श्रीनगर के ऐतिहासिक शंकराचार्य मंदिर मार्ग पर बने मजार पर मचा बवाल तो रोका गया काम
जिस मजार पर बवाल मचा है वो शंकराचार्य पहाड़ी रास्ते पर है. कश्मीरी पंडितों ने इसे वन भूमि पर नया अतिक्रमण बताया और 44 लाख के सरकारी फंड पर सवाल उठाए हैं, जबकि ग्रैंड मुफ्ती ने इसे ऐतिहासिक धरोहर बताया है. आइए जानते हैं पूरा मामला...
श्रीनगर में एक पुरानी सूफी दरगाह के रिनोवेशन को लेकर विवाद गरमा गया है. यह दरगाह ऐतिहासिक शंकराचार्य मंदिर के रास्ते पर मौजूद है. जैसे ही इसके रिनोवेशन के लिए सरकारी फंड जारी किया गया तो कश्मीरी पंडित संगठन विरोध में उतर गए. वहीं स्थानीय मुस्लिम समुदाय और मुफ्ती-ए-आजम का कहना है कि यह काफी पुरानी दरगाह है. बढ़ते तनाव को देखते हुए प्रशासन ने फिलहाल काम रोक दिया है और जमीन के रिकॉर्ड की जांच के लिए एक राजस्व टीम भी बना दी है
दरअसल, यह पूरा मामला श्रीनगर के शंकराचार्य मंदिर के रास्ते से जुड़ा है. मंदिर से करीब 4 किलोमीटर पहले सूफी दरगाह और मजार है, जिसकी मरम्मत के लिए करीब 44 लाख का सरकारी फंड जारी हुआ था. इस पर अब बवाल मच गया है. कश्मीरी पंडित संगठनों और कुछ सियासी पार्टियों से लेकर स्थानीय मुस्लिम समाज और धर्मगुरुओं तक, सभी की इस पर बेहद तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं.
कश्मीरी पंडित संगठनों का विरोध
'सेव शारदा कमेटी' और 'धर्मार्थ ट्रस्ट' समेत दूसरे कश्मीरी पंडित संगठनों ने इस प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध किया है. उनका दावा है कि जिस जगह यह कब्रिस्तान रातों-रात सामने आया बताया जा रहा है, वो सोशल फॉरेस्ट्री विभाग की जमीन है. उनका कहना है कि जो लोग भी यहां से मंदिर जाते हैं, उन्होंने पहले इस जगह कभी कोई मजार नहीं देखी थी.
संजय सराफ ने क्या कहा?
कश्मीरी पंडित और लोक जनशक्ति पार्टी के नेता संजय सराफ ने कहा, 'हम सभी जानते हैं कि यह शंकराचार्य पहाड़ी है और वहां किसी को पता भी नहीं था कि कहीं कोई मजार है. हाल ही में वहां एक बोर्ड लगा, मैंने उसे पहले नहीं देखा था. लेकिन इस बार जब धर्मार्थ ट्रस्ट के लोग मेरे पास आए, तो वे मुझे अपने साथ ले गए और मेरे साथ 8-10 और लोग भी गए. जब हम अंदर गए, लगभग आधा किलोमीटर अंदर, तो हमने सच में वहां एक छोटी सी मजार देखी.'
संजय सराफ ने आगे कहा, 'मैं खुद सूफीवाद को मानने वाला हूं. मैं दस्तगीर साहब की मजार, मखदूम साहब की मजार, बाबा ऋषि की मजार, माता खीर भवानी, टिकर, अमरनाथ जी बाबा, माता हरि पर्वत और शारिका माता, हम हर जगह जाते हैं. इसलिए, हम ऐसी किसी चीज का विरोध नहीं कर रहे हैं. लेकिन एक बात बिल्कुल साफ है, अगर वहां इसका कोई उचित रिकॉर्ड है, तो यह सरकार को देखना है. कम से कम हम कश्मीरी लोग तो ऐसी किसी चीज का विरोध नहीं करते हैं. हां, हम चाहते हैं कि एक उचित प्रक्रिया का पालन हो. अगर किसी प्रक्रिया के तहत वहां कोई मजार है, तो हम उसे क्यों रोकें? हमने कोई विवाद खड़ा नहीं किया है और न ही हम ऐसी किसी चीज का विरोध करते हैं. कश्मीर में हमारे लिए मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे सब एक समान हैं. अगर सरकार को लगता है कि सब कुछ ठीक है, तो हम विरोध क्यों करेंगे?'
