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दुनिया की सबसे बड़ी हॉस्पिटल ग्रोथ की कहानियों के बारे में जानने के लिए वॉल स्ट्रीट भारत आया. लेकिन उसे कुछ और ही हाथ लगा. झगड़ा इस बात पर कि बिल कौन भरेगा?
EY के डेटा के मुताबिक, पिछले पांच सालों में ब्लैकस्टोन, KKR, TPG, जनरल अटलांटिक और दूसरे ग्लोबल इन्वेस्टर्स ने भारतीय हॉस्पिटल चेन में हिस्सेदारी खरीदने पर लगभग 96,270 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.
इस कैश फ्लो ने नई सुविधाओं, महंगी टेक्नोलॉजी और हॉस्पिटल बेड की भारी कमी वाले देश में कंसोलिडेशन की वेव को फाइनेंस करने में मदद की है. इसने भारत को प्राइवेट-इक्विटी-ऑपरेटेड हॉस्पिटल कंसोलिडेशन के लिए दुनिया के सबसे एक्टिव मार्केट में से एक बना दिया है.
हालांकि PE-सपोर्टेड ऑपरेटर्स के पास देश के हॉस्पिटल बेड का 5% से भी कम हिस्सा है, लेकिन कार्डियक सर्जरी और कैंसर केयर जैसी हाई-मार्जिन वाली स्पेशलिटीज में उनकी अच्छी-खासी मौजूदगी है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, हॉस्पिटल के रेवेन्यू और वैल्यूएशन में भारी इजाफा हुआ है, जिससे कुछ इन्वेस्टर्स को अच्छा रिटर्न मिला है. फिर भी, हेल्थकेयर में प्राइवेट कैपिटल के तेजी से एक्सपेंशन ने टेंशन बढ़ा दी हैं कि इससे लागत बढ़ सकती है और मरीजों की इलाज तक पहुंच कम हो सकती है.
अगस्त में एक संसदीय समिति ने भारत के प्राइवेट हॉस्पिटल बूम के इकोनॉमिक्स पर सवाल उठाए थे. उन्होंने चेतावनी दी थी कि विदेशी पूंजी का बेरोकटोक फ्लो बड़े कॉर्पोरेट समूहों की ओर से किफायती, मध्यम आकार के अस्पतालों के अधिग्रहण को बढ़ावा दे रहा है. समिति ने हेल्थकेयर के लिए विदेशी निवेश नियमों पर पुनर्विचार करने, प्राइस कैप की जांच करने और अस्पतालों के लिए एक रेगुलेटर बनाने की सिफारिश की.
यह आलोचना अस्पतालों और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच बढ़ते तनाव को दिखाती है. इंश्योरेंस कंपनियों का कहना है कि प्राइवेट प्रोवाइडर्स, जिनमें PE-सपोर्टेड चेन भी शामिल हैं, बिल बढ़ा रहे हैं और मरीजों को महंगे इलाज की ओर धकेल रहे हैं. हॉस्पिटल ऑपरेटर्स का कहना है कि इंश्योरेंस कंपनियों की ओर से भुगतान में देरी और नाकाफी रीइम्बर्समेंट रेट्स उनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल रहे हैं.
अमेरिका में, कानून बनाने वाले और इंश्योरेंस कंपनियां सालों से इन्हीं सवालों से जूझ रही हैं. भारत अब यह देखने के लिए एक नया मैदान बन गया है कि क्या प्राइवेट कैपिटल, मरीजों की पहुंच से बाहर किए बिना हेल्थकेयर की ताकत को बढ़ा सकती है?
केरल में कनाटे हॉस्पिटल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की स्टेट यूनिट के पूर्व प्रेसिडेंट जोसेफ बेनावेन ने कहा, 'भारतीय हेल्थकेयर में सबसे बड़ा बदलाव ऑपरेशन थिएटर में नहीं, बल्कि बोर्डरूम में हुआ है. अब अस्पतालों को कैपिटल पर रिटर्न और हर भरे हुए बेड से होने वाली कमाई के आधार पर आंका जा रहा है.'
जब प्राइवेट इक्विटी फर्मों ने इस सेक्टर पर ध्यान देना शुरू किया, तो निवेश का तर्क बहुत मजबूत था. भारत में प्रति 1,000 लोगों पर सिर्फ 1.3 हॉस्पिटल बेड थे, जो कई विकसित देशों की तुलना में बहुत कम थे. साथ ही, आय बढ़ने और औसत उम्र में सुधार के कारण कैंसर के इलाज, दिल की बीमारियों के इलाज और दूसरी स्पेशल सर्विसेज की मांग भी बढ़ रही थी.
