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भविष्य की जंग के लिए भारत की बड़ी तैयारी! बनाने जा रहा स्पेस कमांड, दुश्मन के सैटेलाइट से लेकर मिसाइल तक होंगे निशाने पर

India Space Command News: भविष्य की जंग के लिए भारत बड़ी तैयारी में जुटा है! इसके लिए वह स्पेस कमांड बनाने जा रहा है. उसके निशाने पर दुश्मन के सैटेलाइट से लेकर मिसाइल तक होंगे.

Written By Devinder Kumar
Published: Sep 28, 2026, 10:43 PM IST | Updated: Sep 28, 2026, 10:50 PM IST
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Why India Establishing Space Command? दुनिया भर में युद्ध का स्वरूप, जंग का तरीका बदल रहा है. मिसाइल, टैंक और फाइटर जेट्स जैसे महंगे हथियारों की बजाय छोटे-छोटे ड्रोन ज्यादा विनाशक साबित हो रहे हैं. इन आधुनिक हथियारों के साथ जंग का चौथा मोर्चा भी बहुत जल्द एक्टिव होने वाला है. वो मोर्चा है अंतरिक्ष का, जिसमें जंग लड़ने की क्षमता दुनिया के दस देश हासिल कर चुके हैं.

भारत बनने जा रहा दुनिया का 11वां स्पेस पावर

तो क्या अंतरिक्ष में जंग लड़ने वाला 11वां देश भारत बनने वाला है? क्या भारत अपनी स्पेस फोर्स जल्द बनाने वाला है? इसकी पुष्टि डीआरडीओ यानी रक्षा अनुसंधान संगठन और डीएसए यानी डिफेंस स्पेस एजेंसी जैसी संस्थाओं की तैयारियों  से होती है. युद्ध के बदलते स्वरूप को देखते हुए भारतीय स्पेस और रक्षा एजेंसियों ने अपनी अंतरिक्ष कमान बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं.

आखिर कैसी होगी भारत की अंतरिक्ष कमान? इस पूरे मिशन का मकसद क्या होगा. इसमें किस तरह के सैटेलाइट, सर्विलांस सिस्टम और हथियारों का इस्तेमाल होगा? इन सवालों के जवाब बेहद अहम हैं, क्योंकि अमेरिका ने अभी हाल ही में एलान किया है कि उसने अंतरिक्ष में सीक्रेट हथियार तैनात कर रखे हैं. चीन और रूस पहले ही ऐसा कर चुके हैं तो इस दिशा में भारत की तैयारी कितनी अहम है?

आज के जी स्पेशल में समझिए- भारत की अंतरिक्ष कमान से जुड़े हर सवाल का जवाब. आज की दुनिया में ये कमान क्यों जरूरी है और इसमें चुनौतियां कैसी है. क्योंकि युद्ध के पारंपरिक तीन मोर्चे अब किसी जंग में निर्णायक साबित नहीं हो रहे. यूक्रेन और रूस के बीच 5 साल से जंग चल रही है. ईरान-अमेरिका का युद्ध भी 7 महीने लंबा खींच गया. तो सवाल है कि जंग का चौथा मोर्चा- अंतरिक्ष- जब एक्टिव होगा, तो जंग की सूरत क्या होगी?

पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे 600 टोही सैटेलाइट

आज की तारीख तक स्पेस में 600 से ज्यादा सैन्य और टोही सैटेलाइट धरती की परिक्रमा कर रहे हैं. इनमें अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों का दबदबा है. इनमें से हर सैटेलाइट एक चलता-फिरता हथियार है, जो ना सिर्फ दुश्मन देशों के सैटेलाइट को मार गिरा सकता है, बल्कि जमीन से लॉन्च किये जाने वाले इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों को गाइड कर सकता है.

हालांकि भारत ये कारनामा 7 साल पहले ही दिखा चुका है. ओडिशा के द्वीप पर 27 मार्च 2019 को भारत ने आसमान को चीरती हुई मिसाइल भेजी थी. ये मिसाइल डीआरडीओ के मिशन शक्ति का पहली प्रयोग थी. इसका निशाना 300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित भारत के एक निष्क्रिय सैटेलाइट को ध्वस्त करना था. आसमान में 28 हजार किमी की रफ्तार से उड़ते हुए इस विस्फोटक हीन मिसाइल ने 3 मिनट के भीतर टारगेटेड सैटेलाइट को मार गिराया.

मिसाइल ने 3 मिनट के भीतर माइक्रोसैट को गिराया!

