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भारत में तिब्बती समुदाय की आबादी लगातार घट रही है. देश में इस समय सिर्फ 70 हजार से 80 हजार तिब्बती नागरिक ही रह गए हैं. इसके पहले साल 2010 के आस-पास यह संख्या एक लाख से ज्यादा हुआ करती थी. इसकी एक वजह तिब्बती परिवारों में बच्चों की संख्या में कमी आना तो रही है, तो वहीं दूसरी वजह बेहतर पढ़ाई और रोजगार की तलाश में तिब्बती युवाओं का विदेश की ओर रुख करना भी रहा है. यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में पहले से ही बड़ी संख्या में तिब्बती रह रहे हैं. ऐसे में भारत में रहने वाला तिब्बती समुदाय छोटा होने के साथ अलग-अलग इलाकों में बंटता जा रहा है.
इस बदलाव का असर हिमाचल प्रदेश के मैक्लोडगंज और धर्मशाला में साफ दिखाई देता है. धर्मशाला तिब्बती समुदाय के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का प्रमुख केंद्र है. यहां केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) का मुख्यालय है और दलाई लामा भी यहीं रहते हैं. अब सवाल यह है कि जब समुदाय की आबादी लगातार घट रही है, तो उन संस्थानों को कैसे चलाया जाएगा, जिन्हें कभी बड़ी आबादी की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था.
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, 'धर्मशाला के तिब्बती सेटलमेंट ऑफिसर कुंचोक मिगमार के मुताबिक, 2008 तक हर साल करीब 3 हजार तिब्बती भारत पहुंचते थे. लेकिन 2023 में उनके कार्यालय ने केवल 6 लोगों की मदद की. तिब्बती निर्वासित प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि 2008 में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद चीन ने तिब्बत में सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी. ये प्रदर्शन बीजिंग ओलंपिक से कुछ महीने पहले शुरू हुए थे और तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के अलावा छिंगहाई, सिचुआन, गांसू और युन्नान के तिब्बती इलाकों तक फैल गए थे. '
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के मुताबिक, उस साल कम से कम 344 विरोध प्रदर्शन हुए. उसके दावे के अनुसार, करीब 7 हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया और लगभग 200 लोगों की मौत हुई. चीन इन दावों से असहमत है. इसके बाद सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ी और भारत में पहुंचना मुश्किल हो गया. पहले तिब्बती शरणार्थियों के नए समूह लगातार भारत आते थे, जिससे यहां की बस्तियों में आबादी बनी रहती थी. अब यह सिलसिला लगभग थम गया है. इसके अलावा, भारत में रह रहे तिब्बती परिवारों में जन्म दर घटने और युवाओं के विदेश जाने से भी आबादी कम हो रही है.
तिब्बती बच्चों की घटती संख्या का असर उनके लिए बनाए गए स्कूलों पर भी पड़ रहा है. दलाई लामा ने 1960 में तिब्बती चिल्ड्रन्स विलेज (TCV) की स्थापना की थी. इसका उद्देश्य तिब्बती शरणार्थी बच्चों की देखभाल करना और उन्हें शिक्षा देना था. समय के साथ इस नेटवर्क का विस्तार हुआ और अब तक 50 हजार से ज्यादा बच्चे यहां पढ़ चुके हैं. TCV के महासचिव कालसांग फुंत्सोक के मुताबिक, 2008 से पहले संस्थान में करीब 17 हजार विद्यार्थी पढ़ते थे. अब यह संख्या घटकर लगभग 5 हजार रह गई है. इनमें भी वरिष्ठ कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या करीब 500 है.
पहले छात्रावासों में 6 से 14 साल की उम्र के 80 से 100 बच्चे रहते थे. अब कई जगह यह संख्या घटकर 20 से 30 रह गई है. फुंत्सोक ने चेतावनी दी है कि अगर हालात नहीं बदले, तो 2030 तक TCV के दो या तीन स्कूल खाली हो सकते हैं. लोअर धर्मशाला स्थित इसकी एक शाखा में सिर्फ 74 विद्यार्थी रह गए हैं और इसे बंद करने की नौबत आ सकती है.
