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सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रिहायशी इलाकों में वर्षों से चल रही व्यावसायिक दुकानों और ऑफिस पर ताबड़तोड़ सीलिंग और तालाबंदी की कार्रवाई लगातार जारी है. दशकों से टैक्स और लाइसेंस फीस जमा कर रहे व्यापारी की दुकानें और ऑफिस रातोंरात बंद किए जा रहे हैं. सीलिंग की प्रक्रिया देश में पहली बार नहीं हो रही है, लेकिन दिल्ली, जयपुर, रायपुर और रांची जैसे शहरों ने समय रहते रास्ता निकालकर व्यापारियों को राहत दी है. इसके बाद सवाल उठने लगा है कि क्या कोई दूसरा रास्ता है, जिससे भोपाल को इस सीलिंग संकट से बचाया जा सकता था?
जब दिल्ली, जयपुर, रायपुर और रांची के व्यापारियों को मिक्स्ड लैंड यूज फॉर्मूले के तहत राहत दी गई थी और वो सीलिंग की प्रक्रिया से बच गए थे. ये वाला फॉर्मूला साल 2019 में आए 'भोपाल मास्टर प्लान 2031' के ड्राफ्ट में भी शामिल था, लेकिन पिछले 7 सालों से यह मास्टर प्लान अटका हुआ है. इसका खामियाजा शहर के हजारों छोटे-बड़े व्यापारियों को भुगतना पड़ रहा है.
क्या है 'मिक्स्ड लैंड यूज' फॉर्मूला, जिससे दूसरे शहर बच गए?
'मिक्स्ड लैंड यूज' फॉर्मूला को हमने रांची के एक वकील ऋषि कुमार महतो से बात की. उन्होंने बताया कि जब भी किसी शहर की आबादी बढ़ती है, तो धीरे-धीरे रिहायशी इलाकों में सड़कों के किनारे वाले घरों में दैनिक जरूरतों की दुकानें (जैसे बैंक, पैथोलॉजी, ग्रॉसरी, स्टेशनरी) खुलने लगती हैं. इसे नियंत्रित करने के लिए 'मिक्स्ड लैंड यूज' की नीति अपनाई जाती है. इसके तहत चौड़ी सड़कों को मिक्स्ड लैंड यूज घोषित कर दिया जाता है और दुकानों से कन्वर्जन फीस लेकर वैध कर दिया जाता है.
दिल्ली में साल 2006 में जब सीलिंग शुरू हुई, तो सरकार ने 2007 के मास्टर प्लान में संशोधन कर 60 फीट और उससे चौड़ी सड़कों को 'मिक्स्ड लैंड यूज' घोषित कर दिया. इसके बाद निर्धारित कन्वर्जन फीस लेकर दुकानों को वैध कर दिया गया. इसके बाद जिन दुकानों पर सीलिंग का खतरा मंडरा रहा था, वो कार्रवाई से बच गई. इसी तरह साल जयपुर के 2016 और रायपुर के 2022 मास्टर प्लान संशोधनों के जरिए 40 से 60 फीट की प्रमुख सड़कों और कॉरिडोर पर व्यावसायिक गतिविधियों को कानूनी मान्यता दे दी गई थी.
दिल्ली, जयपुर और रायपुर नए नियमों में ढल गए, लेकिन भोपाल आज भी 1995 के पुराने मास्टर प्लान के नियमों पर ही अटका हुआ है. इस वजह से नतीजा यह है कि जयपुर या दिल्ली में 60 फीट चौड़ी सड़क पर दुकानें चल रही हैं, लेकिन भोपाल के शाहपुरा, कोलार या नर्मदापुरम रोड की 60 फीट चौड़ी सड़क पर भोपाल का व्यापारी सीलिंग झेल रहा है.
भोपाल मास्टर प्लान 2031 के ड्राफ्ट में क्या था सीलिंग से बचने का रास्ता?
साल 2019 में भोपाल मास्टर प्लान-2031 का ड्राफ्ट तैयार किया गया था, तब तत्कालीन नगर और ग्राम निवेश (T&CP) अधिकारियों ने शहर की जमीनी हकीकत को समझते हुए इसमें मिक्स्ड लैंडयूज का स्पष्ट प्रावधान रखा था, लेकिन ये प्लान अब तक लागू नहीं हो पाया है और व्यापारी लगातार भोपाल मास्टर प्लान-2031 लागू करने की मांग कर रहे हैं.
भोपाल मास्टर प्लान-2031 अगर लागू हो जाता तो 10 नंबर मार्केट, मनीषा मार्केट या नर्मदापुरम रोड की 18 मीटर यानी करीब 60 फीट चौड़ी सड़कों के ग्राउंड फ्लोर पर कन्वर्जन फीस जमा कराकर दुकानें, बैंक और क्लीनिक कानूनी रूप से वैध हो जाते. इससे व्यापारियों को नुकसान नहीं होता. वहीं, अरेरा कॉलोनी (E-3, E-4) या शाहपुरा की 30-40 फीट वाली गलियों में कमर्शियल गतिविधियों पर सख्त रोक रहती, जिससे रहवासियों का माहौल शांत रहता और ट्रैफिक जाम की समस्या नहीं होती.
अब क्या है इस संकट का समाधान?
इस सीलिंग संकट से निपटने के लिए सरकार के पास 3 विकल्प हैं. सरकार करीब 7 सालों से लंबित पड़े मास्टर प्लान 2031 को मिक्स्ड लैंड यूज के प्रावधानों के साथ तुरंत अंतिम मंजूरी दे. दिल्ली के अलावा अन्य शहरों की तरह जब तक मास्टर प्लान पूरी तरह लागू नहीं होता, तब तक 60 फीट और उससे चौड़ी सड़कों के लिए एक विशेष 'मिक्स्ड लैंडयूज नोटिफिकेशन' जारी कर सीलिंग पर अंतरिम रोक लगाई जाए. मुख्य सड़कों वाली दुकानों को निर्धारित विकास शुल्क/कन्वर्जन फीस जमा कर नियमित करने का मौका दिया जाए.