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बालाघाट जिले के दक्षिण बैहर में करीब 30 बच्चों की मौत के बाद से पूरे इलाके में सनसनी फैली हुई है. जंगलों-पहाड़ों के बीच में रहने वाले बैगा आदिवासी समुदाय के परिवारों के बच्चों की अचानक मौत ने स्वास्थ्य महकमे के ऊपर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इन बच्चों की मौत के पीछे मलेरिया, मीजल्स जैसी बीमारियां हैं या फिर सिस्टम की नाकामी है. लेकिन सवाल सिर्फ बीमारी का ही नहीं, बल्कि यह भी है कि इतने बच्चों की मौत के बाद भी प्रशासन को भनक तक नहीं लगी, कि बच्चों की मौत कैसे हुई है. स्थानीय स्तर की बात करें, तो कुपोषण, टीकाकरण की कमी, गंदा पानी समेत पोषण आहार की सप्लाई में रुकावट जैसी बातें सामने आई हैं. इससे साफ पता चलता है कि बच्चों की मौत सिर्फ बीमारी से ही नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी की वजह से हुई है.
बताया जाता है कि दक्षिण बैहर का इलाका घने जंगलों और पहाड़ियों के बीचों बीच बसा है. बैहर और उकवा के बीच आने वाले इस इलाके के कई गांवों का संपर्क मानसूनी सीजन में बारिश के चलते कट जाता है. यहां पर डाबरी और पाथरी जैसे गांवों में बारिश के दिनों में पहुंचना काफी चुनौतीपूर्ण माना जाता है. ऐसे में एंबुलेंस या मेडिकल टीमों के समय पर पहुंचने से लेकर इलाज में कमी का भी सवाल खड़ा होता है. बता दें कि इस इलाके में बैगा जनजाति के लोग सबसे ज्यादा रहते हैं, जिसे संवेदनशील जनजातीय समूह यानी PVTG में शामिल किया गया है. इस समुदाय के सामने पोषण सुरक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता भी किसी चुनौती से कम नहीं है.
यहां क्या-क्या चुनौतियां हैं?
1. घने जंगल और पहाड़ी इलाका
2. मानसून में गांवों का संपर्क कटना
3. स्वास्थ्य सेवाओं तक समय पर न पहुंचना
4. पोषण और स्वास्थ्य जागरूकता की कमी
5. कुपोषण की वजह से बच्चों का शरीर कमजोर
वहीं बैहर विधानसभा सीट से विधायक संजय उइके ने बच्चों की मौत की सबसे बड़ी वजह कुपोषण को बताया है. उन्होंने ZEE Media की टीम से कहा कि समय पर बच्चों को सही पोषण आहार नहीं मिल पाया है. उन्होंने आगे बताया कि मार्च महीने से करीब तीन से चार महीने तक पोषण आहार नहीं बांटा गया है. विधायक ने कहा कि मार्च महीने के बाद सीधे अगस्त महीने से दोबारा पोषण आहार बांटा जा रहा है. उन्होंने कहा कि यहां की ज्यादातर आबादी जिस पोषण आहार पर निर्भर है, उसकी सप्लाई ही कई महीनों तक नहीं हुई है. ऐसे में सवाल उठना तो लाजमी है, कि इस दौरान बच्चों की पोषण और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर क्या असर पड़ेगा?
पोषण आहार नहीं दिया गया
1. मार्च से करीब 3-4 महीने तक पोषण आहार नहीं मिला.
2. अगस्त से दोबारा वितरण शुरू किया गया.
3. कुपोषण को मौतों की पहली वजह बताया गया.
4. टीकाकरण पर भी उठे सवाल
आगे भी बैहर विधायक संजय उइके ने बताया कि आदिवासी इलाकों में बच्चों को मिलने वाला पोषण के अलावा, टीकाकरण पर भी सवाल खड़े किए हैं. विधायक का कहना है कि अगर बच्चों को समय पर टीका लग जाता तो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती, जिससे उनका शरीर बीमारियों से लड़ने के लिए सक्षण होता. दक्षिण बैहर में बैगा जनजाति के बच्चों की मौत के मामले में कुपोषण और टीकाकरण को लेकर स्वास्थ्य विभाग पर सवाल खड़े हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि यहां बीमारियों के साथ बच्चों की पहले से मौजूद स्वास्थ्य स्थिति भी सवालों के घेरे में है.
बैहर में क्यों हुई बच्चों की मौत?
हालांकि, डॉक्टरों ने भी बच्चों की मौत की वजह गंदा पानी, कुपोषण और टीकाकरण को माना है. बालाघाट जिला अस्पताल के सिविल सर्जन और शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर निलय जैन का कहना है कि दक्षिण बैहर में बच्चों की मौत गंदे पानी, कुपोषण, टीकाकरण के कारण हो सकती है. उन्होंने बताया कि जब इन बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, तभी से में उनका इलाज कर रहा हूं. उन्होंने आगे बताया कि उस दौरान उन्हें समझ आया कि दूषित पानी, कुपोषण और टीकाकरण नहीं होने की वजह से बच्चों की मौत हुई है. उन्होंने कहा कि अगर इन सभी का खास ध्यान रखा जाता तो, बच्चे बीमार ही नहीं पड़े और न ही इन बच्चों की अचानक मौत होती.
