आसमान में चमकता पूर्ण चंद्रमा, चांदनी में रखी खीर और मंदिरों में गूंजते भजन…शरद पूर्णिमा की रात का नजारा कुछ ऐसा ही होगा. हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखने वाले इस पर्व को लेकर भिंड और आसपास के अंचल में तैयारियां की जा रही हैं. प्रमुख मंदिरों में भगवान का विशेष शृंगार कर मेवायुक्त दूध की खीर का भोग लगाया जाएगा. वहीं, घरों में भी खीर बनाकर चांदनी में रखने की परंपरा निभाई जाएगी.
धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणें अमृत के समान लाभकारी मानी जाती हैं. इस बार पर्व पर गजकेसरी, लक्ष्मीनारायण और हंस योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि तथा हर्षण योग का संयोग भी बताया जा रहा है. ऐसे में श्रद्धालुओं के लिए यह पर्व पूजा-पाठ, आराधना और धार्मिक आस्था का विशेष अवसर होगा.
शरद ऋतु की सुहानी रात और आसमान में चमकता चंद्रमा, प्रकृति की इसी खूबसूरती के बीच शरद पूर्णिमा मनाया जाता है. भारतीय संस्कृति में इस पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है. मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है, इसलिए इसे वर्ष की सबसे खास चांदनी रातों में गिना जाता है.
भिंड और आसपास के अंचल में शरद पूर्णिमा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है. क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भगवान के शृंगार और भोग की तैयारियां की गई हैं. मंदिरों में वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार भगवान को मेवायुक्त दूध की खीर अर्पित की जाएगी. इसके साथ ही भजन-कीर्तन और शरदोत्सव के आयोजन भी होंगे.
शरद पूर्णिमा की पहचान खीर की परंपरा के बिना अधूरी मानी जाती है. इस अवसर पर घरों में दूध, चावल और मेवों से खीर तैयार की जाती है. रात में इसे चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है.
धार्मिक विश्वास है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में विशेष ऊर्जा होती है. चांदनी में रखी खीर अमृत के समान गुणकारी हो जाती है. इसी आस्था के चलते पीढ़ियों से यह परंपरा निभाई जा रही है.
हालांकि, खीर को चांदनी में रखने से विशेष स्वास्थ्य लाभ होने का वैज्ञानिक प्रमाण स्थापित नहीं है. इसे धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखा जाता है. खीर को स्वच्छ, ढके हुए बर्तन में रखना भी जरूरी है, ताकि वह धूल और कीड़ों से सुरक्षित रहे.
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में चंद्रमा की 16 कलाओं को पूर्णता का प्रतीक माना गया है. शरद पूर्णिमा को इसी पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है. श्रद्धालु चंद्रमा के दर्शन कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं. कई स्थानों पर चंद्रमा को अर्घ्य देने और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा भी है.
वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का प्रकाशित भाग पृथ्वी से लगभग पूरा दिखाई देता है. चंद्रमा सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है. उसकी किरणों को अमृतमयी मानना धार्मिक आस्था का विषय है, लेकिन शरद पूर्णिमा की चांदनी का आकर्षण सदियों से लोगों को अपनी ओर खींचता रहा है.
डॉक्टर हनुमान मंदिर के महंत रामदास महाराज ने बताया कि इस बार शरद पूर्णिमा पर गजकेसरी, लक्ष्मीनारायण और हंस योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि तथा हर्षण योग बनने की ज्योतिषीय गणना बताई गई है. पारंपरिक ज्योतिष में इन योगों को शुभ कार्यों, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अनुकूल माना जाता है.
पंचांग के अनुसार, उन्होंने बताया कि पूर्णिमा तिथि रविवार सुबह 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होकर सोमवार, 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 42 मिनट तक रहेगी. ज्योतिषीय गणना के मुताबिक रविवार शाम 7 बजकर 22 मिनट से चंद्रमा मेष राशि में रहेगा.
श्रद्धालु इस अवसर पर पूजा-अर्चना, दान-पुण्य और भगवान के स्मरण के साथ पर्व मनाएंगे. पूजा और चंद्र दर्शन का समय तय करने के लिए स्थानीय पंचांग तथा मंदिरों की परंपराओं का ध्यान रखना उपयोगी रहेगा.
शरद पूर्णिमा केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक परंपरा भी है. घरों में तैयार होने वाली खीर, मंदिरों में होने वाला भोग और भजन-कीर्तन का माहौल इस पर्व को विशेष बनाता है.
भिंड और आसपास के अंचल में भी श्रद्धालु चंद्रमा के दर्शन, पूजा-अर्चना और प्रसाद के साथ इस पर्व को मनाएंगे. चांदनी रात में आस्था की यह परंपरा एक बार फिर भारतीय संस्कृति की उस विरासत को जीवंत करेगी, जो पीढ़ियों से लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है.
कुल मिलाकर, शरद पूर्णिमा पर अंचल के मंदिरों में विशेष पूजा और खीर के भोग के साथ श्रद्धा का माहौल रहेगा. चंद्रमा की चांदनी, पारंपरिक प्रसाद और धार्मिक आयोजनों के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व आस्था, संस्कृति और प्रकृति के खूबसूरत संगम का प्रतीक है. (रिपोर्टः प्रदीप मिश्रा, भिंड)