डीआरडीओ की बनाई ये वही मिसाइल थी, जिसने भारत को दुनिया की चौथा स्पेस पावर बना दिया. यानी एक ऐसा देश, जो जमीन से ही किसी दुश्मन देश का सैटेलाइट गिरा सकता है. अब भारत की ओर से सात साल बाद पूरी स्पेस कमांड बनाने की तैयारी है. ये कमांड भारत की दूरदर्शी योजना का अहम हिस्सा है.

मिशन शक्ति के तहत अगले तीन साल में भारत 52 सैटेलाइट अंतरिक्ष में लॉन्च करने वाला है, जो सैन्य इस्तेमाल और सर्विलांस से जुड़े होंगे. हालांकि स्पेस मिशन में कौन-सा देश किस सैटेलाइट का इस्तेमाल किस मकसद के लिए कर रहा है, ये बेहद गोपनीय होता है. इसलिए किसी भी देश के बारे में ठीक ठीक कहना मुनासिब नहीं कि किसके पास कितने सैन्य सेटैलाइट हैं? उसी तरह की गोपनीयता अंतरिक्ष में सैन्य कमांड को लेकर भी बरती जाती है. हालांकि भारत के मामले में कुछ चीजें साफ हैं. भारत का अंतरिक्ष कमांड पूरी तरह सेना के अधीन होगा.

जिस दिन अंतरिक्ष में भारत के 52 सैन्य और टोही सैटेलाइट तैनात होंगे, उस दिन भारत दुनिया के चुनिंदा देशों में से एक होगा, जो धरती पर जंग की दिशा और नतीजा स्पेस से बदल सकता है. इस प्रोजेक्ट में इसरो 21 सैटेलाइट बनाएगा, वहीं बाकी 31 सैटेलाइट प्राइवेट कंपनियां बनाएंगी. यह पहली बार है जब किसी भारतीय मिलिट्री स्पेस प्रोग्राम में प्राइवेट सेक्टर का इतना बड़ा योगदान होगा. जब ये सैटेलाइट काम करना शुरू कर देंगे, तो डिफेंस स्पेस एजेंसी इनकी ऑपरेशनल कमांड संभालेगी.

अंतरिक्ष में भारत की सैन्य कमांड

ये सैटेलाइट अलग-अलग ऑर्बिट्स में घूमेंगे, जैसे लो-अर्थ से जियो स्टेशनरी पोजीशन तक, जिससे महत्वपूर्ण इलाकों की पूरी कवरेज मिलेगी. ये सैटेलाइट मिशन शक्ति का एक हिस्सा है. यह तीनों सेनाओं की संयुक्त कमान होगी, जिसका नेतृत्व थल सेना करेगी.
सेना के लेफ्टिनेंट जनरल स्तर का अधिकारी कमान का नेतृत्व करेगा. टीम में मेजर जनरल स्तर के पांच अधिकारी रहेंगे. उनके समकक्ष वायुसेना के तीन और नौसेना के दो अधिकारी शामिल होंगे.

इस कमान का काम उपग्रहों के जरिए रियल टाइम निगरानी करना होगा. जिससे पता चल पाए कि पड़ोसी या दुश्मन देश के अंदर क्या गतिविधियां चल रहीं है और सीमा पर वह किस तरह की हरकतें कर रहा है. कमान का तीसरा काम दुश्मन के उपग्रहों की गतिविधियों पर नजर रखना होगा. चौथा काम हमला करना और सैटेलाइट को नष्ट करना होगा. अंतरिक्ष कमान आधुनिक तकनीक वाली मिसाइल और ड्रोन सिस्टम को नष्ट करेगी.

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, अंतरिम अंतरिक्ष कमान का एलान जल्द हो सकता है. बाद में जरूरी सुधारों के साथ उसे स्थायी बनाया जाएगा. फिलहाल तीनों सेनाओं में इन कार्यों के लिए अभी अलग यूनिट हैं. ये सभी भविष्य में अंतरिक्ष कमान के अधीन आ जाएंगी.

अंतरिक्ष में ताकत क्यों बढ़ा रहा भारत?

स्पेस के सैन्य इस्तेमाल पर भारत की ये तैयारी इसलिए अहम है, क्योंकि अमेरिका ने अभी हाल ही में ये कहकर पूरी दुनिया में सनसनी मचा दी थी कि उसने अंतरिक्ष में मिलिट्री सैटेलाइट के साथ हथियार भी तैनात कर रखे हैं. ये दावा, बाकायदा अमेरिका के डिफेंस सेक्रेट्री की तरफ से किया गया. इस दावे के साथ अमेरिका ने ये भी आरोप लगाया था कि चीन और रूस जैसे देश स्पेस को चौथे वॉर फ्रंट के रूप में कभी भी इस्तेमाल कर सकते हैं. खासतौर पर रूस, जो अंतरिक्ष में बड़ी सैन्य ताकत है.