इन कारणों से 30 बच्चों की मौतें
1. गंदा पानी
2. कुपोषण
3. टीकाकरण नहीं होना
4. गंदा पानी और संक्रमण का खतरा
बताया जाता है कि यहां पर झिरिया यानी कच्चे कुएं या झरने के पानी पीने के इस्तेमाल में किया जाता है. ऐसे पानी से डायरिया और पेट के संक्रमण की समस्या जल्दी हो जाती है. अगर बच्चा पहले से कुपोषित है तो संक्रमण से लड़ने की क्षमता भी बहुत कमजोर हो जाती है. इसी वजह से पूरे मामले को एक दुष्चक्र के तौर पर समझा जा रहा है. कुपोषण से इम्युनिटी कमजोर होती है, संक्रमण शरीर को और कमजोर करता है और बीमारी के दौरान पोषक तत्वों की कमी बढ़ सकती है. इसका असर बच्चे की हालत पर पड़ सकता है.
क्या होता है दुष्चक्र?
1. अगर बच्चा पहले से कुपोषित होगा तो उसकी इम्युनिटी कमजोर होगी.
2. इम्युनिटी कमजोर होने से मलेरिया/मीजल्स/डायरिया जैसे संक्रमण हो जाते हैं.
3. मलेरिया/मीजल्स/डायरिया जैसे संक्रमण होने से पोषक तत्वों की कमी हो जाती है.
4. जैसे ही शरीर में पोषक तत्वों की कमी होती है, तो स्थित काफी गंभीर हो जाती है.
मलेरिया की रोकथाम जरूरी?
दक्षिण बैहर मलेरिया के लिहाज से देखा जाए तो यह बहुत ही संवेदनशील इलाका माना जाता है. बारिश के मौसम में मच्छरों का खतरा बढ़ जाता है, ऐसे इलाकों में बारिश शुरू होने से पहले मई-जून में IRS यानी घरों के अंदर कीटनाशक का छिड़काव बहुत जरूरी होता है. LLIN यानी लंबे समय तक असर करने वाली मच्छरदानियों का वितरण भी बहुत जरूरी माना जाता है. अगर दुष्चक्र के हिसाब से देखा जाए, तो यहां सिर्फ बीमारी से बच्चों की मौत नहीं हुई है. बल्कि बीमारी को रोकने के लिए होने वाली तैयारियों पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
महिला बाल विकास विभाग का गोलमोल जवाब
वहीं बच्चों की मौत के कारणों को लेकर जब महिला बाल विकास विभाग के अधिकारी देवेंद्र कुमार सुंदरियाल का कहना है कि THR वहां कुछ महीने नहीं मिला था, लेकिन अब मिलना शुरू हो चुका है. इसके बाद जब उनसे पूछा गया कि बच्चों की मौत की वजह कुपोषण, टीकाकरण या कुछ और है, तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उन्हें इस पर कुछ नहीं कहना है. अधिकारी के इस जवाब के बाद सवाल और गहरा गया है. एक तरफ दक्षिण बैहर में बच्चों की मौत को लेकर कुपोषण, गंदा पानी और टीकाकरण की कमी की बात सामने आ रही है, वहीं विभागीय अधिकारी इस पर कोई स्पष्ट जवाब देने से बच रहे हैं.
क्या होता है THR?
1. THR का मतलब होता है टेक होम राशन
2. THR सप्लाई चेन में रुकावट हुई है.
3. नियमों के मुताबिक, 6 महीने से पहले 3 साल के बच्चों और गर्भवती या धात्री महिलाओं को नियमित रूप से रेडी-टू-ईट पौष्टिक आहार मिलना चाहिए.
4. सप्लाई चेन बंद होने का मतलब है कि कुपोषण अचानक नहीं बढ़ा, बल्कि 3-4 महीनों में बच्चों का न्यूट्रिशिनल रिजर्व पूरी तरह से खत्म हो गया.
इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
दक्षिण बैहर में करीब 30 बच्चों की मौत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन मौतों की असली वजह क्या है? डॉक्टर से लेकर विधायक और तमाम बड़े नेता कुपोषण और टीकाकरण को मुख्य वजह मान रहे हैं. जिला अस्पताल के सिविल सर्जन ने गंदे पानी को भी बता रहे हैं. वहीं महिला बाल विकास विभाग के अधिकारी बच्चों की मौत के कारणों पर कुछ भी कहने से साफ इनकार कर रहे हैं. ऐसे में सवाल सिर्फ मौतों की वजह का नहीं, बल्कि यह भी है कि दुर्गम इलाकों में पोषण, टीकाकरण, साफ पानी और मलेरिया रोकथाम की व्यवस्था कितनी प्रभावी रही?