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Analysis: क्या भारत बदलते मौसम के लिए तैयार है?

भारत में मौसम अब सिर्फ मौसम नहीं रहा. यह अर्थव्यवस्था है, खेती है, शहरों की व्यवस्था है, गरीब की रोजी है और सरकार की तैयारी की परीक्षा भी है.

Analysis: क्या भारत बदलते मौसम के लिए तैयार है?
Image Credit: Zee Archive With Creative

सितंबर 2026 में देश एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है. कहीं बारिश कम है, कहीं बादल फट रहे हैं, कहीं खेत पानी मांग रहे हैं तो कहीं वही पानी खेत बहा ले जा रहा है.

बदलते मौसम की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अब समस्या सिर्फ सूखा या बाढ़ नहीं है, मौसम का अनिश्चित और अप्रत्याशित होना सबसे बड़ी समस्या बन गया है.

अभी बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवात अर्नब के प्रभाव और पश्चिमी विक्षोभ के साथ उसके मेल के कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश सहित कई राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बनी.  

जबकि सितंबर के शुरुआती दिनों में भारत में बारिश सामान्य से 26 प्रतिशत कम रही थी और पूरे मानसून सीजन में कमी करीब 15 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.

यानी एक ही देश में एक तरफ बारिश की कमी है तो दूसरी तरफ कुछ इलाकों में अचानक अत्यधिक बारिश हो रही है.

सूखे और बाढ़ का दोहरा संकट

बारिश का आंकड़ा सिर्फ मौसम विभाग की फाइल में दर्ज संख्या नहीं है. इसके पीछे किसान की फसल, गांव का तालाब, शहर का जलाशय और रसोई का बजट छिपा होता है.

2026 के कमजोर मानसून ने पहले ही खरीफ फसलों को लेकर चिंता पैदा की है. सितंबर की बारिश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यही मिट्टी में नमी और रबी की अगली फसल की तैयारी को प्रभावित करती है. कमजोर मानसून का असर जलाशयों और ग्रामीण मांग पर भी पड़ सकता है.

दूसरी तरफ जब कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होती है तो हमारी कमजोर शहरी और ग्रामीण आधारभूत संरचना उसकी कीमत वसूलती है. नाले भरते हैं, सड़कें टूटती हैं, पुल डूबते हैं, नदियां खतरे के निशान के ऊपर जाती हैं और खेतों में खड़ी फसल पानी में समा जाती है.

2025 ने चेतावनी दी, 2026 अगली कड़ी

भारत मौसम विज्ञान विभाग के 2025 के जलवायु आकलन को देखें तो तस्वीर मामूली नहीं है. 2025 में भारत का औसत भूमि सतह तापमान 1991-2020 के औसत से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक था और वह 1901 से उपलब्ध रिकॉर्ड में आठवां सबसे गर्म साल रहा. 2024 इससे भी अधिक गर्म था.

लेकिन तापमान की कहानी सिर्फ गर्मी तक सीमित नहीं है.

मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 2025 में देशभर में अलग-अलग चरम मौसम घटनाओं के कारण करीब 2,760 लोगों की मौत हुई. इनमें भारी बारिश, बाढ़, बादल फटना और भूस्खलन से ही 1,370 से ज्यादा मौतें दर्ज हुईं. बिजली गिरने और आंधी-तूफान ने भी 1,310 से ज्यादा जानें लीं.

इन आंकड़ों को पढ़कर सवाल उठना चाहिए कि अगर चरम मौसम घटनाएं हर साल हजारों जानें ले रही हैं तो हमारी आपदा तैयारियां केवल घटना के बाद राहत पहुंचाने तक ही क्यों सीमित नजर आती हैं?

आपदा प्रबंधन का सबसे महंगा मॉडल वही है जिसमें सरकार पहले नुकसान होने देती है और फिर मुआवजा देती है.

सस्ता और प्रभावी मॉडल वह है जिसमें खतरे की पहचान पहले हो, चेतावनी समय पर मिले, संवेदनशील आबादी को निकाला जाए, बिजली-पानी-स्वास्थ्य और संचार व्यवस्था के वैकल्पिक इंतजाम पहले से हों और स्थानीय प्रशासन को यह पता हो कि किस इलाके में किस स्तर का जोखिम है.

अल नीनो की बदलती कहानी

अल नीनो की बदलती प्रकृति पहले से अधिक कीमत वसूल रही है.  औद्योगिक युग से पहले की तुलना में आज अल नीनो की घटनाएं 36 प्रतिशत से अधिक मजबूत हो चुकी हैं और पिछले चार दशकों में उनकी तीव्रता में 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है.

इसका भारत के लिए महत्व बहुत बड़ा है क्योंकि भारतीय कृषि अब भी मानसून पर भारी निर्भरता रखती है. एक आंकड़े के अनुसार,  देश की करीब 70 प्रतिशत वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से आती है और लगभग आधी कृषि योग्य भूमि वर्षा पर सीधे निर्भर है.

यहां सावधानी जरूरी है. हर बाढ़ या हर सूखे को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बता देना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा. स्थानीय भूगोल, नदी तंत्र, भूमि उपयोग, शहरीकरण, वनों की स्थिति, जल निकासी और मौसम की प्राकृतिक परिवर्तनशीलता भी महत्वपूर्ण हैं.

