सपने होने चाहिए, उस उम्र में वे बुनियादी सुविधाओं और सिर पर एक मजबूत छत के लिए तरस रहे हैं. भले ही संकट मोचन मंदिर ने उन्हें कुछ समय के लिए पनाह दी हो, लेकिन प्रशासन को कागजी कार्रवाई और बजट की कमी जैसे बहानों से आगे बढ़कर, इन मासूम बच्चों के लिए जल्द से जल्द एक सुरक्षित और पक्का सपनों का स्कूल बनाना चाहिए.