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चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी तकरार के बीच एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और वोटर लिस्ट के शुद्धीकरण से संबंधित एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. ओवैसी ने चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए कहा है कि उन्होंने पहले ही आशंका जताई थी कि मोदी सरकार जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा कानून लाई है, उससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं. अपने करीब साढ़े सात मिनट के बयान में उन्होंने ये भी कहा हालिया घटनाक्रम उसी दिशा में जाते दिख रहे हैं, जैसा उन्हें महसूस हुआ था.
ओवैसी ने आगे कहा, चुनाव आयोग को अपने फैसले बहुमत के आधार पर लेने चाहिए थे. आपको यह बताना होगा कि कितने फैसले बहुमत के आधार पर लिए गए. आपके दो चुनाव आयुक्तों ने असहमति के नोट दिए हैं. अगर फैसले बहुमत से लिए ही नहीं गए, तो फिर उनकी कानूनी वैधता क्या रह जाती है?
ओवैसी ने आगे कहा कि एसआईआर के चलते इस देश में सबसे ज्यादा परेशानी गरीबों को उठानी पड़ी है. दस्तावेज जुटाने के लिए उन्हें यहां से वहां भटकना पड़ रहा है, जिससे उनकी गरिमा तक प्रभावित हो रही है. सरकार को उन लोगों की स्थिति पर जवाब देना चाहिए, जिनके नाम अंतिम एसआईआर में नहीं आए हैं.
SIR को लेकर अपना पुराना आरोप दोहराते हुए ओवैसी ने कहा, 'मैंने संसद में उसी समय कहा था कि एसआईआर असल में 'बैकडोर NRC' है. मैं एक बात पूछना चाहता हूं. बीजेपी सरकार को उन लोगों की स्थिति पर जवाब देना चाहिए, जिनके नाम अंतिम SIR में नहीं आए हैं.
#WATCH | Hyderabad, Telangana: AIMIM Chief and MP Asaduddin Owaisi said, "I have been opposed to the SIR from the very beginning. I believe the decision taken regarding the SIR was wrong, but what could we do? The Supreme Court upheld it. The decisions made by the Election… pic.twitter.com/YgjMPtZp8H
— ANI (@ANI) September 27, 2026
ओवैसी ने आगे कहा, 'तेलंगाना में न तो हमारे पास NRC था और न ही स्थायी निवास प्रमाण पत्र जारी किए गए थे. अब उन लोगों के बारे में सोचिए, जिनके नाम मतदाता सूची से बाहर रह गए. उनके बच्चे, बेटे-बेटियां या पोते-पोतियां क्या करेंगे? वे अपना नाम मतदाता सूची में कैसे जुड़वाएंगे. अगर उनके माता-पिता या दादा-दादी के नाम ही सूची में नहीं हैं, तो वे अपनी वंशावली की मैपिंग आखिर किसके साथ करेंगे. आप इसे ऑनलाइन कैसे मैनेज करेंगे'.
एनआरसी मूल रूप भारत के कानूनी नागरिकों का एक आधिकारिक रजिस्टर है. इस खास रजिस्टर में उन सभी लोगों की डेमोग्राफिक जानकारी शामिल होती है, जो भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत भारत की नागरिकता रखने की योग्यता रखते हैं. पहली बार यह रजिस्टर 1951 की जनगणना के तुरंत बाद तैयार किया गया था. असम भारत का एकमात्र प्रदेश है, जहां अपडेटेड एनआरसी तैयार हो चुकी है. भारत में इस समय राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी देशव्यापी एनआरसी लागू नहीं है. इस पर कांग्रेस का दो तरह का स्टैंड है. असम की एनआरसी का वो समर्थन करती है, लेकिन देशव्यापी एनआरसी के पक्ष में नहीं है.
इसी साल जून में14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर विदेश मंत्रालय ने कहा था कि पासपोर्ट प्राथमिक तौर पर एक यात्रा दस्तावेज है, जो भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है. उस समय भी नागरिकता, एनआरसी और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर हो चुकी पुरानी बहस ने जोर पकड़ा था.
ओवैसी ने ऑनलाइन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाते हुए पूछा, जब मतदाताओं से ऑनलाइन प्रक्रिया अपनाने को कहा जा रहा है, तब बीएलओ को नोटिस और दस्तावेजों के लिए घर-घर क्यों भटकना पड़ रहा है. नाम की स्पेलिंग से जुड़ी गड़बड़ी, मैपिंग न होने, उम्र में अंतर या परिवार के सदस्यों से जुड़े रिकॉर्ड में विसंगति के संबंध में नोटिस दिए गए हैं. इसलिए आयोग को उन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए, जो एसआईआर को लेकर उठ रहे हैं.'
चुनाव आयोग के अंदर असहमति की खबरें बाहर आने के बाद सियासत में 'जानी-दुश्मन' समझे जाने वाले दल भी एक-दूसरे के करीब आए हैं. ममता बनर्जी ने खुद सीपीआई (एम) के नेता को फोन करके एसआईआर के मुद्दे पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाने का आग्रह किया है. उन्होंने इस सिलसिले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से भी बात की है. इस विषय पर जल्द ही इंडिया गठबंधन की बैठक का ऐलान हो सकता है.
राजनीतिक विवाद पर आयोग ने कहा है कि एसआईआर से जुड़े फैसले आयोग की मंजूरी से लिए गए. इस तरह से इलेक्शन कमीशन ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है.