लेकिन इतना स्पष्ट है कि गर्म होती दुनिया में जोखिम का स्वरूप बदल रहा है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 2025 की एशिया रिपोर्ट के अनुसार एशिया का औसत तापमान 1991-2020 के औसत से 0.96 डिग्री सेल्सियस ऊपर था.

इसी रिपोर्ट के मुताबिक 1991 से 2025 के बीच एशिया की वार्मिंग वैश्विक भूमि-समुद्र औसत की तुलना में तेज रही. भारत के तट के पास समुद्र-स्तर वृद्धि की दर भी लगभग 4.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष बताई गई है.

इसका अर्थ साफ है कि भारत को एक साथ गर्मी, बाढ़, सूखा, समुद्र-स्तर वृद्धि, हिमालयी जोखिम और कृषि संकट से निपटने की तैयारी करनी होगी.

मौसम की चेतावनी काफी नहीं

भारत ने मौसम पूर्वानुमान और शुरुआती चेतावनी प्रणाली में काफी प्रगति की है. राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण यानी एनडीएमए का कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल (सीएपी) आधारित राष्ट्रीय चेतावनी तंत्र एसएमएस, मोबाइल एप, ब्राउजर नोटिफिकेशन और अन्य माध्यमों से लक्षित चेतावनी पहुंचाने के लिए बनाया गया है लेकिन अगली छलांग यहीं से शुरू होती है.

किसी जिले को यह बताना कि ‘भारी बारिश होगी’ पर्याप्त नहीं है. उसे यह बताना होगा कि कौन सी सड़क बंद होगी, कौन सा पुल जोखिम में है, कौन से गांव खाली कराने हैं, कौन से स्कूल बंद होंगे और किन इलाकों में बिजली आपूर्ति पहले सुरक्षित करनी है.

विश्व मौसम संगठन भी अब ‘मौसम पूर्वानुमान’ से आगे बढ़कर ‘प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान’ पर जोर देता है यानी सिर्फ यह नहीं कि मौसम कैसा होगा बल्कि यह कि उस मौसम का लोगों और बुनियादी ढांचे पर क्या असर पड़ेगा. यही बदलाव भारत के लिए निर्णायक हो सकता है.

समस्या जमीन पर ज्यादा

असम में 2026 की बाढ़ पर वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन के अध्ययन ने एक महत्वपूर्ण बात सामने रखी. वहां बाढ़ का जोखिम केवल बारिश से नहीं बना था. ब्रह्मपुत्र की भौगोलिक संरचना, नदी में जमा गाद, बदलते चैनल और अत्यधिक संवेदनशील आबादी ने खतरे को बढ़ाया. यानी प्रकृति खतरा पैदा करती है लेकिन मानव बस्तियां उस खतरे को आपदा में बदलती हैं.

केरल के वायनाड में 2024 के भूस्खलन पर हुए अध्ययन ने भी दिखाया कि अत्यधिक बारिश के पीछे जलवायु परिवर्तन की भूमिका हो सकती है लेकिन नुकसान की भयावहता में जमीन का उपयोग, संवेदनशील ढलान और आबादी का जोखिम भी महत्वपूर्ण है.

अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण वहां भारी एक-दिवसीय बारिश की तीव्रता लगभग 10 प्रतिशत बढ़ी थी जबकि वैश्विक स्तर पर ऐसी चरम बारिश की घटनाएं 1980 के बाद से 17 प्रतिशत अधिक तीव्र हुई हैं.

इसलिए समाधान केवल कार्बन उत्सर्जन घटाने की वैश्विक बहस में नहीं है. भारत को अपनी रणनीति जमीन पर उतारनी होगी.

शहरों के मास्टर प्लान में बाढ़ के नक्शे अनिवार्य हों. प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर निर्माण की समीक्षा हो. नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण को लेकर नियम कागज से बाहर निकलें.

पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और निर्माण परियोजनाओं का जोखिम आकलन मजबूत हो. जलाशयों और बांधों के संचालन में मौसम पूर्वानुमान को ज्यादा महत्व मिले. और सबसे जरूरी हर जिले का अपना ‘क्लाइमेट रिस्क प्लान’ हो.

पूरी व्यवस्था को बदलना होगा

जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण मंत्रालय का विषय मानना सबसे बड़ी भूल होगी. यह वित्त मंत्रालय का विषय है क्योंकि आपदाएं सार्वजनिक खर्च बढ़ाती हैं. यह कृषि मंत्रालय का विषय है क्योंकि फसल प्रभावित होती है.

यह स्वास्थ्य मंत्रालय का विषय है क्योंकि गर्मी और बाढ़ बीमारियां बढ़ाती हैं. यह शहरी विकास का विषय है क्योंकि शहरों की जल निकासी और निर्माण व्यवस्था सीधे जोखिम से जुड़ी है. यह गृह मंत्रालय का विषय है क्योंकि आपदा प्रबंधन राष्ट्रीय सुरक्षा का भी हिस्सा है.

भारत के सामने अब विकल्प बहुत सीमित हैं. मौसम को नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं है लेकिन जोखिम को कम करना हमारे हाथ में है.

क्योंकि असली संकट यह नहीं है कि बारिश कम या ज्यादा होगी. असली संकट यह है कि मौसम जिस तेजी से बदल रहा है, क्या हमारी व्यवस्था भी उतनी ही तेजी से बदल रही है?

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About the Author

Amit Singh

Amit Singh

अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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