UGC के नियमों की होगी समीक्षा: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने दिया भरोसा, छात्रों के हितों की रक्षा के लिए बन सकती है कमेटी
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह यूजीसी के विवादित नियमों पर नए सिरे से विचार करेगी. सरकार इसके लिए कमेटी भी बना सकती है.
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़े यूजीसी (UGC) के विवादित नियमों पर अब केंद्र सरकार नए सिरे से विचार करेगी. सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि आप इन नियमों पर दोबारा विचार क्यों नहीं करते, ताकि आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रह सके? कोर्ट ने कहा कि नियम ऐसे होने चाहिए जो हर छात्र के हितों की रक्षा करें. इस पर तुषार मेहता ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि सरकार इन नियमों की समीक्षा के लिए कमेटी बनाने पर विचार कर रही है.
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि छात्रों के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए नियमों की समीक्षा के लिए एक विशेष कमेटी के गठन पर विचार चल रहा है, ताकि किसी भी वर्ग में असंतोष या भेदभाव की आशंका न रहे.
विवाद की वजह क्या है?
दरअसल, यूजीसी ने इस साल उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए ये नियम लागू किए थे. इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गई. याचिकाओं में कहा गया था कि जातिगत भेदभाव को दूर करने का दावा करने वाले ये नियम असल में सामान्य वर्ग के साथ जातिगत भेदभाव करने वाले हैं.
इन नियमों में 3(1)(c) के तहत जातिगत भेदभाव की जो परिभाषा दी गई है, वह बेहद संकीर्ण और सीमित है. इस परिभाषा में कहा गया है कि जाति आधारित भेदभाव केवल SC/ST/OBC के साथ होने पर ही माना जाएगा. अगर कोई व्यक्ति इन वर्गों से नहीं है, सामान्य वर्ग से है तो उसके पास शिकायत का कोई मौका नहीं होगा. यही नहीं, इन नियमों की आड़ लेकर सामान्य वर्ग से आने वाले छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ झूठी और दुर्भाग्यपूर्ण शिकायतें भी हो सकती हैं.
SC ने जनवरी में लगाई थी रोक
29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों के अमल पर रोक लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं है, इनका दुरुपयोग हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा था कि ये नियम समाज को बांटने वाले लग रहे हैं. अगर हम दखल नहीं देते हैं तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे और यह समाज को बांटने वाला कदम होगा. कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया था कि वह एक एक्सपर्ट कमेटी बनाए जो नियमों को देखे, ताकि इन्हें ज्यादा संतुलित बनाया जा सके और इनकी भाषा को समावेशी किया जा सके.
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