44.37 लाख रुपये के फंड पर BJP ने खड़े किए सवाल
इस मामले में सियासत भी तेज हो गई है. बीजेपी नेताओं ने कानूनी नियमों, पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियों और सड़क-भवन विभाग की ओर से जारी 44.37 लाख रुपये के फंड पर सीधे सवाल खड़े किए हैं. उनका आरोप है कि यह अतिक्रमण है और इसके जरिए प्राचीन हिंदू धरोहर के आसपास के धार्मिक स्वरूप को बदलने की साजिश रची जा रही है.
भाजपा की जम्मू-कश्मीर इकाई के मुख्य प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कहा, 'जहां तक हमें पता है, वहां पिछले 40 वर्षों से एक कब्र मौजूद थी. हमें उससे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जिस तरह से और कब्रें बनाई गईं, निर्माण कार्य किए गए और जिस तरह से वहां हरे कपड़े डालकर अतिक्रमण किया गया है हम उस अतिक्रमण का विरोध करते हैं. हमें इस बात पर भी आपत्ति है, क्योंकि दुनिया भर में शंकराचार्य मंदिर जाना जाता है और दूर-दूर से यहां लोग आते हैं. अब सवाल यह है कि यह अतिक्रमण किस आधार पर किया जा रहा है, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं और इसके पीछे क्या मकसद है?'
अल्ताफ ठाकुर ने टेंडर पर उठाए सवाल
अल्ताफ ठाकुर ने मांग करते हुए कहा कि जिन अधिकारियों ने इस टेंडर पर हस्ताक्षर किए हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए. उन्होंने दावा किया, 'नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कोई एनओसी (NOC) नहीं दी है और चूंकि यह वन भूमि है, वन विभाग ने भी कोई एनओसी नहीं दी है. तो फिर आप किस आधार पर 40 लाख रुपये से अधिक की धनराशि आवंटित कर रहे हैं?'
अल्ताफ ठाकुर ने कहा 'चाहे यह किसी धर्म से जुड़ा हो, किसी व्यक्ति से या किसी अन्य से, अतिक्रमण तो अतिक्रमण ही होता है, और गलत हमेशा गलत ही होता है. हम किसी भी गलत काम का समर्थन कभी नहीं कर सकते. मंदिर और मस्जिद, हमारे लिए सब एक समान हैं. हम 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' और सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान में विश्वास रखने वाले लोग हैं, हमें इससे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन जिस अवैध तरीके से यह अतिक्रमण किया गया है और रास्ता रोकने की कोशिश की गई है, भारतीय जनता पार्टी उस पर सवाल उठा रही है.' उन्होंने सत्ताधारी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया कि 'यह नेशनल कॉन्फ्रेंस की बहुत पुरानी साजिश है. अपने घोषणापत्र में उन्होंने कहा था कि वे शंकराचार्य को सुलेमान टेंग में बदल देंगे, भारतीय जनता पार्टी ऐसा कभी नहीं होने देगी.'
