भारत की सेना और डिफेंस सेक्टर के लिए एक गुड न्यूज है. दुनिया की सबसे खतरनाक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का नया रूप, यानी 'ब्रह्मोस-NG' (नेक्स्ट जेनरेशन) अब बहुत जल्द तैयार होने वाला है. खुद ब्रह्मोस एयरोस्पेस के टॉप अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि यह घातक मिसाइल कब तक सामने आ जाएगी. बड़ी बात यह है कि अभी यह मिसाइल पूरी तरह बनकर तैयार भी नहीं हुई है और दुनिया भर के देशों में इसे खरीदने की होड़ मच चुकी है. आखिर इस नए ब्रह्मोस-NG में ऐसा क्या खास है, जो इसे पुरानी ब्रह्मोस से भी कई गुना ज्यादा खतरनाक और जानलेवा बनाता है?
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सीईओ ने दो अहम जानकारियां साझा की हैं. पहली यह कि वर्ष 2029 तक ब्रह्मोस-NG मिसाइल हकीकत की शक्ल ले लेगी. दूसरी बड़ी जानकारी यह है कि ब्रह्मोस-NG के निर्माण से पहले ही दूसरे देश, इस मिसाइल को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. आखिर जो मिसाइल बनी भी नहीं, उसके एडवांस ऑर्डर की तैयारी क्यों चल रही है? यह समझने के लिए आपको ब्रह्मोस-NG की पावर और परफॉर्मेंस...दोनों को देखना और समझना चाहिए.
ब्रह्मोस-NG की पावर आपने देख ली. अब बात करते हैं परफॉर्मेंस की, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण ऑपरेशन सिंदूर है. आज ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सीईओ डॉक्टर जयतीर्थ जोशी ने, ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की भूमिका से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य भी साझा किए हैं.
डॉक्टर जोशी ने बताया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जितनी भी ब्रह्मोस मिसाइल दागी गई थीं, वे सभी अपने टारगेट पर जाकर लगी थीं. इसका सीधा मतलब है कि पाकिस्तान की हवाई रक्षा प्रणाली एक भी ब्रह्मोस मिसाइल को नहीं रोक पाई थी. डॉक्टर जोशी का दावा यह भी बताता है कि ब्रह्मोस मिसाइल ने अपनी SEA SKIMMING क्षमता को पूरी तरह प्रदर्शित किया था. यानी ब्रह्मोस इतनी कम ऊंचाई पर उड़ी थी, कि पाकिस्तानी रडार मिसाइल का पता ही नहीं लगा पाए थे. अब हम आपको ब्रह्मोस मिसाइल की इसी क्षमता से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प जानकारी देने जा रहे हैं.
दुनिया की सभी SEA SKIMMING MISSILES की तुलना की जाए तो ब्रह्मोस नंबर वन साबित होती है. अगर रेंज यानी प्रहार करने की दूरी की बात की जाए, तो ब्रह्मोस तकरीबन 300 किलोमीटर दूर वार करती है. अमेरिका की मिसाइल हार्पून सिर्फ 200 किलोमीटर तक वार कर सकती है, जबकि फ्रांस की एक्सोसेट भी तकरीबन 200 किलोमीटर दूर ही जा सकती है. ब्रह्मोस की स्पीड 3 मैक यानी आवाज की गति से तीन गुना ज्यादा है.
अमेरिकी हार्पून मिसाइल की स्पीड आवाज से भी कम है. इसी तरह फ्रांस की एक्सोसेट मिसाइल की रफ्तार भी तकरीबन 1 मैक तक ही सीमित है. ब्रह्मोस की टक्कर में सिर्फ और सिर्फ, रूस की ओनिक्स मिसाइल खड़ी होती है...क्योंकि इन दोनों मिसाइल्स का निर्माण एक ही सिद्धांत पर किया गया है.
ब्रह्मोस की इसी परफॉर्मेंस की वजह से दुनिया के अलग-अलग देश पहले ब्रह्मोस में दिलचस्पी दिखाते नजर आए. अब ब्रह्मोस-NG से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है, तो ब्रह्मोस से ज्यादा दिलचस्पी नए और घातक वर्शन यानी ब्रह्मोस-NG के लिए बढ़ गई है.
ब्रह्मोस का नया वर्शन न सिर्फ दूसरे देशों के लिए, बल्कि इंडियन एयरफोर्स के लिए भी शुभ समाचार है. नई मिसाइल को भारत के स्वदेशी फाइटर जेट्स से इंटीग्रेट किया जाएगा. भारत के पास फिलहाल स्वदेशी जेट तेजस की दो स्क्वाड्रन यानी तकरीबन 40 विमान हैं. अगले एक साल में भारत को तकरीबन 18 तेजस जेट मिलने की संभावना है. अगर ये सभी विमान ब्रह्मोस के आधुनिक वर्शन से लैस हो जाएंगे, तो यकीनन भारतीय वायुसेना की फायर पावर में बड़ा इजाफा होगा.
तकरीबन 300 किलोमीटर की रेंज वाली ब्रह्मोस ने पाकिस्तान में तबाही मचा दी थी, अगर यही ब्रह्मोस 1500 किलोमीटर दूर तक प्रहार करेगी...तो पाकिस्तान का कोई ऐसा हिस्सा नहीं होगा जहां तक ब्रह्मोस की पहुंच नहीं होगी. भारत की ऐसी ही सैन्य नीति को प्राचीन भारत के विद्वान आचार्य चाणक्य ने भी परिभाषित किया था.
आचार्य चाणक्य ने कहा था कि - शांति केवल शक्ति के बल से ही स्थापित की जा सकती है. इसी वजह से एक राष्ट्र को युद्ध के समय शांति की नीतियां नहीं अपनानी चाहिए, और शांति के समय में शक्ति संचार की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए. यही कारण है कि शांति काल में भी भारत अपनी सैन्य शक्ति को लगातार आगे बढ़ा रहा है.