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ग्रीन बूट ऑफ माउंट एवरेस्ट: आखिर 30 साल बाद सुलझा रहस्य, एक लाश जो दशकों से कर रही अपनों का इंतजार

माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करने वाले पर्वतारोही आम तौर पर ग्रीन बूट्स के नाम से परिचित होते हैं. कई पर्वतारोही एवरेस्ट फतह करने से पहले इस जगह से भी गुजरते हैं. हालांकि, करीब 30 साल बाद ग्रीन बूट ऑफ एवरेस्ट की गुत्थी सुलझ गई है. आइए आपको इसके बारे में बताते हैं...

Written By abhinav tripathi
Published: Oct 15, 2026, 11:58 AM IST | Updated: Oct 15, 2026, 12:08 PM IST
Image Credit: ग्रीन बूट ऑफ माउंट एवरेस्ट की मिस्ट्री सॉल्व.
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माउंट एवरेस्ट को दुनिया की सबसे ऊंची और खतरनाक चोटी में से एक है. हर साल बड़ी संख्या में पर्वतारोही इस चोटी को फतह करने के लिए चढ़ाई करते हैं, लेकिन काफी कम ही इस मिशन को पूरा कर पाते हैं. पहली बार 29 मई 1953 को दो लोगों ने दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी को फतह किया था. इसके बाद से लोगों में इस पर्वत पर चढ़ने की उत्सुकता काफी बढ़ गई.

दरअसल, इस चोटी पर चढ़ना जितना मुश्किल है, उससे कहीं अधिक मुश्किल यहां वापस सुरक्षित नीचे आना. ऐसे में कई बार नीचे उतरने के लोगों की दौरान मौत हो जाती है और उनका शव नीचे लेकर आना मुश्किल हो जाता है. कुछ ऐसी ही घटना 1996 में यानी करीब 30 साल पहले एवरेस्ट पर घटी थी, जब एक भीषण तूफान में 8 लोगों की जान चली गई थी. उसके बाद से ग्रीन बूट ऑफ माउंट एवरेस्ट का नाम काफी चर्चा में आया.

ग्रीन बूट ऑफ माउंट एवरेस्ट क्या है?

इस दौरान तिब्बत की ओर से चढ़ाई करने वाले तीन भारतीय पर्वतारोही भी लापता हो गए थे. उनमें से एक का शव पिछले तीस सालों से शिखर के करीब 300 मीटर नीचे बर्फ में दबा है. चमकीले जूते के कारण पर्वतारोही पीढ़ियों से इस शख्स को ग्रीन बूट्स के नाम से जाना जाता है. हाल में ही एक गुप्त अभियान के दौरान शेरपाओं की टीम ने उसका डीएनए सैंपल लेकर इस रहस्य को सुलझा दिया है. उनकी पहचान उत्तरी भारत के दोरजे मोरुप के रूप में हुई. वह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल में तैनात थे.

47 साल की उम्र में वह इस हादसे का शिकार हुए और उस वक्त से उनका शव वहीं पर पड़ा रहा. पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार की ओर से एक जोखिम भरे मिशन की शुरुआत की गई और उनके शव को डेथ जोन से वापस लाने की तैयारी शुरू की जा रही है.

शव को वापस लाना बना चुनौती

इस बीच जानकार मानते हैं कि करीब 3 दशक से बर्फ के नीचे दबे शव को वापस लाना एक बड़ी चुनौती है. यह किसी इंपॉसिबल मिशन से कम नहीं है. अधिकारी यह भी बताते हैं कि एक शव को लाने के लिए कई लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है. ऐसे में अन्य किसी विकल्प पर फोकस किया जा रहा है.

कहा जाता है डेथ जोन

गौरतलब है कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई करीब 8848 मीटर के करीब है. इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन का स्तर काफी कम हो जाता है. ऐसे में जो भी यहां पर चढ़ाई करता है उसके दिमाग और फेफड़ों की नसें फटने का खतरा होता है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि सबसे अधिक मौतें 8000 मीटर के ऊपर वाले हिस्से में होती है. यही कारण है इस क्षेत्र को डेथ जोन के नाम से भी जाना जाता है.

रिपोर्ट्स बाताती है कि साल 2019 तक चढ़ाई के दौरान करीब 308 पर्वतारोहियों की मौत हुई थी. ऐसे में इतनी ऊंचाई से शव लाना काफी मुश्किल होता है. यही कारण है कि पर्वतारोही शवों को वहीं छोड़ आते हैं. यहां पर तापमान -16 से -40 डिग्री सेल्सियस के करीब होता है. यह एक डीप फ्रीजर काम करता है, इस कारण शव सड़ते नहीं हैं. 

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About the Author

अभिनव त्रिपाठी जी न्यूज हिंदी में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं।  पत्रकारिता के क्षेत्र में 3 साल से अधिक समय का अनुभव रखते हैं। डेस्क पर रियल टाइम की देश-विदेश की खबरों को कवर करते हैं। राष्ट्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय खबरों को लिखना पसंद है। वैश्विक घटनाक्रम के किसी भी जटिल मुद्दे को आसान भाषा में समझाना अच्छी तरीके से आता है। इससे पहले जागरण डॉट कॉम के साथ सब एडिटर के तौर पर काम कर चुके हैं।  करियर की शुरुआत एक सैटेलाइट चैनल से की थी। पत्रकारिता की पढ़ाई काशी विद्यापीठ वाराणसी से की है। 
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