अभी कुछ महीने पहले डॉनल्ड ट्रंप से एक सवाल पूछा गया था, कि रूस ईरान को सीक्रेट सेटेलाइट से मदद पहुंचा रहा है, तब ट्रंप ने कहा था, कि अगर ऐसा है, तो मैं ये बात खुद पुतिन से पूछ लूंगा. यानी ट्रंप को पता है, पुतिन उनसे मुकाबले के लिए किस हद तक जा सकते हैं. वो चाहे जमीन की जंग हो या फिर स्पेस वॉर. पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी होने के नाते अमेरिका की नजर हमेशा से ही रूस के स्पेस प्रोग्राम पर रही है. इसे लेकर अमेरिका की तरफ से अलग दावे भी किये जाते रहे हैं.

अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भी युद्ध का हिस्सा मानता है. यानी आगे कोई बड़ी जंग हुई, तो उसमें पुतिन स्पेस वेपन का इस्तेमाल कर सकते हैं. अमेरिका ने रूस के कुछ सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है. अमेरिका का दावा है, रूस एक बड़ी तकनीक पर काम कर रहा है. इस तकनीक से दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सकता है. अमेरिका को रूस की ओर से अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने की संभावित तैयारी का भी डर है.

अमेरिकी स्पेस फोर्स ने स्पेस वेपन होने की बात क्या इसीलिए अभी कुबूल की, ताकि रूस को ये बताया जा सके कि एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाने वाले स्पेस वेपन उसके पास भी है? या फिर स्पेस में चीन की बढ़ती ताकत के सामने ये जताना, कि स्पेस वेपन हमारे भी तैनात हैं.

क्या अपनी संधि से मुकर रहा अमेरिका?

हालांकि स्पेस वेपन और अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती को लेकर 1960 के दशक में एक बड़ी संधि हो चुकी है. इस पर अमेरिका, तब के सोवियत संघ और ब्रिटेन ने साइन किए थे. संधि का मकसद था- अंतरिक्ष को परमाणु और दूसरे विनाशक हथियारों की तैनाती से बचाना. लेकिन आज देखिए, अमेरिका खुद अपने स्पेस वेपन की तैनाती की बात कर रहा है और रूस- चीन जैसे देशों के साथ स्पेस वॉर की आशंका जता रहा है. अगर ऐसा हुआ, तो ये जंग सिर्फ आसमान में नहीं होगी, धरती पर भी बड़ी विनाशलीला मचेगी.

एक सीन की कल्पना कीजिए. कल को अगर अंतरिक्ष में अमेरिका, रूस या चीन के बीच सैन्य टकराव होता है, तो क्या होगा. इसका उसका असर सिर्फ सेनाओं और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा. इससे हमारी और आपकी रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित होगी, चाहे हम दुनिया के किसी भी हिस्से में रहते हों.

स्पेस वॉर से जमीन पर विनाशलीला

स्पेस से नियंत्रित किए जाने वाले मिसाइल को रोकना मुश्किल होगा. स्पेस से दुनिया के किसी भी हिस्से में दुश्मन के टारगेट को तबाह किया जा सकता है. दुश्मन देश के सैटेलाइट्स को कुछ सेकेंड्स में तबाह किया जा सकता है. धरती की कक्षा में मौसम, जीपीएस और कम्यूनिकेशन के कई सैटेलाइट नष्ट हो सकते हैं. GPS सिस्टम कंट्रोल वाली सैटेलाइट नष्ट होने से पूरा ट्रांसपोर्ट और ट्रैकिंग सिस्टम ध्वस्त हो जाएगी. बैंकिंग और दूसरे वित्तीय कामों में भी कम्युनिकेशन के लिए सैटेलाइट सेवा बाधित हो सकती है.

स्पेस वॉर से होने वाली इस विनाशलीला को आप कुछ ऐसे समझ सकते हैं, अगर ऐसे में अगर बड़ी संख्या में सैटेलाइट नष्ट कर दिए जाएं, तो ना आपका मोबाइल काम करेगा ना इंटरनेट और ना ही कोई दूसरा कम्यूनिकेशन नेटवर्क. नेविगेशन से लेकर मौसम की जानकारी जैसी जरूरी सूचनाओं के बिना दुनिया कैसी होगी इसकी कल्पना ही डराने वाली है.

यानी अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य ताकत का मामला नहीं है. अगर अंतरिक्ष में बड़ा टकराव होता है तो उसका असर दुनिया भर के आम लोगों तक पहुंच सकता है. 
 

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About the Author

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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