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भारत की 'Fusion क्रांति' शुरू! PRAGYA ने बनाया प्लाज्मा, अब 2030 में बड़ा धमाका

भारत के परमाणु संलयन रिएक्टर 'प्रज्ञा' (PRAGYA) ने पहली बार प्लाज्मा बनाकर इतिहास रचा है. जानिए क्या इस कृत्रिम सूरज से दुनिया को प्रदूषण-मुक्त और असीमित बिजली मिल सकेगी.

Written By Ravindra Pratap Singh
Published: Sep 09, 2026, 06:03 PM IST | Updated: Sep 09, 2026, 07:08 PM IST
Image Credit: भारत में फ्यूजन रिसर्च को मिली नई रफ्तार, प्राइवेट कंपनी ने टोकामक में बनाया पहला प्लाज्मा
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भारत में न्यूक्लियर फ्यूजन को लेकर प्राइवेट सेक्टर की सक्रियता बढ़ती दिख रही है. बेंगलुरु की स्टार्टअप प्रनोस फ्यूजन ने अपने टोकामक PRAGYA में पहली बार प्लाज्मा तैयार किया है. कंपनी के लिए यह एक अहम शुरुआती कामयाबी है. भारत में फ्यूजन रिसर्च में सरकारी संस्थानों के साथ अब निजी कंपनियां भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.

PRAGYA पर आने वाले समय में लगातार प्रयोग किए जाएंगे. इन प्रयोगों से बड़ी मात्रा में डेटा जुटाने की योजना है. आगे चलकर इसी डेटा का इस्तेमाल बड़े और ज्यादा एडवांस फ्यूजन रिएक्टरों की तकनीक को बेहतर बनाने में किया जा सकता है. ऐसे में PRAGYA पर होने वाले आने वाले प्रयोग यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं कि प्रनोस फ्यूजन अपने 2030 के बड़े लक्ष्य की तरफ कितनी तेजी से आगे बढ़ती है.

आठ महीने में तैयार हुआ PRAGYA

करीब 40 सेंटीमीटर रेडियस वाला PRAGYA टोकामक लगभग आठ महीने में तैयार किया गया है. हालांकि, अभी इसका मकसद बिजली पैदा करना नहीं है. इसे एक टेस्ट मशीन के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा. इस मशीन पर प्लाज्मा को कंट्रोल करने, उसकी निगरानी करने और फ्यूजन से जुड़ी अलग-अलग तकनीकों को जांचने का काम होगा. इसलिए PRAGYA को नेट एनर्जी गेन रिएक्टर समझना सही नहीं होगा. फिलहाल यह रिसर्च और टेस्टिंग के लिए तैयार किया गया प्लेटफॉर्म है.

PRAGYA को लंबे समय तक चलाने की तैयारी

कंपनी की योजना PRAGYA को करीब 20 साल तक चलाने की है. इस दौरान हर साल लगभग 3,000 प्लाज्मा शॉट लेने का लक्ष्य रखा गया है. इसका मतलब है कि रोजाना करीब 10 से 12 बार प्लाज्मा बनाकर उससे जुड़ी जानकारी जुटाने की कोशिश की जाएगी. फ्यूजन रिसर्च में इस तरह का डेटा काफी काम आता है. इससे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को यह समझने में मदद मिलती है कि प्लाज्मा को ज्यादा स्थिर और बेहतर तरीके से कैसे नियंत्रित किया जाए.

क्या होता है टोकामक?

टोकामक एक खास तरह की मशीन है, जिसमें बेहद गर्म प्लाज्मा को चुंबकीय क्षेत्र की मदद से नियंत्रित किया जाता है. फ्यूजन के लिए गैस को बहुत ज्यादा गर्म किया जाता है. तापमान बढ़ने पर गैस प्लाज्मा में बदल जाती है. इसके बाद छोटे परमाणु नाभिकों को आपस में जोड़कर ऊर्जा हासिल करने की कोशिश की जाती है. सूरज में भी ऊर्जा बनने के पीछे फ्यूजन की यही प्रक्रिया काम करती है. लेकिन धरती पर इसे दोहराना आसान नहीं है. सबसे बड़ी चुनौती बेहद गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित रखना और उससे लगातार ऊर्जा हासिल करने की तकनीक विकसित करना है.

PRAGYA पर क्या-क्या टेस्ट होंगे?

PRAGYA पर शुरुआती काम प्लाज्मा को बेहतर तरीके से कंट्रोल करने पर होगा. इसके अलावा टोकामक के डिजाइन, प्लाज्मा कंट्रोल सिस्टम और उसकी निगरानी से जुड़ी तकनीकों को भी जांचा जाएगा. प्रनोस फ्यूजन हाई टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग यानी HTS मैग्नेट पर भी काम कर रही है. फ्यूजन मशीनों में इन मैग्नेट की अहम भूमिका हो सकती है. इनकी मदद से मजबूत चुंबकीय क्षेत्र तैयार किया जाता है, जो गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित रखने में काम आता है. लगातार होने वाले प्रयोगों से कंपनी को काफी डेटा मिलने की उम्मीद है. आगे यही जानकारी फ्यूजन रिएक्टर की डिजाइन और दूसरी तकनीकों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है.

2030 तक बड़े रिएक्टर का प्लान

PRAGYA को प्रनोस फ्यूजन अपने बड़े लक्ष्य की तरफ एक शुरुआती कदम मान रही है. कंपनी की योजना 2027 तक HTS मैग्नेट को चालू करने की है. इसके बाद 2030 तक PraniQ नाम का नेट एनर्जी गेन रिएक्टर बनाने का लक्ष्य रखा गया है. आसान भाषा में समझें तो नेट एनर्जी गेन का मतलब ऐसी स्थिति से है, जहां फ्यूजन से मिलने वाली ऊर्जा, प्रक्रिया को चलाने में लगाई गई ऊर्जा से ज्यादा हो. हालांकि, यह फिलहाल कंपनी का लक्ष्य है. इसे हासिल करने के रास्ते में कई तकनीकी चुनौतियां हैं. साथ ही PRAGYA खुद नेट एनर्जी गेन रिएक्टर नहीं है. इसका मौजूदा काम रिसर्च और नई तकनीकों की टेस्टिंग करना है.

नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों पर भी नजर

प्रनोस फ्यूजन सिर्फ मशीन और तकनीक विकसित करने पर ध्यान नहीं दे रही है. कंपनी PRAGYA के जरिए फ्यूजन वैज्ञानिकों और प्लाज्मा फिजिसिस्ट की नई पीढ़ी तैयार करने की भी योजना बना रही है. लंबे समय तक चलने वाले प्रयोगों से छात्रों और रिसर्चर्स को फ्यूजन तकनीक को करीब से समझने का मौका मिल सकता है. उन्हें वास्तविक मशीन पर प्रयोग करने और प्लाज्मा से जुड़ी समस्याओं को समझने का अनुभव भी मिलेगा.

अभी शुरुआत है, असली परीक्षा आगे

PRAGYA में पहली बार प्लाज्मा बनना निश्चित तौर पर एक अहम शुरुआत है. लेकिन फ्यूजन की दुनिया में सिर्फ प्लाज्मा बना लेना ही अंतिम कामयाबी नहीं है. आगे यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि कंपनी प्लाज्मा को कितनी देर और कितनी स्थिरता से नियंत्रित कर पाती है. इसके साथ ही प्रयोगों से मिले डेटा को वह कितनी तेजी से अगली तकनीक में बदल पाती है. 
 

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About the Author

रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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