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पराली जलाने का ऐसा तोड़! 'पोखरण' वाला फॉर्मूला अपनाकर सैटेलाइट को चकमा दे रहे किसान, मामले घटने का हुआ खुलासा

पंजाब-हरियाणा में पराली जलने के मामले में एकाएक भारी कमी दर्ज की गई. जब सरकार ने जांच करवाई तो पता चला कि पोखरण परीक्षण वाला फॉर्मूला अपनाकर किसान सरकार को चकमा दे रहे थे और धड़ल्ले से पराली जला रहे थे.

Written By Devinder Kumar
Published: Nov 06, 2026, 11:19 PM IST | Updated: Nov 06, 2026, 11:36 PM IST
Image Credit: पराली जलाने के मामले में पकड़े जाने से बचने के लिए पंजाब के किसान पोखरण वाला फॉर्मूला अपना रहे हैं (एआई इमेज)
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सर्दियां शुरू होती वायु प्रदूषण की समस्या अब बड़ी बीमारी बनता जा रहा है. केवल दिल्ली-एनसीआर ही नहीं, समूचा उत्तर भारत इस भयंकर परेशानी से जूझ रहा है. इस प्रदूषण का बड़ा कारण सर्दियों में हवाओं के रुकने के साथ ही पंजाब-हरियाणा में पराली का जलना भी माना गया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब राज्य सरकारों ने पंजाब में महज 4 साल में ही पराली जलाने के मामले 80 हजार से घटकर एकदम 6 हजार पर आ गए. आंकड़ों में अचानक इतनी बड़ी कमी आने से सबके कान खड़े हुए. जांच हुई तो सब दंग रह. सरकारों को बेवकूफ बनाने के लिए किसानों ने ऐसा तरीका ईजाद कर लिया है, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता.

किसानों ने निकाल लिया सैटेलाइटों का तोड़

रिपोर्ट के मुताबिक, पराली जलाने की घटनाओं को छिपाने के लिए पंजाब के किसान अब सैटेलाइटों के गुजरने के समय के गैप का फायदा उठा रहे हैं. यह वही रणनीति है, जैसी 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण के दौरान पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी टीम ने अमेरिकी जासूसी उपग्रहों से बचने के लिए इस्तेमाल की थी. उसी रणनीति का इस्तेमाल करके अब खेत की आग छिपाई जा रही है.

असल में, भारत में मुख्य रूप से चार विदेशी पोलर सैटेलाइट्स - MODIS (टेरा और एक्वा) तथा VIIRS (सुओमी NPP और NOAA-20) के जरिए निगरानी होती है. ये सभी सैटेलाइट्स मुख्य रूप से दोपहर और दिन के समय ही गुजरते हैं. 
किसान जान चुके हैं कि भारतीय मौसम विभाग के पोलर सैटेलाइट्स दिन में सिर्फ तय समय पर ही पंजाब और हरियाणा के ऊपर से गुजरते हैं. यह समय गुजर जाने के बाद किसान अपने खेतों में खड़ी पराली में आग लगाते हैं. इसकी वजह से वह आग सरकार की नजर में आने से बच जाती है. साथ ही, सरकारी रिकॉर्ड में भी पराली जलाने की घटनाएं घट जाती हैं.

चार साल में 80 हजार से 6 हजार पर आ गए मामले

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2021 में पराली जलाने के मामले करीब 80,000 थे. चार साल बाद यानी 2025 में ये आंकड़े घटकर करीब 6,000 रह गए. इस तकनीकी खामी को पकड़ने के लिए 'आईफॉरेस्ट' (iFOREST) संस्था ने 'फायर वॉच' नामक नया प्लेटफॉर्म तैयार किया है.

ये भी पढ़ें- दिल्ली-NCR में छाने लगा सांसों पर संकट: GRAP-3 की पाबंदियां हुईं लागू, क्या वीकेंड पर प्रदूषण से मिलेगी राहत? जानें मौसम अपडेट

यह सिस्टम पारंपरिक सैटेलाइट्स के अलावा जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स Meteosat-8 और Meteosat-9 (SEVIRI पेलोड) का डेटा इस्तेमाल करता है. ये उपग्रह हर 15 मिनट में तस्वीरें भेजते हैं, जिससे आग का वास्तविक समय और पीक टाइम पकड़ में आ जाता है. इसके अलावा Sentinel-2 की तस्वीरों से सीजन के पहले और बाद में खेतों की स्थिति की तुलना करके कुल जले हुए रकबे का सटीक आकलन किया जाता है.

आग के बाद काले निशानों को कैसे छिपा पाएंगे किसान?

किसान भले ही आग की लपटों को सैटेलाइट से छिपा लें, लेकिन बाद में बचे हुए आग के काले निशानों को छिपाना मुमकिन नहीं है. हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) कार्टोसैट-3 जैसे हाई-रिजॉल्यूशन भारतीय सैटेलाइट्स के जरिए जले हुए कृषि क्षेत्रों का लगातार विश्लेषण करते रहते हैं. यह रिपोर्ट सीधे वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को भेजी जाती है. इससे साफ है कि तकनीक के जरिए किसानों के बचने की यह चालाकी ज्यादा दिनों तक टिकने वाली नहीं है.
 

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About the Author

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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