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ड्रोन अब सिर्फ आसमान में उड़ने वाली मशीन नहीं रह गए हैं. आधुनिक युद्ध में इनका इस्तेमाल निगरानी से लेकर टारगेट की पहचान और हमले तक के लिए किया जा रहा है. यही वजह है कि ड्रोन की तकनीक जितनी एडवांस हो रही है, उनसे जुड़े साइबर और इलेक्ट्रॉनिक खतरे भी उतने ही गंभीर होते जा रहे हैं. कल्पना कीजिए कि किसी सैन्य ड्रोन के भीतर ऐसा सॉफ्टवेयर या इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मौजूद हो, जिसकी मदद से किसी बाहरी ताकत को उस सिस्टम तक पहुंच मिल जाए.
युद्ध के मैदान में ऐसी छोटी-सी खामी भी बड़ा नुकसान कर सकती है. इसी खतरे को देखते हुए भारतीय सेना ने एक खास पहल शुरू की है. चीन में बने या चीन से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट को लेकर दुनिया के कई देशों में सुरक्षा संबंधी चिंताएं पहले से रही हैं. ऐसे में भारतीय सेना के लिए अपने ड्रोन सिस्टम की डिजिटल सुरक्षा को परखना काफी अहम माना जा रहा है.
दिल्ली कैंट में तैयार हुई खास AASHVAST लैब
भारतीय सेना ने दिल्ली कैंट में AASHVAST नाम की एक विशेष लैब स्थापित की है. इसका पूरा नाम Assessment and Analysis of Electronic Systems Hardware for Vulnerabilities and Security Threats है. इस लैब का मकसद सैन्य ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की गहराई से जांच करना है. खास तौर पर यह पता लगाने की कोशिश होगी कि किसी ड्रोन में ऐसा इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट या डिजिटल सिस्टम तो मौजूद नहीं है, जो सुरक्षा के लिहाज से संदिग्ध हो.
सिर्फ कैमरा और इंजन नहीं, असली खेल सॉफ्टवेयर का भी
किसी ड्रोन की क्षमता केवल उसके इंजन, कैमरे या बाहरी ढांचे से तय नहीं होती. उसके भीतर लगा फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर और फर्मवेयर भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है. यही सिस्टम यह तय करता है कि ड्रोन किस तरह उड़ान भरेगा, उसे कौन-से कमांड मानने हैं और किसी तकनीकी समस्या या GPS से जुड़ी गड़बड़ी की स्थिति में उसका व्यवहार कैसा होगा. AASHVAST लैब में इसी डिजिटल हिस्से की बारीकी से जांच की जाएगी. जरूरत पड़ने पर ड्रोन के फ्लाइट कंट्रोलर या कैमरा पेलोड से सॉफ्टवेयर निकाला जाएगा और उसके कोड तथा सिस्टम का तकनीकी विश्लेषण किया जाएगा.
कहीं छिपा हुआ रास्ता तो नहीं?
जांच के दौरान इस बात पर भी ध्यान दिया जाएगा कि ड्रोन के सिस्टम में कोई छिपा हुआ एक्सेस प्वाइंट तो मौजूद नहीं है. मसलन, क्या उसमें कोई हिडन पासवर्ड है? क्या कोई एम्बेडेड सिक्योरिटी-की ऐसी है, जिसका इस्तेमाल अनधिकृत तरीके से किया जा सकता है? क्या सिस्टम में कोई सीक्रेट कमांड पाथ या रिमोट एक्सेस का रास्ता मौजूद है? ऐसी खामियां अगर किसी सैन्य ड्रोन में मौजूद हों तो उन्हें समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है. क्योंकि युद्ध की स्थिति में दुश्मन सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि डिजिटल रास्तों से भी हमला करने की कोशिश कर सकता है.
सॉफ्टवेयर अपडेट की भी होगी जांच
AASHVAST में ड्रोन के सॉफ्टवेयर अपडेट सिस्टम को भी परखा जाएगा. यह देखा जाएगा कि ड्रोन केवल अधिकृत निर्माता के सॉफ्टवेयर अपडेट को स्वीकार करता है या फिर किसी दूसरे स्रोत से आए सॉफ्टवेयर को भी सिस्टम में इंस्टॉल किया जा सकता है. यह जांच इसलिए अहम है क्योंकि किसी सैन्य प्लेटफॉर्म में अनधिकृत सॉफ्टवेयर पहुंच जाना आगे चलकर सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है.
GPS जाम या स्पूफ हुआ तो ड्रोन क्या करेगा?
आधुनिक ड्रोन के सामने GPS spoofing और jamming जैसी चुनौतियां भी हैं. जामिंग की स्थिति में GPS सिग्नल कमजोर या बाधित किया जा सकता है, जबकि spoofing के जरिए ड्रोन को गलत लोकेशन की जानकारी देने की कोशिश की जा सकती है. AASHVAST के जरिए यह भी जांचा जाएगा कि ऐसी परिस्थितियों में ड्रोन का सुरक्षा सिस्टम किस तरह प्रतिक्रिया करता है. क्या वह गलत सिग्नल को पहचान पाता है या नहीं और GPS से जुड़ी गड़बड़ी होने पर ड्रोन का व्यवहार कितना सुरक्षित रहता है.
युद्ध में डिजिटल कमजोरी की कोई गुंजाइश नहीं
भारतीय सेना के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले समय में युद्ध का मैदान जमीन और आसमान तक सीमित नहीं रहने वाला. साइबर स्पेस और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी किसी सैन्य अभियान की सफलता या विफलता में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे में AASHVAST जैसी लैब का काम केवल किसी एक ड्रोन की जांच तक सीमित नहीं माना जा सकता. इसका बड़ा उद्देश्य सैन्य ड्रोन में मौजूद डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक कमजोरियों को पहचानना और उन्हें ऑपरेशनल इस्तेमाल से पहले दूर करना है.
यानी अब भारतीय सेना ड्रोन को सिर्फ इस नजर से नहीं देखेगी कि वह कितनी ऊंचाई तक उड़ सकता है या कितनी दूर तक निगरानी कर सकता है. उसकी पूरी डिजिटल कुंडली भी खंगाली जाएगी, ताकि आसमान में उड़ रहा कोई सैन्य ड्रोन खुद भारत की सुरक्षा के लिए खतरा न बन जाए.