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लद्दाख की बंजर जमीन उगलेगी 'लाल सोना'! जहां हरियाली उगाना मुश्किल, वहां 30 दिन में खिल उठे केसर के फूल

जम्मू-कश्मीर को अब केसर की खेती में जल्द ही चुनौती मिल सकती है, क्योंकि उसके पड़ोसी केंद्र शासित राज्य लद्दाख ने इस दिशा में एक शानदार कामयाबी हासिल की है.

लद्दाख की बंजर जमीन उगलेगी 'लाल सोना'! जहां हरियाली उगाना मुश्किल, वहां 30 दिन में खिल उठे केसर के फूल
Image Credit: Ai की मदद से बनाई गई तस्वीर

लद्दाख की बंजर जमीन अब जल्द ही 'लाल सोना' उगलने वाली है. जिस जमीन पर हरियाली उगाना चुनौती माना जाता है, वहां अब एक ऐसा फूल खिला है कि पूरे लद्दाख की किस्मत पलट सकती है. लद्दाख के लेह में बंजर जमीन पर केसर की खेती का ऐसा प्रयोग हुआ है, जिसने वैज्ञानिकों और किसानों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं. यहां केसर के फूल महज 30 दिनों में खिल गए.

लद्दाख के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने बताया है कि लेह में बंजर हो चुकी जमीन को फिर से उपजाऊ बनाकर वहां शुरू की गई केसर की खेती में रिकॉर्ड 30 दिनों के भीतर ही फूल खिलने लगे हैं. आमतौर पर, केसर के पहले फूल खिलने में दो महीने का समय लगता है. उन्होंने बताया कि प्रायोगिक खेत के निरीक्षण के दौरान केसर के पहले फूल देखे गए. यह इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए एक अहम पड़ाव है और केंद्र शासित प्रदेश में ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में खेती की संभावनाओं को उजागर करता है

वीके सक्सेना के जरिए दी गई जानकारी के मुताबिक, यहां हर दिन लगभग 20 से 25 केसर के फूल खिल रहे हैं, जबकि एक सुबह तो 72 फूल देखे गए. सिर्फ चार दिनों में लगभग 22 ग्राम शुद्ध केसर की पैदावार हुई है, जो इस प्रायोगिक खेती के शुरुआती नतीजों को काफी उत्साहजनक बनाती है.

90000 केसर के कंद रोपे गए

'द ट्रिब्यून' ने एक आधिकारिक प्रवक्ता के हवाले से बताया,'इस परियोजना के तहत लगभग 90000 केसर के कंदों की रोपण प्रक्रिया शुरू की गई है, जिनका कुल वजन लगभग 800 किलोग्राम है. यह जमीन, जो पहले बंजर थी, उपराज्यपाल के मार्गदर्शन में हाल ही में पुनर्जीवित और उपजाऊ बनाई गई है.

अगर आगे के परीक्षणों में भी ऐसे ही नतीजे मिलते हैं, तो यह पहल केसर की खेती के विस्तार का रास्ता खोल सकती है. इससे इस क्षेत्र में व्यावसायिक खेती, कृषि-आधारित उद्यमिता और आजीविका के नए मौके पैदा हो सकते हैं. इस विकास से लद्दाख की स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की उम्मीदें भी जगी हैं. इससे खेती से जुड़ी गतिविधियों में विविधता आएगी, इनकम के नए स्रोत बनेंगे और एक आत्मनिर्भर क्षेत्र बनाने के विजन को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी.

लद्दाख के लिए क्यों अहम है यह खबर?

यह खबर इसलिए अहम है, क्योंकि भारत में केसर की खेती का सबसे बड़ा केंद्र जम्मू-कश्मीर है. देश के कुल केसर उत्पादन में जम्मू-कश्मीर की हिस्सेदारी करीब 90 फीसदी बताई जाती है. जम्मू-कश्मीर के केसर को 2020 में GI टैग मिला था. इससे इसकी क्षेत्रीय पहचान और प्रामाणिकता को मान्यता मिली. अब लद्दाख में भी इसकी खेती की संभावना तलाश की जा रही है. अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो वहां के किसानों के लिए कम जमीन में अधिक मूल्य वाली फसल उगाने का नया रास्ता खुल सकता है.

लद्दाख का इलाका बहुत ठंडा, ऊंचाई वाला और शुष्क है. यहां पारंपरिक खेती की अपनी बंदिशें हैं. ऐसे में केसर जैसी महंगी फसल उगाने की कोशिश खेती के नए विकल्प तलाशने का उदाहरण है. हालांकि, अभी इसे व्यावसायिक सफलता नहीं कहा जा सकता. क्योंकि यह पायलट प्रोजेक्ट है. इसके लिए कई मौसमों की पैदावार, गुणवत्ता, लागत और किसानों की कमाई का आकलन जरूरी होगा.

1 किलो केसर के लिए 1.5 लाख फूलों की जरूरत

केसर बाजारों में बहुत महंगा बिकता है, क्योंकि इसको उगाना भी उतना ही मुश्किल काम है. एक जानकारी के मुताबिक, केसर के हर फूल में सिर्फ तीन लाल धागे जैसे हिस्से (Stigmas) होते हैं. इन्हीं को हाथ से निकालकर सुखाया जाता है. एक किलो सूखा केसर तैयार करने के लिए लगभग 1.5 लाख फूलों की जरूरत पड़ सकती है.

कश्मीर में केसर के फूल आमतौर पर अक्टूबर के आखिरी हफ्ते से नवंबर के मध्य तक खिलते हैं. फूल आने का पूरा दौर करीब 2-3 हफ्ते चल सकता है, हालांकि, मौसम के हिसाब से इसमें बदलाव होता है. यानी किसान को साल में एक तय समय के दौरान ही फूलों की कटाई करनी होती है.

कश्मीर में केसर की खती में आई कमी

दक्षिण कश्मीर का पंपोर केसर की खेती के लिए मशहूर है. यहां की खेती और केसर की क्वॉलिटी इसे अलग पहचान देती है. जम्मू-कश्मीर में केसर का उत्पादन 2023-24 में 23.53 मीट्रिक टन था, जो 2024-25 में घटकर 19.58 मीट्रिक टन रह गया. यानी करीब 17 फीसदी की गिरावट.

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About the Author

Tahir Kamran

Tahir Kamran

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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