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Threat Facing India Rare Toda Buffaloes: आप भैंसों का दूध तो रोज ही पीते होंगे. लेकिन क्या आप भारत में पाई जाने वाली उन दुर्लभ भैंसों के बारे में जानते हैं, जो सैकड़ों किमी दूरी तमिलनाडु की नीलगिरी पहाड़ियों में ही पाई जाती हैं. बेहद खास और अनूठी प्रजाति में शामिल ये नस्ल है- ‘टोडा भैंस’ (Toda Buffalo). अपनी विशिष्ट शारीरिक बनावट के कारण यह भैंस अन्य मवेशी प्रजातियों से बिल्कुल अलग दिखती है. इसके अर्ध-गोलाकार सींग होते हैं और शरीर पर लंबे बाल होते हैं.
अब इन स्वदेशी दुर्लभ प्रजाति की भैंसों में एक अनोखी घटना सामने आई है, जिसने वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और पशु अनुसंधानकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है. इस घटना के बाद से वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों में इन भैंसों के संरक्षण की मांग तेज हो गई है. लोगों का कहना है कि आधुनिक समय के बदलावों और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच इनकी संख्या लगातार चिंताजनक रूप से घट रही है. जिसे रोकने के लिए तुरंत इंतजाम किए जाने चाहिए. आइए, आज आपको भारत की इन दुर्लभ भैंसों के सामने आए संकट के बारे में विस्तार से बताते हैं. इससे पहले आपको इन भैंसों की खासियतों की बारे में बता देते हैं.
टोडा भैंस कोई आम मवेशी नहीं है, बल्कि यह नीलगिरि की प्रसिद्ध आदिवासी जनजाति ‘टोडा’ (Toda Tribe) की संस्कृति, परंपरा और आजीविका का एक अभिन्न हिस्सा है. भैंस की यह प्रजाति विशेष रूप से इसी भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाती है. टोडा जनजाति के लोग सदियों से इन भैंसों को पालते आ रहे हैं. उनका पूरा सामाजिक और धार्मिक जीवन इन मवेशियों के इर्द-गिर्द घूमता है. टोडा समुदाय में इन भैंसों को बेहद पवित्र माना जाता है. उनके पारंपरिक अनुष्ठानों, डेयरी उत्पादों और लोक-कथाओं में टोडा भैंसों का केंद्रीय स्थान होता है.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, दरअसल हाल ही में एक टोडा भैंस के बछड़े में असामान्य रंग-रूप (संदिग्ध अल्बिनिज्म) के लक्षण नजर आए हैं. अल्बिनिज्म वह आनुवंशिक स्थिति होती है, जिसमें शरीर में पिगमेंट (मेलिनन) की कमी या अनुपस्थिति के कारण त्वचा, बाल और आंखों का रंग सफेद या बेहद हल्का हो जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के दुर्लभ आनुवंशिक लक्षण छोटे और सिमटते हुए जीन पूल की ओर इशारा करते हैं.
उनका कहना है कि जब किसी प्रजाति की आबादी बहुत कम रह जाती है और इनब्रीडिंग बढ़ने लगती है, तो ऐसे दुर्लभ और अप्रत्याशित आनुवंशिक बदलाव सामने आने की संभावना बढ़ जाती है. यही वजह है कि टोडा भैंसों का अस्तित्व आज कई गंभीर खतरों से घिरा नजर आ रहा है.
इन दुर्लभ भैंसों की प्रजाति के खतरे में पड़ने की कई वजहें भी हैं. पहली वजह ये है कि नीलगिरि के पारंपरिक घास के मैदानों का लगातार क्षरण हो रहा है, जो इन भैंसों का मुख्य चरने का स्थान हुआ करता था. दूसरी वजह ये है कि अन्य बाहरी मवेशी नस्लों के आने और संकरण के कारण इस शुद्ध स्वदेशी नस्ल के शुद्धता खतरे में पड़ गई है. तीसरी और बड़ी वजह ये है कि टोडा समुदाय की बदलती जीवनशैली और आर्थिक प्राथमिकताओं के कारण नई पीढ़ी इस पारंपरिक पशुपालन से दूर होती जा रही है.
इस घटना के सामने आने के बाद पर्यावरण प्रेमी और पशु विज्ञान के जानकार परेशान हैं. उनका कहना है कि टोडा भैंसों की वर्तमान आबादी, स्वास्थ्य, आनुवंशिक विविधता और निवास स्थलों का व्यापक स्तर पर वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए. ऐसा नहीं करने पर नीलगिरि की यह अनमोल जैविक धरोहर हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में खो सकती है.
पर्यावरणविद कह रहे हैं कि नीलगिरि की पहाड़ियों की गोद में पलने वाली टोडा भैंस केवल पशु नस्ल नहीं है, बल्कि यह भारत की समृद्ध जैव विविधता और प्राचीन आदिवासी संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी हैं. ऐसे में उस बछड़े में पाए गए अल्बिनिज्म के संदिग्ध लक्षण को चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए. उन्होंने मांग की है कि सरकार, अनुसंधान संस्थान और स्थानीय समुदाय मिलकर इस विलुप्त होती नस्ल को बचाने के लिए कोई ठोस योजना तैयार करें. जिससे टोडा भैंसों को विलुप्त होने से बचाया जा सके.