मुस्लिम समुदाय और मुफ्ती-ए-आजम का पक्ष
दूसरी ओर इलाके के मुस्लिम समुदाय के लोगों और कुछ स्थानीय इतिहासकारों का कहना है कि यह दरगाह सदियों पुरानी है. वे इसे एक सूफी संत से जोड़ते हैं, जो हजरत मीर सैयद अली हमदानी (अमीर-ए-कबीर) के समय में कश्मीर आए थे. हजरत अमीर-ए-कबीर को घाटी में बड़े पैमाने पर इस्लाम के प्रचार-प्रसार का श्रेय दिया जाता है. जम्मू-कश्मीर के ग्रैंड मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम ने इसे 'बेवजह का दखल' बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई है. उन्होंने इस जगह को 'आस्तान-ए-आलिया' कहा, यानी एक प्राचीन सूफी संत से जुड़ी बेहद पवित्र दरगाह. उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसी जगहों को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
जम्मू-कश्मीर के मुफ्ती-ए-आजम, मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम ने कहा, 'मैं पिछले 50 सालों से इस रास्ते पर आ-जा रहा हूं, कई बार गया हूं और हमने हमेशा वहां दो कब्रें देखी हैं. एक कब्र सैयद असदुल्लाह बुखारी साहब की है और दूसरी सैयद उस्मान साहब की. वे हजरत अमीर-ए-कबीर साहब के समकालीन थे और उन्होंने उनकी शिक्षाओं और उपदेशों को आगे बढ़ाया. असल में इसका शंकराचार्य से कोई लेना-देना नहीं है, यह वन भूमि है. यहां बेवजह का मुद्दा बनाया जा रहा है, जबकि उपराज्यपाल (LG) प्रशासन के जरिए दरगाह को बेहतर करने के लिए फंड दिया गया था. इसका मकसद सिर्फ नया निर्माण करना नहीं है, बल्कि वे कह रहे हैं कि इसे बेहतर बनाया जा रहा है और इसके पुराने ढांचे को बहाल कर रहे हैं, क्योंकि यह प्राचीन धरोहरों में से एक है. मेरी राय में जिस तरह हमारे हिंदू भाई जम्मू में सतवारी या गांधी नगर की मुस्लिम दरगाहों पर जाते हैं, उसी तरह उन्हें यहां भी जाना चाहिए. इससे उनके दिलों में भी सम्मान और आदर की भावना पैदा होगी और उन्हें इसे जाहिर भी करना चाहिए. इस दरगाह का अपना एक इतिहास है और उस इतिहास को कायम रखा जाना चाहिए. मेरी नजर में किसी भी धार्मिक कार्य में दखल नहीं देना चाहिए और अगर हम ऐसा करते हैं, तो जाहिर है कि इसे कोई भी बर्दाश्त नहीं करेगा.'
स्थानीय लोगों का क्या कहना है?
दरगाह की देखरेख करने वालों और आस-पास के निवासियों ने जमीन पर कब्जे के आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. वे इस जगह को 'आस्तान-ए-आलिया सैयद उस्मान साहिब' के रूप में पहचानते हैं. उनका कहना है कि यह सदियों पुराना कब्रिस्तान है, जहां हजरत सैयद उस्मान साहिब और हजरत सैयद असदुल्लाह साहिब की मजारें मौजूद हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि यहां जो काम किया जाना है, वह केवल पुरानी दरगाह की मरम्मत और जीर्णोद्धार तक सीमित है. यह दरगाह पहले घने जंगलों की वजह से मुख्य सड़क से दिखाई नहीं देती थी, शायद इसीलिए कुछ राहगीरों को लगा कि यह कोई नया ढांचा है. उन्होंने यह भी बताया कि यहां हर साल जनवरी के मध्य में एक हफ्ते तक सूफी संत का उर्स भी दशकों से मनाया जाता रहा है.
प्रशासन ने रोका काम
बढ़ते तनाव और कुछ सामाजिक-धार्मिक संगठनों के आग्रह के बाद प्रशासन ने फिलहाल निर्माण कार्य अस्थायी तौर पर रोक दिया है. राजस्व विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह जमीन के रिकॉर्ड की जांच करे, मालिकाना हक की पुष्टि करे और यह पता लगाए कि कहीं किसी वन या पर्यावरण कानून का उल्लंघन तो नहीं हुआ है. आगे की कार्रवाई इसी जांच रिपोर्ट के आधार पर तय होगी.
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