छात्रों की कमी दूर करने के लिए TCV ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश समेत दूसरे हिमालयी क्षेत्रों के बच्चों को भी दाखिला देना शुरू किया है. अब ऐसे बच्चे संस्थान के कुल विद्यार्थियों का करीब 30 प्रतिशत हैं. इसके अलावा, विदेश में रहने वाले तिब्बती परिवारों से भी अपने बच्चों को यहां पढ़ने के लिए भेजने की अपील की गई है. इससे स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बनाए रखने में मदद मिल सकती है. लेकिन इससे तिब्बती बच्चों की घटती संख्या की समस्या पूरी तरह दूर नहीं होगी. समुदाय के कम बच्चे स्कूलों में पहुंच रहे हैं, जो इन संस्थानों के भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है.
तिब्बती इंस्टीट्यूट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स (TIPA) भी विद्यार्थियों की कमी से जूझ रहा है. दलाई लामा ने तिब्बती संगीत, नृत्य, ओपेरा और पारंपरिक कलाओं को बचाने के लिए इसकी स्थापना की थी. शुरुआत में यह संस्थान पश्चिम बंगाल के कालिम्पोंग में था. 1961 में इसे धर्मशाला लाया गया. संस्थान के निदेशक धोंडुप त्सेरिंग के मुताबिक, करीब 20 साल पहले इसके सात साल के प्रशिक्षण कार्यक्रम में लगभग 100 विद्यार्थी दाखिला लेते थे. अब यह संख्या घटकर करीब 35 रह गई है.
तिब्बती पारंपरिक कलाओं को सीखने में कई साल लगते हैं. लेकिन जब समुदाय की आबादी घट रही हो और युवा विदेश जा रहे हों, तो इन कलाओं को सीखने और आगे बढ़ाने वाले लोगों की संख्या भी कम हो जाती है. इस चुनौती से निपटने के लिए TIPA लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के तवांग में भी विद्यार्थियों की तलाश कर रहा है. वहां संस्थान अपनी कुछ पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण भी देता है. इसके अलावा, स्थानीय स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. संस्थान नई दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसे संस्थानों के साथ काम करने की भी उम्मीद कर रहा है. TIPA अब भी पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित करता है और हर साल शोटोन महोत्सव मनाता है. इसके ज्यादातर खर्च के लिए भारत के विदेश मंत्रालय से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है.
1959 में तिब्बत छोड़ने के बाद दलाई लामा ने धर्मशाला को अपना केंद्र बनाया. इसके बाद भारत के अलग-अलग हिस्सों में तिब्बती बस्तियां बसाई गईं, जहां शरणार्थियों को परिवार बसाने, बच्चों को पढ़ाने और अपनी भाषा व धर्म को बचाए रखने का अवसर मिला. लेकिन अब समुदाय की आबादी घट रही है और लोग कई देशों में फैल गए हैं. विदेश जाने से युवाओं को पढ़ाई और रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं, लेकिन भारत में बने संस्थानों को चलाने और अगली पीढ़ी को तैयार करने के लिए लोगों की संख्या कम होती जा रही है.
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र ने चीन में तिब्बती बच्चों के लिए आवासीय स्कूलों की नीतियों पर चिंता जताई है. उसका कहना है कि बच्चों को परिवारों से अलग रखने से उनकी भाषा और संस्कृति से जुड़ाव कमजोर हो सकता है. चीन सरकार अपनी शिक्षा नीतियों का बचाव करती है. भारत में तिब्बती समुदाय के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती उन स्कूलों और सांस्कृतिक संस्थानों को बचाए रखने की है, जिन्हें कभी कहीं बड़ी आबादी के लिए बनाया गया था. दूसरे हिमालयी क्षेत्रों के बच्चों को दाखिला देना और विदेश में रह रहे तिब्बतियों से संपर्क बनाए रखना कुछ हद तक मददगार हो सकता है. लेकिन इससे भारत छोड़कर जा चुके लोगों की कमी पूरी नहीं हो सकती.