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खबर छापने से पहले लेनी होगी इजाजत? पत्रकारिता की आजादी पर DPDP कानून को चुनौती, केंद्र को SC का नोटिस

डेटा प्रोटेक्शन कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली DNPA की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. याचिकाकर्ताओं ने प्रेस की आजादी प्रभावित होने की आशंका जताई है.

Written By Arvind Singh Edited By Tahir Kamran
Published: Oct 27, 2026, 07:33 PM IST | Updated: Oct 27, 2026, 11:20 PM IST
Image Credit: Ai की मदद से बनाई गई तस्वीर
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डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट- 2023 और DPDP नियम-2025 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने यह याचिका दायर की है. याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत के तौर पर प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग की, जिसपर कोर्ट ने कहा कि दूसरे पक्ष को सुने बिना एकतरफा आदेश पास नहीं कर सकते.

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी है. एसोसिएशन का कहना है कि अगर पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर छापने से पहले उससे इजाजत लेनी पड़ी, तो इन्वेस्टिगेशन जर्नलिज्म और खबरों की रिपोर्टिंग करना मुश्किल हो जाएगा.  याचिकाकर्ताओं की तरफ से सीनियर वकील माधवी दीवान ने कहा कि इस कानून के प्रावधानों से न्यूजरूम बंद हो जाएंगे. अगर हमें इस बात के लिए किसी व्यक्ति की मर्जी पर निर्भर रहना पड़े कि वह अपनी व्यक्तिगत जानकारी के इस्तेमाल की इजाजत देगा या नहीं, तो खबर पब्लिश करने का मकसद ही खत्म हो जाएगा. फिर पत्रकारिता करने का क्या मतलब रह जाएगा. खबरें समय पर लोगों तक पहुंचनी चाहिए.

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिकाकर्ता इस क्षेत्र के एक्सपर्ट हैं और वे केंद्र सरकार को ऐसे उपाय सुझा सकते हैं, जिनसे कानून का गलत इस्तेमाल रोका जा सके. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है.

इसके जवाब में वकील ने कहा कि याचिका दाखिल करने के बाद DNPA ने केंद्र सरकार को इस मामले में एक ज्ञापन सौंपा था. DNPA ने 10 अगस्त 2026 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को एक विस्तृत ज्ञापन दिया था. इसमें DPDP एक्ट और उसके नियमों को लागू करने से जुड़ी चिंताओं को उठाया गया था. इसके बाद 25 अगस्त 2026 को DNPA के प्रतिनिधियों और मंत्रालय के अधिकारियों के बीच एक मीटिंग भी हुई.

किस सेक्शन पर क्या एतराज है?

सेक्शन 7: निजी डेटा के इस्तेमाल से जुड़ी व्यवस्था
पत्रकारों की चिंता है कि खबर तैयार करने के दौरान लोगों की निजी जानकारी इस्तेमाल करने पर कानून की शर्तें पत्रकारिता के काम में बाधा डाल सकती हैं.

सेक्शन 17(2): कुछ गतिविधियों को छूट, लेकिन पत्रकारिता को नहीं
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कुछ गतिविधियों, जैसे रिसर्च, आर्काइविंग और सांख्यिकीय विश्लेषण को छूट दी गई है, लेकिन जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता के लिए ऐसी स्पष्ट छूट नहीं है. पत्रकार को खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति या अन्य कानूनी शर्तों का पालन करना पड़ सकता है. इससे भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों को उजागर करना मुश्किल हो सकता है.

सेक्शन 18, 19 और 27: डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की व्यवस्था और शक्तियां
इस बोर्ड को डेटा से जुड़े मामलों की जांच करने और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करने की शक्तियां दी गई हैं. याचिकाकर्ताओं का एतराज है कि बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन सरकार करती है और कानून में न्यायिक सदस्य होना अनिवार्य नहीं है. मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों में फैसला करने वाली संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को यकीनी बनाया जाना चाहिए.

सेक्शन 36, नियम 23 और DPDP Rules की सातवीं अनुसूची: पत्रकारों के सोर्स की गोपनीयता
यह पत्रकारों के लिए सबसे अहम मुद्दों में से एक है. इन प्रावधानों के तहत केंद्र सरकार को कुछ परिस्थितियों में डेटा रखने वाली संस्थाओं और मध्यस्थों से जानकारी मांगने की ताकत मिलती है. इन शक्तियों का इस्तेमाल खुफिया सोर्स की पहचान पता लगाने या उन्हें निशाना बनाने के लिए हो सकता है. इससे व्हिसलब्लोअर सरकारी भ्रष्टाचार या दूसरी गड़बड़ियों की जानकारी पत्रकारों को देने से डर सकते हैं.

धारा 37(1): खबरों और जानकारी तक पहुंच रोकने की ताकत
इस धारा के तहत केंद्र सरकार को कुछ परिस्थितियों में जनता की जानकारी तक पहुंच प्रतिबंधित करने की शक्ति दी गई है. याचिकाकर्ताओं का एतराज है कि यह शक्ति बहुत व्यापक है और इसका इस्तेमाल खबरों के प्रसार को रोकने के लिए किया जा सकता है. ऐसे में पत्रकारों के पब्लिश्ड कंटेंट तक लोगों की पहुंच प्रभावित हो सकती है.

धारा 44(3): RTI कानून में बदलाव
इस धारा के जरिए सूचना का अधिकार (RTI) कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया गया है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे निजी जानकारी के खुलासे पर व्यापक रोक लग सकती है, भले ही जानकारी किसी सरकारी अधिकारी के आधिकारिक कामकाज या बड़े जनहित से जुड़ी हो. मसलन अगर किसी सरकारी अधिकारी के कामकाज से संबंधित जानकारी भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए जरूरी है, तो उसे हासिल करना मुश्किल हो सकता है.

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About the Author

अरविन्द सिंह ज़ी न्यूज़ में सीनियर जर्नलिस्ट हैं. पत्रकारिता में करीब दो दशक का अनुभव है. वह मुख्यत: सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग करते हैं. इसके अलावा देशभर में कोर्ट से आने वाली बड़ी ख़बरों पर भी उनकी नज़र रहती है. कानून की जटिल, तकनीकी खबरों को सरल अंदाज में पेश करना उनकी खासियत है, इन्होंने जामिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. 
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