ग्लोबल निवेशकों को एक ऐसा इंडस्ट्री दिखा जिसमें शुरुआत में भारी निवेश की जरूरत थी, लेकिन जो लंबे समय तक कैश फ्लो बना सकता था. साथ ही, उन्हें अलग-अलग अस्पतालों का एक बिखरा हुआ नेटवर्क भी दिखा, जिन्हें मिलाकर नेशनल लेवल की चेन बनाई जा सकती थी, जिसमें बेहतर स्पेशलिस्ट सर्विसेज और कैपिटल पर ज्यादा रिटर्न मिल सकता था.
खुद पॉलिसी बनाने वालों ने 2021 में लगभग 600 हॉस्पिटल प्रोजेक्ट्स की पहचान की थी, जिनमें करीब 32 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत थी. इससे हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और मौके के बड़े पैमाने, दोनों का पता चलता है.
जुलाई 2024 में KKR & Co. के बेबी मेमोरियल में निवेश करने से पहले, केरल स्थित यह हॉस्पिटल ऑपरेटर लगभग 1,000 बेड वाला यूनिट था. मामले की जानकारी रखने वाले एक शख्स के अनुसार दो साल के भीतर ही अस्पताल ने अपने टैक्स-पूर्व कमाई के टारगेट को पार कर लिया और वित्त वर्ष 2026 में 6 अरब रुपये (6.26 करोड़ डॉलर) तक पहुंच गया. यह मुख्य रूप से अधिग्रहणों (एक्विजिशन) की वजह से हुआ.
KKR अपने हॉस्पिटल पोर्टफोलियो का एक्सपेंशन कर रहा है. अगस्त में, उसने स्वीडिश हॉस्पिटल चेन मेडिकोवर AB के भारतीय ऑपरेशन्स को 1.4 अरब डॉलर में खरीदने का समझौता किया है. इस डील से दक्षिण भारत में उसके हॉस्पिटल बेड की संख्या लगभग दोगुनी होकर 10,000 हो जाएगी. PE फर्म की हेल्थकेयर स्ट्रैटेजी का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. KKR ने पहले एंटरप्रेन्योर अभय सोई की रेडिएंट लाइफ केयर को सपोर्ट किया था और इसे लिस्टेड मैक्स हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट लिमिटेड के साथ मर्ज करने में मदद की थी. 2022 में मैक्स हेल्थकेयर से इसके एग्जिट को इंडस्ट्री में हॉस्पिटल में किए गए एक कामयाब इन्वेस्टमेंट के तौर पर देखा जाता है.
भारत के विकसित होते कैपिटल मार्केट ने इस मॉडल को खास तौर पर सेंटरप्वॉइंट बना दिया है. पब्लिक लिस्टिंग और सेकेंडरी शेयर बिक्री ने PE फर्मों को पैसे निकालने का साफ रास्ता दिया है, जिससे वे अगले दौर के अधिग्रहण के लिए पूंजी जुटा सकती हैं. दूसरे निवेशकों को भी काफी फायदा हुआ है.
उदाहरण के लिए, टेमासेक होल्डिंग्स (Pte) लिमिटेड ने जुलाई में हॉस्पिटल ऑपरेटर के IPO के दौरान अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेचकर मणिपाल हेल्थ एंटरप्राइजेज लिमिटेड में 2017 में किए गए निवेश पर लगभग 10 गुना रिटर्न कमाया है. भारतीय प्राइवेट मार्केट पर न्यूज और डेटा देने वाली कंपनी VCCircle के मुताबिक, इस निवेश से लगभग 30% का इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (IRR) मिला.
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में भारत में प्राइवेट अस्पतालों का रेवेन्यू 15% तक बढ़ सकता है. इसकी वजह है ज्यादा मरीजों का इलाज करने की उनकी क्षमता और हर भरे हुए बेड से मिलने वाले औसत रेवेन्यू में 7% तक की बढ़ोतरी.
फिर भी, इंडस्ट्री के मजबूत फाइनेंशियल प्रदर्शन ने पॉलिसी बनाने वालों का ध्यान खींचा है, जो इलाज के खर्च को लेकर टेंशन में हैं. संसद की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मेडिकल महंगाई सालाना 13% तक रही है.
जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के हेल्थ इंश्योरेंस इकोसिस्टम और स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप के CEO एस प्रकाश कहते हैं, 'प्राइवेट इक्विटी फंड से मिलने वाले सभी फायदों के बावजूद, हमें इसके लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है.' भारतीय सांसदों की एक समिति के मुताबिक, प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च सरकारी सिस्टम की तुलना में औसतन पांच से 10 गुना ज्यादा होता है. कैंसर के इलाज, दिल के इलाज, किडनी फेलियर और मैटरनिटी सेवाओं में यह अंतर सबसे ज़्यादा देखा जाता है.
बहस इस बात पर भी केंद्रित हो रही है कि किस तरह के इलाज को कवर किया जाना चाहिए. जैसे-जैसे अस्पताल ज्यादा एडवांस्ड और महंगे इलाज की ओर बढ़ रहे हैं, बीमा कंपनियां यह सवाल उठा रही हैं कि क्या कुछ प्रक्रियाओं से इतना क्लिनिकल फायदा मिलता है कि उनके खर्च को सही ठहराया जा सके. हॉस्पिटल ऑपरेटरों का तर्क है कि नई टेक्नोलॉजी, इम्प्लांट और सर्जिकल तकनीकें लागत बढ़ाने के बावजूद बेहतर नतीजे देती हैं.
मई में एक एनालिस्ट कॉल के दौरान, निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर भाबतोष मिश्रा ने कहा कि कवरेज से जुड़े फैसले लेने के लिए बीमा कंपनियों को प्रूफ बेस्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल की जरूरत होती है. उन्होंने कहा कि कुछ रोबोटिक प्रक्रियाओं की लागत पारंपरिक विकल्पों की तुलना में काफी ज्यादा हो सकती है, जबकि उनसे मिलने वाले नतीजे उस अनुपात में बेहतर नहीं होते.
हालांकि, मरीजों के लिए ये अलग-अलग तर्क अक्सर अस्पताल के बिलिंग काउंटर पर टकराते हैं. मुंबई की 40 साल की बिजनेस कंसल्टेंट पूनम ए. ने इस साल की शुरुआत में एक प्राइवेट अस्पताल में रोबोट-असिस्टेड सर्जरी करवाई. उन्हें उम्मीद थी कि उनकी सरकारी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी इस प्रक्रिया का खर्च उठाएगी. उन्होंने एक ऐसी पॉलिसी के लिए सालाना लगभग 21,000 रुपये का प्रीमियम भरा था, जिसमें 15 लाख रुपये का बेस कवरेज मिलता था और साथ ही ऐसे प्रावधान भी थे जिनसे मिलने वाले फायदे को काफी बढ़ाया जा सकता था.
ब्लूमबर्ग के देखे गए क्लेम से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, इसके बजाय इंश्योरेंस कंपनी ने सर्जरी के रोबोटिक हिस्से से जुड़े बिल का पैसा देने से इनकार कर दिया. आखिरकार, पूनम अपनी जेब से बाकी रकम चुकाने के लिए तैयार हो गईं.
एको जनरल इंश्योरेंस के CEO अनिमेष दास ने कहा, 'जब तक इंश्योरेंस कंपनी तस्वीर में आती है, तब तक बीमारी का पता चल चुका होता है, इलाज तय हो चुका होता है और इंश्योरेंस कंपनी के पास ज्यादातर बिल चुकाने का ही काम बचता है. हेल्थकेयर में अब असली लड़ाई इस बात की है कि मरीज के साथ संबंध किसका है.'
इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑप इंडिया ने कैशलेस इलाज और स्टैंडर्ड ऑथराइजेशन प्रक्रियाओं पर नए नियम बनाकर इस टकराव का जवाब दिया है.
फिर भी, दूसरी जगहों के दशकों के अनुभव से पता चलता है कि रेगुलेशन शायद कोई आसान समाधान न दे पाए. यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के व्हार्टन स्कूल के प्रोफेसर लॉटन रॉबर्ट बर्न्स, जिन्होंने अमेरिका और भारत दोनों देशों के हेल्थकेयर सेक्टर्स की स्टडी की है, ने कहा, 'इस बात पर अमेरिका में 50 सालों से बहस चल रही है कि क्या रेगुलेशन हेल्थकेयर की बढ़ती लागत को रोक सकता है या नहीं. इस पर अभी कोई पक्का नतीजा नहीं निकला है। हमें यकीन नहीं है कि रेगुलेशन लागत को असरदार ढंग से कंट्रोल कर सकता है.'