जम्मू-कश्मीर: NC में कैबिनेट विस्तार के बाद बगावत! उमर अब्दुल्ला सरकार पर संकट, 3 नवंबर पर टिकी सबकी नजरें
JKNC Internal Rift: जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) कैबिनेट विस्तार के बाद अंदरूनी कलह तेज. क्या उमर अब्दुल्ला सरकार पर मंडरा रहा है संकट? 3 नवंबर की अहम बैठक पर टिकी सबकी नजरें.
जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) में इस समय सियासी भूचाल आया हुआ है. पार्टी के पहले कैबिनेट विस्तार के बाद से भीतर का असंतोष खुलकर सामने आ गया है. जहां एक तरफ वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने पार्टी की नींद उड़ा दी है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस मौके पर सरकार को घेरने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है. उमर अब्दुल्ला की सरकार को मजबूत करने के लिए हाल ही में कैबिनेट का विस्तार किया गया था, लेकिन यह कदम पार्टी के लिए गले की फांस बनता दिख रहा है. आइए जानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की असल वजह क्या है और आने वाले दिनों में इसके क्या मायने हो सकते हैं.
मंत्रियों के चयन से पार्टी के कई दिग्गज नेता और कार्यकर्ता बेहद नाराज हैं. विरोध जताने वाले प्रमुख चेहरों में सात बार के विधायक मुबारक गुल, अब्दुल मजीद लारमी, नजीर गुरेजी, हिलाल अकबर लोन और अर्जुन सिंह राजू शामिल हैं. इन नेताओं के समर्थकों ने सड़कों और सोशल मीडिया पर खुलकर मोर्चा खोल दिया है. उनका सीधा आरोप है कि पार्टी आलाकमान ने सिर्फ उन्हीं लोगों को तरजीह दी है जो अब्दुल्ला परिवार के करीबी हैं. वहीं, उन वफादार नेताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया, जिन्होंने दशकों तक जमीन पर मेहनत करके पार्टी को सींचा था.
बीजेपी का बड़ा हमला और 3 नवंबर का अल्टीमेटम
इस अंदरूनी कलह का फायदा उठाने में बीजेपी पूरी तरह जुट गई है. बीजेपी (जम्मू-कश्मीर) के मुख्य प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने दावा किया है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के 16 से 17 विधायक पार्टी से नाराज चल रहे हैं और यह नाराजगी अब किसी से छिपी नहीं है. अल्ताफ ठाकुर ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा है कि श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह 3 नवंबर को पार्टी और अपनी लोकसभा सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे देंगे.
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उनके मुताबिक, यह दिन जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बहुत बड़ा तूफान लेकर आएगा और रुहुल्लाह के साथ कई अन्य नेता भी पार्टी छोड़ सकते हैं. इसके अलावा, बीजेपी ने क्षेत्रीय भेदभाव का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया है. उनका कहना है कि मैदानी इलाकों से एकमात्र मंत्री को हटाए जाने के बाद जम्मू क्षेत्र पूरी तरह प्रभावी प्रतिनिधित्व से वंचित हो गया है. साथ ही, पुलवामा, बांदीपोरा और शोपियां जैसे अहम जिलों के कार्यकर्ताओं को भी लगता है कि उनके साथ नाइंसाफी हुई है.
पार्टी का डैमेज कंट्रोल और नेताओं की सफाई
बगावत की इन खबरों के बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. एक तरफ जहां पार्टी के नेता इसे महज 'मीडिया का शोर' बताकर खारिज कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ डैमेज कंट्रोल की कोशिशें भी शुरू हो चुकी हैं. अल्ताफ अहमद कालू (वन मंत्री): इनका कहना है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है. कभी-कभार छोटे-मोटे मतभेद या नारे लग जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसे बहुत बड़ा संकट मान लिया जाए. उन्होंने यह भी कहा कि वे खुद नाराज नेताओं, लारमी साहब, नजीर साहब और बशीर साहब से मिलने उनके निर्वाचन क्षेत्रों में जाएंगे.
सलमान सागर (हजरतबल से विधायक): उनका मानना है कि यह सब विपक्ष की चाल है जो स्थानीय मीडिया के जरिए फैलाई जा रही है. उन्होंने कहा कि हम एक परिवार हैं और अपनों को शिकायतें रखने का हक है, जिन्हें नेतृत्व बातचीत से सुलझा लेगा. पार्टी को कमजोर करने की कोई भी साजिश कामयाब नहीं होगी. इसके बावजूद, मुबारक गुल, अब्दुल मजीद लारमी और हिलाल लोन जैसे वरिष्ठ नेताओं की खामोशी बहुत कुछ कह रही है. भले ही वे खुद खुलकर मीडिया के सामने आने से बच रहे हैं, लेकिन उनके समर्थकों का गुस्सा साफ तौर पर पार्टी पर दबाव बना रहा है.
3 नवंबर: पार्टी के लिए लिटमस टेस्ट
नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए आने वाली 3 नवंबर की तारीख बहुत अहम होने वाली है. अगर श्रीनगर के सांसद आगा रुहुल्लाह सचमुच पार्टी छोड़ते हैं और उनके साथ कुछ नाराज विधायक भी पाला बदलते हैं, तो सत्ता में वापसी के बाद से यह पार्टी के लिए सबसे बड़ा आंतरिक संकट साबित होगा. अब्दुल्ला परिवार ने इतिहास में कई बड़े सियासी तूफानों का डटकर मुकाबला किया है, लेकिन इस बार यह चुनौती घर के भीतर से ही उठ रही है. रुहुल्लाह का अगला कदम क्या होगा और यह बगावत किस मोड़ पर जाएगी, यह न सिर्फ नेशनल कॉन्फ्रेंस का भविष्य तय करेगा, बल्कि आने वाले महीनों में जम्मू-कश्मीर की पूरी राजनीतिक दिशा को भी गहराई से प्रभावित करेगा.
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